Tag: देहरा टाउन

बूंदेली “सावनी” और चपेटे

बूंदेली “सावनी” और चपेटे

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-31 मंजू काला लोकजीवन की सरिता सुख और दुःख के दो किनारों के बीच निरंतर बहती रहती है. यह सही है कि लोकोत्सव सुख के तट पर उगे हरे-भरे वृक्ष हैं, जो अपनी खुराक सुख-दुःख से बँधी जलराशि से ही लेते हैं, लेकिन यह भी असत्य नहीं है कि दुःख का किनारा टूट जाने पर सरिता की अस्मिता खत्म हो जाती है और फिर वृक्षों के उगने का सवाल ही नहीं उठता. मतलब यह है कि लोकोत्सवों का जन्म जीवन की उन घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जो सुख-दुःख पर निर्भर न होकर उनकी उपयोगिता के महत्त्व से संबद्ध हैं. राम् नवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के महत्कार्यों और लोकादर्शों को सामने रखकर मनायी जाती हैं. महापुरुषों की जयंतियाँ मृतकों के प्रति श्रद्धा -सम्मान का नैवेद्य है. मृतकों या उनकी स्मृति से जुड़ी दुःख की अनुभूति धीरे-धीरे उनके कार्यों, आदर्शों और तज्जन्य यश पर केन्द्रित होकर सुखात्मक हो जाती है. फिर इस देश की ...
फूलों का उत्सव: सांझा चूल्हा और ग्वाल पुजै 

फूलों का उत्सव: सांझा चूल्हा और ग्वाल पुजै 

लोक पर्व-त्योहार
मंजू दिल से… भाग-28 मंजू काला फूल से मासूम बच्चे, ताजे फूलों सी उनकी मुस्कराहट, पहाड़ी  झरने सी उनकी चाल,  दूर  पहाड़ी में बजती मंदिर की घंटियां मासूम नन्हें—नन्हें हाथों में सजी खूबसूरत रिंगाल की छोटी-छोटी टोकरियां और प्यारे से उत्तराखंड का प्यारा सा उत्सव “फूलदेई” जी हां, दुनिया में शायद उत्तराखंड के पहाड़ों में ही ऐसा उत्सव मनाया जाता है, जो रंग—बिरंगे फूलों और प्यारे से मासूम बच्चों के साथ मनाया जाता है. रिंगाल की खुबसूरत टोकररियों में पुलम, खुबानी बुरंस, फ्योंली,आडू़,और न जाने कितने रंग—बिरंगे फूल लेकर आते हैं ये मासूम बच्चे. और हर घर की देहरी पर ये खूबसूरत फूल बिखेरते हैं. मुँह अंधेरे में जागकर जंगलों से लाल सुर्ख बुराँश के फूल चून—चून कर लाते हैं औऱ फिर खेतों की मुंडेर से सूरज की किरणों की तरह मुस्कराती सरसों—सी पीली फ्योंली को अपनी टोकिरयों में सजा कर निकल जाती है स्कूलि...