जागर, बूबू और मैं

जागर, बूबू और मैं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—49 प्रकाश उप्रेती आस्था, विश्वास का केंद्र बिंदु है. पहाड़ के लोगों की आस्था कई तरह के विश्वासों पर टिकी रहती है. ये विश्वास जीवन में नमक की तरह घुले होते हैं. ऐसा ही “जागर” को लेकर भी है. because “जागर” आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर भी है. ‘हुडुक’ […]

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 अम्मा का वो रेडियो

अम्मा का वो रेडियो

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—31 प्रकाश उप्रेती आज बात- “आम्क- रेडू” (दादी का रेडियो) की. तब शहरों से गाँव की तरफ रेडियो कदम रख ही रहा था. अभी कुछ गाँव और घरों तक पहुँचा ही था. परन्तु इसकी गूँज और गुण पहाड़ की फ़िज़ाओं में फैल चुके थे. इसकी रुमानियत ‘रूडी महिनेक पौन […]

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 अब घट नहीं आटा पीसने जाते हैं

अब घट नहीं आटा पीसने जाते हैं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—6 प्रकाश उप्रेती इसको हम- जानहर, जंदरु, जांदरी कहते हैं. यह एक तरह से घरेलू चक्की है. उन दिनों बिजली तो होती नहीं थी. पानी की चक्की वालों के पास जाना पड़ता था. वो पिसे हुए का ‘भाग’ (थोड़ा आटा) भी लेते थे. इसलिए कई बार घर पर ही […]

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