November 27, 2020
संस्मरण

कंकट सिर्फ लकड़ी नहीं बल्कि पहाड़ की विरासत का औज़ार है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—41

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ जरूरत और पूर्ति के मामले में हमेशा से उदार रहे हैं. वहाँ हर चीज की निर्मिति उसकी जरूरत के हिसाब से हो जाती है. आज जरूरत के हिसाब से इसी निर्मिति पर बात करते हैं. यह -“कंकट” है. इसका शाब्दिक अर्थ हुआ काँटा, काटने वाला. वैसे ‘कंकट’ मतलब जरूरत के हिसाब से तैयार वह हथियार जिसे काँटे वाली झाड़ियाँ काटते हुए प्रयोग किया जाता था. कुछ-कुछ गुलेल की तरह का यह हथियार झाड़ियाँ काटते हुए “बड्याट” (बडी दरांती) का हमराही होता था. दोनों की संगत ही आपको काँटों से बचा सकती थी. इनकी संगत के बड़े किस्से हैं.

कंकट बहुत लंबा नहीं होता था. एक हाथ भर का ही बनाया जाता था. ईजा कुछ छोटे और कुछ बड़े बनाकर रखे रहती थीं. रखने की जगह या तो ‘छन’ की छत होती थी या फिर जहाँ सभी छोटी-बड़ी दराँती रखी रहती थीं, वहाँ होती थी. अमूमन तो सूखी लकड़ी की ही बनाई जाती थी लेकिन ईजा कच्ची लकड़ी की बनाकर उसे सूखने के लिए भी रख देती थीं. हमें सख़्त निर्देश होते थे कि- “कंकट झन लीजिए हां, खेले हैं” (खेलने के लिए कंकट मत ले जाना). हम कहाँ मानने वाले थे. कंकट थी तो लकड़ी लेकिन ईजा उसे सामान्य से विशिष्ट बना देती थीं.

कंकट की मदद से ही सिसोंण, कुरी, करूँझक कन, हिसाउ और क़िलमोड की झाड़ियों को काटा जाता था. इन सबके काँटों का असर अलग-अलग होता था. इसलिए इनको काटते हुए यह मासूम सा दिखाई देने वाला हथियार ही काम आता था. वैसे तो यह भी आत्मनिर्भर नहीं था, ‘बड्याट’ या ‘दाथुल’ की संगत इसके लिए आवश्यक होती थी. तभी यह उन काँटों की झाड़ियों पर काबू पा पाता था जिनके काँटे चुभन के साथ “धधोडि और चिरोडि” भी देते थे.

बरसात के बाद खेतों में और ‘भ्योव पन’ (पहाड़ों में) हर जगह झाड़ियाँ उग आती थीं. उन झाड़ियों के कारण घास काटने में दिक्कत तो होती ही थी लेकिन खेत भी उनके कारण ढक जाते थे. ईजा के लिए यह बड़ी चिंता थी. रह- रह उनको याद आता रहता था कि- “च्यला पर ऊ भ्योव पन बुज कस हे गे रे, घा कसि हल उनु पन, काटण छि उनु कें” (बेटा सामने पहाड़ पर झाड़ियाँ बहुत ज्यादा हो गई हैं. वहां घास कैसे होगी, उनको काटना था). ईजा की यह चिंता खेतों को लेकर और बढ़ जाती थी. कहतीं- “च्यला ऊ पटोपन देख ढैय् ढिका-निसा सब बुजे-बुज हे गे” (बेटा उन खेतों में देख तो खेत के ऊपर-नीचे दोनों ओर झाड़ियाँ ही झाड़ियाँ हो गई हैं). ईजा यह कहते हुए उन खेतों की तरफ ही टकटकी लगाए देखती रहती. हम भी कहते “ईजा हिट पे आज बुज काटें हैं” (ईजा चलो फिर आज झाड़ियाँ काटने). वैसे हमको बुज काटने से कोई मतलब नहीं होता था. बस वो भ्योव जाने की ‘हौंस’ के मारे कहते थे.

ईजा कहती हैं- “च्यला अब त घर भतेर तक बुज आ गिं” (बेटा अब तो घर के अंदर तक झाड़ियाँ उग आई हैं) ऐसा कहते हुए ईजा की हताशा, निराशा, पीड़ा और बहुत कुछ खोने के घाव से भरे शब्द,  मात्र शब्द नहीं रहते…

ईजा खेतों में शाम के समय ‘बुज’ (झाड़ियाँ) काटने के लिए अकेली ही चली जाती थीं. अगर उस खेत पर अगले दिन हल लगना है तब तो हर हाल में शाम को बुज काटने जाना होता ही था. ईजा “प्यहणि ढुङ्ग” (दराती पैना करने वाला पत्थर) पर पानी डाल-डाल कर ‘बड्याट’ को पैना करती और “छन’ (गाय-भैंस बांधने की जगह) की छत से कंकट उठाती और बुज काटने के लिए खेत में चली जाती थीं. कभी-कभी हम भी चले जाते थे. हमारा काम सिर्फ खेत के ‘ढिकोम’ (किनारे) बैठ कर नीचे को पत्थर फेंकना होता था या कभी ईजा का कंकट और बड्याट नीचे की तरफ गिर जाता तो उसे लाकर पकड़ा देने का. जब ऐसा कुछ होता तो ईजा कहती थीं- “ल्या ढैय् च्यला ऊ कंकट पडि गो मुड  हन” (बेटा ला दे कंकट नीचे की तरफ गिर गया है) हम घुस-घुस जमीन से लगते हुए जाते और लाकर ईजा को दे देते थे.

ईजा के एक हाथ में कंकट और दूसरे में बड्याट होता था. कंकट की मदद से झाड़ियों को फंसाकर नीचे को करती ताकि वो मुँह और हाथ पर न आएं और फिर बड्याट से उन्हें काट देती थीं. कई बार कंकट छिटक जाता तो काँटे छप्प से ईजा के हाथ और मुँह की तरफ को आ जाते थे. ऐसा होते ही ईजा के मुंह से आवाज निकलती- “ओजा…” इस आवाज के साथ ही हमारा ध्यान चट से ईजा की तरफ जाता और पूछते- “ईजा कन बुड़ गो क्या” (मां काँटे चुभ गए क्या). ईजा- “होई रे'( हां). यह कहते हुए फिर से झाड़ी को काटने में लग जाती थीं.

ईजा काँटों के स्वभाव से भली-भांति परिचित होती थीं. उन्हें अंदाजा होता था कि कौन सा काँटा क्या कर सकता है. जैसे “छपकु कान”(पतला और छोटा काँटा) को जितना आप निकालने की कोशिश करोगे वह और अंदर को जाएगा. उसने पकने के बाद ही निकलना है. ईजा कहती थीं- “आँगु में छपकु कान बुड गो रे, सड़ाक मारो मो,अब पाकि बे निकलल” (उँगली में छपकु काँटा चुभ गया है, टीस मार रहा है, अब पकने के बाद ही निकलेगा). ऐसा कहते हुए ईजा बहुत देर तक उस उँगली को देखती रहती थीं. हम कई बार कहते- “ईजा दिखा कतकें बुड रहो” (ईजा दिखाओ कहाँ चुभा है). ईजा उँगली आगे करती और हम देखते कि वह पूरा हिस्सा लाल हो गया रहता. ईजा उसी दर्द में फिर अगले दिन कंकट और बड्याट पैना कर चल देती थीं.

अब खेत बंजर हैं और भ्योव वीरान. झाड़ियाँ काटना रिवाज़ भर रह गया है. वो भी बस खेत के ऊपर और नीचे. ईजा कहती हैं- “च्यला अब त घर भतेर तक बुज आ गिं” (बेटा अब तो घर के अंदर तक झाड़ियाँ उग आई हैं) ऐसा कहते हुए ईजा की हताशा, निराशा, पीड़ा और बहुत कुछ खोने के घाव से भरे शब्द,  मात्र शब्द नहीं रहते…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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