October 30, 2020
समाज/संस्कृति संस्मरण

गांव की रामलीला से ही आरंभ हुआ रंगकर्म का सफर

रंग यात्रा भाग—1

  • महावीर रवांल्टा

जीवन में पहली बार कब मुझे रामलीला या पौराणिक नाटक देखने का अवसर मिला होगा, कैसे मुझे उनमें रुचि होने लगी, इस समय यह बता पाना मुश्किल है लेकिन मेरी स्मृति में इतना जरूर दर्ज है कि महरगांव में अपने घर के बरांडे के नीचे ओबरों से बाहर की जगह पर हमने रामलीला की शुरुआत की थी. इसमें हमारे पड़ोस में रहने वाले भट्ट परिवार के बच्चे भी शामिल हुए थे. निश्चित तौर पर यह रामलीला हमारे अपनी समझ से उपजे संवाद एवं अभिनय के सहारे आगे बढ़ी होगी मुझे ऐसा लगता है.

इस रामलीला की इतनी चर्चा हो पड़ी थी कि हमारे व आसपास के गांव के किशोर भी इसमें शामिल हुए. हमारे घर के बाहर के आंगन मे इसे खेला गया था. घर में उपलब्ध माता जी की धोतियों का पर्दे के रूप में इस्तेमाल हुआ था. घर में उपलब्ध सामग्री व वेशभूषा के साथ ही गत्ते से बनाए गए मुकुट, लकड़ी के धनुष बाण और तलवार सभी ने अपनी समझ व प्रयास से जुटाए थे. खुले आंगन में राम रावण युद्ध, लक्ष्मण मेघनाथ युद्ध बड़े ही रोमांचक ढंग से गाजे बाजों के साथ लड़े गए थे. इस रामलीला को देखने के लिए गांव की महिलाएं, पुरुष व बच्चे सभी में उत्साह था. जीवन में पहली बार अपने प्रयासों के साथ संपन्न यह रामलीला मुझे आज भी रोमांचित करती है.

नाटक मंचन की फाइल फोटो

महरगांव में वर्षों से बंद पड़ी कहें या अधर में लटकी रामलीला के फिर से शुरुआत का कारण भी हमारी यह छोटी-छोटी रामलीला बनेगी, किसी ने नहीं सोचा होगा. मैंने भी नहीं सोचा था. हुआ यूं कि जब हमारी बाल रामलीला का समापन हुआ तो इसके बाद सारे गांव के बच्चे और किशोर एकत्रित हुए और निश्चय किया गया की बंद पड़ी रामलीला की शुरुआत की जाए. बंद पड़ी रामलीला के बारे में मोटे तौर पर मुझे सिर्फ इतनी ही जानकारी थी कि मंदिर प्रांगण खले को लेकर हुए विवाद के कारण प्रांगण उसके मालिक सते सिंह रावत ने दो टूक कह दिया था कि उनके आंगन खले में सिर्फ भादों की जातर एवं पंडौं की सराद जैसे धार्मिक अनुष्ठान ही संपन्न हो सकते हैं. दूसरे आयोजनों के लिए कोई उन्हें बाध्य नहीं कर सकता. इसी बात पर विवाद इतना बढ़ा एयर कि पर्दे फाड़ने तक की नौबत आ पड़ी और राम-लीला पर किसी अपशकुन की तरह विराम लग गया था. रामलीला से जुड़ा सभी सामान-पर्दे, वस्त्र, तलवार, धनुष-बाण,  मुकुट, जटाएं, केश गांव के नारायण दत्त नौटियाल के घर के एक बड़े से सन्दूक में बंद हो गया था.

मुझे रानी सुमित्रा बनकर कैकयी, कौशल्या, राजा दशरथ, महर्षि वशिष्ठ व राज दरबारियों के साथ मंच पर बैठना था. हम मंच पर बैठ गए और उनकी प्रतीक्षा करने लगे. इसी बीच मुझे लगा कि मुझे बांधी गई साड़ी नीचे सरकती जा रही है और एक स्थिति ऐसी आ पड़ी कि मैं उसे संभालने की जितनी कोशिश करता वह उतनी ही फिसलती जाती.

हम लोगों ने रामलीला का सामान पाने के लिए एक अनुरोध पत्र तत्कालीन ग्राम प्रधान शूरवीर सिंह रावत के सामने प्रस्तुत किया तो उन्होंने सहर्ष इसका समर्थन किया. जोश-खरोश के साथ हमारी टोली नौटियाल जी के घर पर पहुंची और सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया. इसी सामान के साथ कुछ बाहरी गांव से सामान लेकर महरगांव में रामलीला का पुनः आरंभ हुआ. उस समय क्षेत्र में यह भी चलन था कि रामलीला से जुड़ा सामान दूसरे गांव से लेकर समापन पर उसकी वापसी करनी होती थी. इस रामलीला के निर्देशक गांव के शिक्षक केशवानंद भट्ट थे. इसमें गांव के बच्चों ने बढ़ चढ़कर भागीदारी की थी. अधर में पड़ी रामलीला को पूर्णता की ओर पहुंचाना हम सभी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. रामलीला का लगातार 14 वर्ष तक मंचन के बाद ही उसके समापन का विधान है. इसका संबंध भगवान श्री राम के 14 वर्ष के वनवास से वापस अयोध्या लौटने एवं राज्याभिषेक से भी जोड़ा जा सकता है. इसके संपन्न होने पर गांव में उत्सव का सा वातावरण होता था. घर-घर में बने पकवानों को खिलाकर अतिथियों का आदर सत्कार किया जाता था.

सुबह खूब पानी बरसा था. दिन में मौसम कुछ ठीक हुआ तो भट्ट जी ने मुझसे कहा कि चलो आज नाटक लेकर आते हैं. महरगांव से पूरब की ओर जंगल के बीच अवस्थित नौरी के लिए पैदल मार्ग जंगल से होकर गुजरता था. हम अपने छाते लिए दोपहर को नौरी के लिए चल पड़े. आधे रास्ते ही पहुंचे होंगे कि मौसम का मिजाज बदला. मूसलाधार बारिश होने लगी. बीच-बीच में बादल गरजते, बिजली कड़कती तो जी घबरा उठता था लेकिन हमारे पास आगे बढ़ने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था.

अपनी अभिनय की बात करूं तो मैं गांव की इसी रामलीला में जब भगवान श्री राम सीता स्वयंवर के बाद जनकपुरी से सीता जी को लेकर अयोध्या लौट रहे थे उसके लिए पात्रों को किसी दूसरे स्थान से गाजे बाजे सहित मंच तक लौटना था. मुझे रानी सुमित्रा बनकर कैकयी, कौशल्या, राजा दशरथ, महर्षि वशिष्ठ व राज दरबारियों के साथ मंच पर बैठना था. हम मंच पर बैठ गए और उनकी प्रतीक्षा करने लगे. इसी बीच मुझे लगा कि मुझे बांधी गई साड़ी नीचे सरकती जा रही है और एक स्थिति ऐसी आ पड़ी कि मैं उसे संभालने की जितनी कोशिश करता वह उतनी ही फिसलती जाती. मेरा सारा ध्यान साड़ी पर टिका रहा. सभी का ध्यान मंच से नीचे की ओर था इसलिए किसी से मदद की उम्मीद नहीं थी. मेरी हालत खराब होती जा रही थी कि ना जाने कब मेरी साड़ी खुल जाए. खैर जैसे-तैसे मेरी लाज बच गई लेकिन मैं बेहद रुआंसा जरूर हो गया था. आरती होने के बाद मुझे राहत सी मिली और पर्दा गिरने पर मेरी जान में जान आ पड़ी थी.

बारिश के कारण वहां बहने वाला खाला अपना विकराल रूप धारण कर चुका था. खाले के इस ओर गांव की कुछ महिलाएं घास के बोझ लिए उस पार जाने को आतुर थी लेकिन पानी का वेग व स्तर उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रहा था. वे पानी में एकाध पग रखती फिर डर कर वापस खींच लेती. आखिर उन्हें हथियार डालने पड़े और वे अपने बोझ एक ओर बिठाकर पानी के स्तर व वेग के कम होने का इंतजार करने लगी. काफी देर इंतजार के बाद पानी का वेग कुछ कम होने लगा तब भट्ट जी ने उन्हें एक-एक कर बोझ सहित पार उतारा. उनके बाद मेरी बारी थी. आज वे हमारे लिए किसी केवट से कम नहीं थे.

10 जून 1982 में सरनौल में रामलीला के मंचन के बाद एक बार फिर महरगांव का रुख करते हुए मैंने नाटक मंचन की अपनी इच्छा केशवानंद भट्ट जी के सामने रखी तो उनके सांस्कृतिक रुचि संपन्न मन ने तुरंत ही हामी भर दी थी. अब प्रश्न यह था कि कौन सा नाटक किया जाए. कुछ सोचने के बाद उन्होंने ही सुझाया था कि सत्यवादी हरिश्चंद्र नाटक करना उचित रहेगा. मैं उनकी बात पर सहमत था क्योंकि मैंने राजा हरिश्चंद्र के बारे में पढ़ा था. इस पर नाटक करना सचमुच रोचक बात थी. नाटक का चयन हो गया था लेकिन नाटक हमारे पास नहीं था. केशवानंद भट्ट जी ने बताया था की यह नाटक नौरी गांव के उनके अध्यापक मित्र सोवत सिंह चौहान के पास मिल सकता है. नाटक करने में उनकी अच्छी रुचि है और वह अपने गांव में इसका मंचन कर चुके हैं. उनसे ही नाटक लेने के बात पर एकमत होते हुए हमने किसी दिन उनके गांव जाने का फैसला किया. जिस दिन हम उनसे मिलने गए वह अगस्त महीने का ही कोई दिन रहा होगा. सुबह खूब पानी बरसा था. दिन में मौसम कुछ ठीक हुआ तो भट्ट जी ने मुझसे कहा कि चलो आज नाटक लेकर आते हैं. महरगांव से पूरब की ओर जंगल के बीच अवस्थित नौरी के लिए पैदल मार्ग जंगल से होकर गुजरता था. हम अपने छाते लिए दोपहर को नौरी के लिए चल पड़े. आधे रास्ते ही पहुंचे होंगे कि मौसम का मिजाज बदला. मूसलाधार बारिश होने लगी. बीच-बीच में बादल गरजते, बिजली कड़कती तो जी घबरा उठता था लेकिन हमारे पास आगे बढ़ने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था.

खराब मौसम, सायं का समय और जंगली रास्ता होने के कारण वे हमसे बार-बार वहीं रुकने का आग्रह कर रहे थे लेकिन हमें तो जैसे हर हाल में वापस लौटने की धुन सवार थी. उनसे विदा लेकर चले. खाले का वेग जरूर कम हो गया था लेकिन पानी का स्तर नहीं घटा था. भट्ट जी ने मेरा हाथ पकड़ कर खाला पार कराया फिर हम तेज कदमों से अपने गांव की ओर बढ़ने लगे. आधे रास्ते में ही पहुंचे होंगे कि रूमकु धीरे-धीरे बच्चरुमकु में तब्दील होने लगा. गिरते पड़ते, उठते बैठते, सांस लेते हुए हम अपने गांव पहुंचे. किसी इच्छित पुस्तक को पाने के लिए विकट परिस्थिति में एक पहाड़ी यात्रा का यह प्रसंग बताने के लिए काफी है कि पुस्तक का हमारे जीवन में कितना महत्व है.

अपने-अपने छाते ताने हुए हम नौरी गांव के निकट पहुंचे तो देखा एक बहुत बड़ी बाधा जैसे हमारा इंतजार कर रही थी. बारिश के कारण वहां बहने वाला खाला अपना विकराल रूप धारण कर चुका था. खाले के इस ओर गांव की कुछ महिलाएं घास के बोझ लिए उस पार जाने को आतुर थी लेकिन पानी का वेग व स्तर उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रहा था. वे पानी में एकाध पग रखती फिर डर कर वापस खींच लेती. आखिर उन्हें हथियार डालने पड़े और वे अपने बोझ एक ओर बिठाकर पानी के स्तर व वेग के कम होने का इंतजार करने लगी. काफी देर इंतजार के बाद पानी का वेग कुछ कम होने लगा तब भट्ट जी ने उन्हें एक-एक कर बोझ सहित पार उतारा. उनके बाद मेरी बारी थी. आज वे हमारे लिए किसी केवट से कम नहीं थे. आगे बढ़ते हुए हम चौहान जी के तेबारीनुमा घर में दाखिल हुए थे तब वे हमें देखकर आश्चर्यचकित हुए थे कि ऐसी बारिश में… केशवानंद भट्ट जी से हाथ मिलाने के बाद उन्होंने हाल-चाल पूछे. मेरा परिचय जाना फिर हमें भीतर ले जाकर बिठाया. कुछ ही देर में हमारे सामने गरमा गरम चाय के गिलास हाजिर थे.

नाटक मंचन की फाइल फोटो

चाय पीने के बाद रास्ते की थकान व ठंड जाती रही. उन्होंने हमारे यूं आने का प्रयोजन पूछा तब भट्ट जी ने उन्हें कारण बताया. सुनकर उन्होंने अफसोस व्यक्त करते हुए बताया कि वह नाटक उनसे पढ़ने के लिए कोई ले गया था लेकिन वापस नहीं लौटाया. उन्होंने किसी शख्स का नाम बताया, उसका स्मरण नहीं लेकिन पुस्तकों के प्रति घोर लापरवाही के अनेक किस्से मेरे साथ भी घटे हैं कि लोग पढ़ने के लिए पुस्तकें मांग कर ले जाते हैं लेकिन वापस लौटाना जरूरी नहीं समझते और इस तरह आप अपने प्रयास से जुटाई गई एक पुस्तक से हमेशा के लिए हाथ धो बैठते हैं. चौहान जी की बात सुनकर सारा उत्साह जाता रहा. एक आखिरी उम्मीद जिस पर हम टिके हुए थे वह खत्म हो चुकी थी.दूसरा कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. कुछ इधर-उधर की बातों के बाद हमने उनसे चलने की इजाजत मांगी. खराब मौसम, सायं का समय और जंगली रास्ता होने के कारण वे हमसे बार-बार वहीं रुकने का आग्रह कर रहे थे लेकिन हमें तो जैसे हर हाल में वापस लौटने की धुन सवार थी. उनसे विदा लेकर चले. खाले का वेग जरूर कम हो गया था लेकिन पानी का स्तर नहीं घटा था. भट्ट जी ने मेरा हाथ पकड़ कर खाला पार कराया फिर हम तेज कदमों से अपने गांव की ओर बढ़ने लगे. आधे रास्ते में ही पहुंचे होंगे कि रूमकु धीरे-धीरे बच्चरुमकु में तब्दील होने लगा. गिरते पड़ते, उठते बैठते, सांस लेते हुए हम अपने गांव पहुंचे. किसी इच्छित पुस्तक को पाने के लिए विकट परिस्थिति में एक पहाड़ी यात्रा का यह प्रसंग बताने के लिए काफी है कि पुस्तक का हमारे जीवन में कितना महत्व है. उसकी उपस्थिति में हम जितने चिंतामुक्त रह सकते हैं उसकी अनुपस्थिति हमें उतना ही चिंतातुर कर सकती है.उस दिन पुस्तक न मिल पाने के कारण मेरी सारी रात लगभग बेचैनी में ही गुजरी थी. अब दो ही विकल्प सामने थे कि या तो कहीं से सत्यवादी हरिश्चंद्र नाटक की व्यवस्था हो अन्यथा उसके स्थान पर कोई दूसरा नाटक चुना जाए. आखिर में तय हुआ कि जो भी नाटक उपलब्ध हो पाएगा उसी का मंचन किया जाएगा.

नाटक में मुझे श्रवण कुमार की शीर्षक भूमिका निभाने का मौका मिला था जबकि मेरे माता पिता की भूमिकाओं का निर्वाहन पृथ्वी सिंह रावत व रणवीर सिंह रावत ने किया था. लक्कड़ दास वह फक्कड़ दास की हास्य भूमिकाएं राजेंद्र सिंह रावत व कमल सिंह रावत ने अभिनीत की थी. संगीत का दायित्व सरनौल से आए दरशला ने निभाया था. निर्देशन की बागडोर केशवानंद भट्ट जी के हाथों में रही थी. अपनी भूमिका के लिए मैंने दिन रात मेहनत की थी इसलिए संतोष मिला कि मैं इसे भली-भांति निभाने में सफल हुआ था.

मुझे कहीं से श्रवण कुमार नाटक मिला तो तय हुआ कि इस बार यही नाटक मंचित किया जाएगा. इस नाटक को लेकर पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) आरंभ हुआ और भादो मेला के अवसर पर सितंबर 1982 में इसका मंचन हुआ. गांव में मंदिर के निकट विजेंद्र सिंह रावत के घर के चौक (खले) में मंच बना और सामने ऊंचाई पर अवस्थित भरत सिंह रावत के खले तक की सारी जगह दर्शकों के बैठने के लिए सुविधाजनक साबित हुई. नाटक में मुझे श्रवण कुमार की शीर्षक भूमिका निभाने का मौका मिला था जबकि मेरे माता पिता की भूमिकाओं का निर्वाहन पृथ्वी सिंह रावत व रणवीर सिंह रावत ने किया था. लक्कड़ दास वह फक्कड़ दास की हास्य भूमिकाएं राजेंद्र सिंह रावत व कमल सिंह रावत ने अभिनीत की थी. संगीत का दायित्व सरनौल से आए दरशला ने निभाया था. निर्देशन की बागडोर केशवानंद भट्ट जी के हाथों में रही थी. अपनी भूमिका के लिए मैंने दिन रात मेहनत की थी इसलिए संतोष मिला कि मैं इसे भली-भांति निभाने में सफल हुआ था.

(लेखक कवि एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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