November 1, 2020
साहित्यिक हलचल

‘ओ इजा’ उपन्यास में कल्पित इतिहास चेतना और पहाड़ की लोक संस्कृति

शम्भूदत्त सती का व्यक्तित्व व कृतित्व-2

  • डॉ. मोहन चन्द तिवारी

पिछले लेख में शम्भूदत्त सती जी के ‘ओ इजा’ उपन्यास में नारी विमर्श से सम्बंधित चर्चा की गई थी. इस उपन्यास का एक दूसरा खास पहलू पहाड़ के लोगों की इतिहास चेतना और लोक संस्कृति से भी जुड़ा है,जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. पहाड़ वालों ने अपने इतिहास और धार्मिक तीर्थस्थानों के सम्बन्ध में सदियों से जो अनेक प्रकार की भ्रांतियां और अंधरूढ़ियां पालपोष रखी हैं,ज्यादातर वे या तो किंवदंतियों या जनश्रुतियों पर आधारित हैं या साम्राज्यवादी अंग्रेज इतिहासकारों की सोच के कारण पनपी हैं.

पहाड़ी समाज में कस्तूरी की गंध की तरह रची बसी इन भ्रांतियों को आज कोई प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर खारिज भी करना चाहे तो नहीं कर सकता, क्योंकि ये आस्था और विश्वास के रूप में अपनी गहरी पैंठ बना चुकी हैं.यहां पहाड़ के विभिन्न मंदिरों और यहां के स्थानीय देवताओं के सम्बंध में जो तरह तरह की किंवदन्तियां या मान्यताएं समाज में प्रचलित हैं उनके लिए किसी ऐतिहासिक प्रमाण की कोई जरूरत नहीं समझी जाती. वहां के किसी पुजारी या महंत ने जो कुछ कह दिया अथवा गुलामी के दौर में इनके प्राचीन इतिहास के बारे में अंग्रेज़ों ने जो भी सही या गलत जानकारी दे दी, पहाड़ी समाज उसे ही आस्था और विश्वास के रूप में आज तक ढोता आया है. इन लोकरूढियों को धार्मिक आस्था या परम्परा बता कर गौरवान्वित होने की मानसिकता पहाड़ी समाजों में अन्य समाजों की तुलना में कुछ ज्यादा ही हावी रही है.

दरअसल,आजादी मिलने के 72 वर्षों के बाद और पृथक् राज्य बनने के 20 वर्षों के बाद भी उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास लगभग वैसा ही पढ़ाया जाता है,जैसा एटकिंसन ने अपने हिमालयन गजेटियर में लिख दिया है. बद्रीदत्त पांडे का ‘कुमाऊँ का इतिहास’ भी लगभग एटकिंसन का ही हिंदी अनुवाद है. हालांकि शिवानन्द नौटियाल, यशोधर मठपाल, रामसिंह,डा.यशवंत कठोच, हेमा उनियाल आदि अनेक इतिहासकारों और पुरातत्त्वविदों ने उत्तराखंड के इतिहास को नए आयामों से जोड़ने का स्तुत्य प्रयास भी किया है,लेकिन आंचलिक इतिहास लेखन की दशा और दिशा नहीं बदल पाई. क्योंकि पहाड़ के ज्यादातर समाज सुनी सुनाई किंवदंतियों को ही आज अपना पुश्तैनी इतिहास माने हुए हैं.यही कारण है कि वैदिक साक्ष्यों से परिपुष्ट उत्तराखंड का दस हजार से भी प्राचीन लिखित और पुरातात्त्विक इतिहास आज कहीं अंधकार में विलीन है.अंग्रेजों की इतिहास चेतना के तहत यहां आज भी उत्तराखंडी विद्वानों में विदेशी आर्यों की तरह अपने को किसी दूसरे प्रांत से आया हुआ सिद्ध करने की होड़ सी लगी है,अपने को उत्तराखंड मूल का कोई मानता ही नहीं,कोई अपनी बिरादरी को गुजरात,से तो कोई महाराष्ट्र या राजस्थान से आया हुआ बताने में गौरव का अनुभव करता है. हो सकता है कुछ जातियों के बारे में यह बात सही भी हो किन्तु ज्यादातर मामलों में तो इसे भेड़चाल ही माना जाएगा क्योंकि सदियों से कभी ब्रिटिश शासकों और कभी अपने ही प्रान्तों के सामंती राजाओं की गुलामी की मानसिकता के कारण ज्यादातर उत्तराखंडी आज अपना वह स्वर्णिम लोकतांत्रिक इतिहास भूल चुके हैं,जिसका वर्णन हमारे देश के प्राचीन ग्रन्थ वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों में आया है.मैंने अपने शोधग्रन्थ चाहे ‘अष्टाचक्रा अयोध्या: इतिहास और परम्परा’ हो या ‘द्रोणगिरि इतिहास और संस्कृति’ अथवा ‘श्यैनिकशास्त्रम् : राजा रुद्रदेव ऑफ कुमाऊँ’ सभी में पहाड़ी समाज के बारे में फैलाई गई इन ऐतिहासिक भ्रांतियों का सप्रमाण खंडन करने का प्रयास किया है और उत्तराखंड हिमालय के प्राचीन इतिहास के बारे में भी कई नवीन जानकारियां दी हैं.इसलिए मैं जब भी स्वयं अपनी इतिहास दृष्टि के तहत साहित्यकार शम्भूदत्त सती जी के उपन्यास ‘ओ इजा’ के ‘झंडी धार’ के पात्रों की गतिविधियों को पढ़ता हूं तो मुझे पता नहीं क्यों लगता है कि जैसे मैं अपने गांव और समूचे पाली पछाऊं क्षेत्र की इतिहास चेतना और उसके सांस्कृतिक परिवेश से साक्षात्कार कर रहा हूं.लेखक की सराहना ही करनी होगी कि मनोरंजन के साथ साथ समाज दर्शन की अनुभूति कराने में भी वे सफल उपन्यासकार सिद्ध हुए हैं.

“पढ़ने लिखने के नाम पर तो एक प्राइमरी पाठशाला तक नहीं थी. मौखिक ये अपने पूर्वजों तक का नाम भूल जाते थे. अब भला इनका इतिहास क्या बताऊँ? फिर किसी को इनका इतिहास लिखने की जरूरत भी क्यों पड़ने लगी. चलो कोई अगर लिख भी देता तो उससे उसे क्या हासिल होने वाला था. हम तो अंग्रेज साहबों का इतिहास लिख-लिखा कर कृतकृत्य हो गए.”

‘ओ इजा’ उपन्यास में इतिहास चेतना
‘ओ इजा’ उपन्यास में शम्भूदत्त सती ने पहाड़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकृतियों के साथ अत्यंत व्यंग्यपूर्ण और युक्तिसंगत शैली में संवाद करने का प्रयास किया है. लेखक ने कहा है कि जिस ‘झंडीधार’ के लोग अपने पूर्वजों का नाम तक नहीं जानते,उनसे पहाड़ की तरह के अपने विशाल अतीत के इतिहास की क्या उम्मीद की जा सकती है?लेखक के अनुसार ‘झंडीधार’ का गांव कुछ इसी प्रकार के लोगों का समूह था- “पढ़ने लिखने के नाम पर तो एक प्राइमरी पाठशाला तक नहीं थी. मौखिक ये अपने पूर्वजों तक का नाम भूल जाते थे. अब भला इनका इतिहास क्या बताऊँ? फिर किसी को इनका इतिहास लिखने की जरूरत भी क्यों पड़ने लगी. चलो कोई अगर लिख भी देता तो उससे उसे क्या हासिल होने वाला था. हम तो अंग्रेज साहबों का इतिहास लिख-लिखा कर कृतकृत्य हो गए.” (‘ओ इजा,पृ.15)

आधुनिक लेखकों के इतिहास लेखन पर भी तंज कसते हुए उपन्यास में कहा गया है- “आज अगर किसी के पास भी लिखित इतिहास है तो बस यही कि अंग्रेज साहबों ने पहाड़ों में कब और कैसे राज किया.उनकी गुलामी से हमने क्या-क्या सीखा,बस इसे पढ-पढा कर कृतकृत्य और धन्य होते आ रहे हैं.”(‘ओ इजा,पृ.16)

दरअसल, शम्भूदत्त सती ने ‘झंडीधार’ गांव के बहाने से पहाड़वासियों की उस ग्रामचेतना की मानसिकता पर भी गहरा व्यंग्य किया है,जो उन्हें अंग्रेज सैपों की जी-हजूरी करके विरासत में मिली है.उन्होंने लिखा है- “गांव में अस्सी के आसपास के जो भी दो-चार उम्रदार दाने सयाने थे,वे यही दोहराते दिखाई दिए ‘हमारा असली गांव ये थोड़े ठहरा. हमारा गांव तो रानीखेत से बीस मील आगे सीमापानी था.अभी भी वहां हमारी बंजर खेतीबाड़ी वैसे ही पड़ी है,जैसे हमारे पुरखे छोड़ आए थे. शुरू-शुरू में हमारे पुरखे चौमास में भैंस चराने के लिए यहां आए और बाद में उन्हें यहीं सज जैसी आ गई.उड़ियारों (गुफाओं) में रहने लगे.ऐसे ही समय काट लिया.’ कुछ अपने को महाराष्ट्र से आये मानते हैं तो कुछ राजस्थान से लेकिन लिखित और सही जानकारी किसी के भी पास नहीं.”(‘ओ इजा’,पृ.16)

“पधान ही गांव वालों को बताता था ‘फलाने का बाप ऐसा था,उसकी मां ढाँटी (बिना शादी किये घर में रख ली गई औरत) थी.फलाने के हाथ का भात हम इसलिए नहीं खाते हैं कि वह ‘बोजी’ की औलाद है साला,या फलाने की चिलम से हम तम्बाकू इसलिए नहीं पीते हैं कि वो नीच जाति का है. तो हो गया न इतिहास पूरा.”

‘झंडीधार’ का इतिहासवेत्ता प्रामाणिक व्यक्ति यदि कोई था तो वह आदमी था गांव का पधान. “पधान ही गांव वालों को बताता था ‘फलाने का बाप ऐसा था,उसकी मां ढाँटी (बिना शादी किये घर में रख ली गई औरत) थी.फलाने के हाथ का भात हम इसलिए नहीं खाते हैं कि वह ‘बोजी’ की औलाद है साला,या फलाने की चिलम से हम तम्बाकू इसलिए नहीं पीते हैं कि वो नीच जाति का है. तो हो गया न इतिहास पूरा.”(‘ओ इजा’,पृ.17)

श्राद्ध के समय आबदेव करने के लिए सबके बाप दादा का नाम गोपी पाणे को ही याद रखना होता था.वही गोत्र का उच्चारण कर बाप दादा का नाम सब बोल देता.इनको ये भी मालूम नहीं होता कि ये पाणे ‘अहं कै लियो’ भी क्यों कहता है.

‘झंडीधार’ के लोकदेवता
‘झंडीधार’ गांव वाले अपने लोक देवताओं के इतिहास के बारे में भी इसी प्रकार की उटपटांग भ्रांतियां या मान्यताएं रखते आए थे- “वे कहते हैं कि जब हमारे पुरखे सीमापानी से यहां आए तो हमारी कोई आमा वहीं से डलिया में ग्वेलदेवता को भी ले आई.यहां आने पर ‘झंड़ीधार’ में पत्थरों का एक छोटा सा मन्दिर बना कर ग्वेलदेवता की स्थापना कर दी. (‘ओ इजा’,पृ.17)

मगर यहां ‘झंडीधार’ में नरसिंह आदि अन्य देवताओं के थानवासी होने के सम्बन्ध में एक विचित्र किस्सा लोगों में प्रचलित था.उसके बारे में उपन्यासकार ने लिखा है कि- “सीमापानी के गांव में कभी कोई बाबा आये होंगे. रात में किसी के घर में रुक गए और हमारे कोई बूबू (दादा) थे,जिन्होंने रात को बाबा को खूब दूध दही खिलाया पिलाया और सेवा पानी की. सुबह जंगल चराने के लिए भैसों को ले गए और बाबा से कहा ‘चलो बाबा तुमको भी आगे तक छोड़ आऊंगा.’ अब असल में बात यह थी कि बाबा के पास ठहरी सोने की फतुई (वास्कट) और रात से ही बूबू का मन आ गया कि बाबा की फतुई कैसे ली जाए. जंगल में जाकर ‘भिचीलम’ में तम्बाकू भरा और बाबा से कहा -बाबा मारो सुट्टा.बाबा ने जैसे ही तम्बाकू का सुट्टा मारने के लिए अपना सिर जमीन में टेका,पहले से ही तैयार बैठे बूबू ने बाबा के सिर पर तेज धारदार कुल्हाड़ी से वार कर दिया. बस क्या था बाबा एक ही चोट में ठंडे हो गए और खून के छिटकारे पड़ने लगे.प्राण छोड़ते हुए बाबा ने बूबू से कहा ‘यार मैं तो तेरा कुछ बिगाडूंगा नहीं,पर तूने मुझे इस लखी जंगल में ऐसे धोखे से मार दिया!अगर तुझे मेरी सोने की फतुई ही चाहिए थी तो तू मांग लेता,मुझे मारता तो नहीं.अब अगर तूने मुझे मार ही दिया है तो मरते समय मैं तुझे श्राप तो नहीं दूंगा,क्योंकि मैंने तेरे घर का अन्न खा रखा है.पर देख मेरे शरीर से ये जितने भी खून के छींटे निकल रहे हैं ये सारे कल को बीर-बेताल बन जाएंगे और तेरा वंश जहां तक चलेगा-च्येली-च्यल,गै बाछ यानी लड़की का लड़का,गाय की बछिया तक को नहीं छोडेंगे.”(‘ओ इजा’,पृ.18)

…कौतीक का खर्चा चलाने के लिए घर की भैंस की थोरी बेची. मेरे खसम ने मुझे मना नहीं किया और तू- साला कहीं का, मुझे रोक रहा है.’ऐसा धक्का मारा कि एस.डी.एम.पड़ा एक तरफ को, बस क्या था,पीछे से सारे लोग आगे बढ़ गए. साहब भी साला देखता ही रह गया. उस दिन एस.डी.एम. फैसला दे गया भइया ये द्वाराहाट के  द्वराओं का जब नगाड़ा आता है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता, न आज से कोई रोकेगा.”

बस तभी से बाबा के खून के जितने भी छींटें पड़े थे वे सारे अवतार हो गए. कोई नरसिंह बन गया तो कोई गरदेवी, कोई भूत तो कोई कलुवा.तब वे सारे देवता भी सीमापानी से यहां ‘झंडीधार’ साथ ही आ गए.अब जहां भी इस गांव की लड़कियों को ब्याहने वाले ठहरे,वो बीर-बेताल भी डोली के साथ वहां चले जाते हैं और वहां जाकर अवतार हो जाते हैं.उनका वहीं थान बनाकर वहीं थानवासी करना पड़ता है.(‘ओ इजा’,पृ.18)

‘झंडीधार’ के तीज  त्योहार
यह तो रही ‘झंडीधार’ के देवताओं की बात ‘ओ इजा’ उपन्यास में पहाड़ के मेलों और त्योहारों के बारे में भी बहुत ज्ञानवर्धक जानकारियां दी गई हैं जो आज की नई पीढ़ी के लिए बहुत उपयोगी हो सकती हैं.’झंडीधार’ में चैत्र के महीने नव संवत्सर से लेकर दूसरे संवत्सर तक जितने भी त्योहार होते हैं, लेखक ने उसकी पूरी लिस्ट गिनाई है,जैसे चैत्र के महीने में फुलदेही, बैसाख में स्याल्दे बिखोती, जेठ में बगुचौर, सल्टिया-सोमनाथ, सावन में हरेला,भादौ में घी संक्रांति, असोज में खतडुवा और दशहरा, कार्तिक में बग्वाली, मार्गशीर्ष में हइया दशहरा, माघ में उत्तरायणी, फाल्गुन में बसंत पंचमी. इस प्रकार बारह महीनों के बारह पहाड़ी त्योहार ‘झंडीधार’ में  विशेष हंसी खुशी के साथ मनाए जाते थे.त्योहार के दिन तरह तरह की ‘डिशें’ बनाई जाती थी,चाहे उसके लिए पैंचा (उधारी) ही क्यों न निकालना पड़े. उपन्यास में इन खास ‘डिशों’ के नाम दिए हैं-खीर, लापसी, हलुवा,पूवे, मालपुवे, बड़े, रायता, चिलड़े, दौड़पुरी,आदि.

‘झंडीधार’ के मेले उत्सव
‘झंडीधार’ में मेलों के अवसर पर विशेष उत्साह देखने को मिलता था.जिस दिन मेला होता उस दिन ऐसा लगता मानो आजादी मिल गई हो.सुबह से ही सजना-धजना, गांव गांव में नगाड़े, ढोल की धुनें,रणसिंह की गगन भेदती आवाज ये सब मेले के हर्षोल्लास को प्रकट करते थे. उपन्यास में कुमाऊँ उत्तराखंड के विभिन मेलों का भी उल्लेख आया है, जिनमें नैथना में घी संक्रांति, विभांडेश्वर की बिखोती, द्वाराहाट की स्याल्दे,मासी का सल्टिया सोमनाथ, भिक्यासैंण की स्योंरात, बुड़केदार की पुण्यों,दुनागिरि चौखुटिया की अष्टमी, नैनीताल की नन्दादेवी मेला,देवीधुरा का बग्वाल मेला विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

द्वाराहाट स्याल्दे मेले का रोचक वर्णन
‘ओ इजा’ उपन्यास में द्वाराहाट के स्याल्दे मेले के बारे में भी रोचक वर्णन आया है. यह पाली पछाऊं का इतना खास मेला है कि किसी को चाहे अपने बैल भी बेचने पड़ जाएं तो भी वह स्याल्दे मेला जरूर जाता है. मगर ‘झंडीधार’ के खिम सिंह पधान ने गांव वालों को एक बार यह बताया कि इस साल तो स्याल्दे में भारी झगड़ा होगा बल.किसी ने किसी की ब्वारी (बहु) को अपने घर बैठा दिया है,इस पर लट्ठ चलेंगे.अब साले पटवारी ने हमसे कहा कि इस साल मेले में भइया,तुम्हारा नगाड़ा नहीं जाएगा. हमने कहा,कैसे नहीं जाएगा.नगाड़ा तो हम मेले में ले ही जाएंगे,चाहे हमारी जान चली जाए.हम अपना नगाड़ा ले गए.पहले लट्ठे सबके हाथ हुए ही.औरतों की कमर में दराती. अब महाराज जैसे ही स्याल्दे के थोक में हमारा नगाड़ा पहुंचने वाला था तब तक देखते हैं वहां एस.डी.एम. भी आया ठहरा.उसने हमारा नगाड़ा रोक दिया.अब हमने कहा कि महाराज ऐसा मत करो.पर साला माना ही नहीं.हाथ जोड़े कि महाराज अगर हमारा नगाड़ा स्याल्दे के थोक में नहीं पहुंचा तो हमारी तो नाक कट जाएगी कि इस बार ‘झंडीधार’ वालों का नगाड़ा आधे रास्ते से ही वापस चला गया.दुनिया हम पर थूकेगी.अगले साल से स्याल्दे में हमारा नगाड़ा आना ही बंद कर देंगे.अब एस.डी.एम. साले को कितना समझाया पर माना ही नहीं. कहने लगा जिद करोगे तो मैं गोली चलवा दूंगा,सब लौट जाओ अपने अपने घरों को,अगले साल आएगा तुम्हारे गांव का नगाड़ा.अब अगर एक साल छूट जाता तो फिर दूसरे साल से हमें कौन लाने दे रहा था. अब हो बहसबाजी में बहुत देर हो गई. इतने में हमारी ये नीचे तुला सिंह की घरवाली ने खट्ट से एस.डी.एम. को एक झटका मारा ‘-साला तू अस्डैम आपणी मां का-, साले तीन महीने से मैंने कौतीक जाने के लिए घाघरा सिला रखा है. कौतीक का खर्चा चलाने के लिए घर की भैंस की थोरी बेची. मेरे खसम ने मुझे मना नहीं किया और तू- साला कहीं का, मुझे रोक रहा है.’ऐसा धक्का मारा कि एस.डी.एम.पड़ा एक तरफ को, बस क्या था,पीछे से सारे लोग आगे बढ़ गए. साहब भी साला देखता ही रह गया. उस दिन एस.डी.एम. फैसला दे गया भइया ये द्वाराहाट के  द्वराओं का जब नगाड़ा आता है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता, न आज से कोई रोकेगा.” (‘ओ इजा’,पृ.18)

 जारी..

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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