November 1, 2020
संस्मरण

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48

  • प्रकाश उप्रेती

अविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” और “सरूली” की बात. ‘थेऊ’ पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले लोगों के लिए तो इसका जीवनदायिनी महत्व है. ईजा के ‘छन’ का तो यह, महत्वपूर्ण सदस्य था.

‘थेऊ’ मतलब लकड़ी का एक ऐसा प्याऊ जिसके जरिए नवजात बछड़े और ‘थोरी’ (भैंस की बच्ची) को दूध व तेल पिलाया जाता था. बांस की लकड़ी का बना यह प्याऊ अपनी लंबाई और गहराई में छोटा-बड़ा होता था. अंदर से खोखला और आगे से तराश कर पतला व  थोड़ा समतल बनाया जाता था ताकि तेल- दूध गिरे भी न और थोरी के मुँह में भी आ जाए.

ईजा का ‘गुठयार’ (गाय-भैंस बांधने वाली जगह) भैंस के बिना कभी नहीं रहा. ईजा ने भैंस को और भैंस ने ईजा को कभी नहीं छोड़ा. हमारी भैंस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. ईजा उन्हें बचपन से बच्चों की तरह पालती हैं. उनको तेल लगाना, धूप में रखना, इधर-उधर दौड़ाना, घास खिलाना सभी ईजा करती थीं. 

ईजा का ‘गुठयार’ (गाय-भैंस बांधने वाली जगह) भैंस के बिना कभी नहीं रहा. ईजा ने भैंस को और भैंस ने ईजा को कभी नहीं छोड़ा. हमारी भैंस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. ईजा उन्हें बचपन से बच्चों की तरह पालती हैं. उनको तेल लगाना, धूप में रखना, इधर-उधर दौड़ाना, घास खिलाना सभी ईजा करती थीं.

थोरी का नामकरण हम करते थे. इसके लिए सबके बीच में लड़ाई होती थी, ये नहीं, ये बोलेंगे, इसके सर पर सफेद चाँद जैसा है तो चँदा बोलेंगे, नहीं रूपा बोलेंगे, न , रूपा तो सामने वालों की भैंस का नाम है, तो इसका नाम ‘सरूली’ रखते हैं. कुछ देर लड़ने-झगड़ने के बाद ईजा के पास जाते थे कि “ईजा इसको सरूली” कहेंगे. ईजा कहती थीं- “जे कणु तुमुकें क्वो” (तुमको जो कहना है, कहो). धीरे-धीरे ईजा भी उसे सरूली बोलने लगी थी.

सरूली की दादी, परदादी को भी ईजा ने पाला था. अब सरूली के दिन थे. सरूली की माँ से लेकर दादी तक में यह आदत थी कि वह अपने बच्चों को दूध नहीं पीने देती थी. इसलिए ईजा को थेऊ में रखकर ही दूध पिलाना पड़ता था. हम तो बस सरूली की पूँछ पकड कर उसके साथ दौड़ लगाते थे. पूँछ उठाकर जब वह दौड़ती थी तो ईजा कहतीं- “डोंरि गे रे सरूली” (सरूली खुश हो गई). हम जितना उसके पीछे दौड़ते वह उतना ही आगे दौड़ती थी. बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखती थी कि हम आ रहे हैं कि नहीं! अगर हमको न देखे तो रुक जाती और फिर वापस आ जाती थी. ईजा एक बार बोल दे- “ले.. ले.. सरूली आ”. तुरंत दौड़े चली आती थी.

सरूली की माँ भी उसको दूध पीने नहीं देती थी. ईजा कितनी कोशिश करती लेकिन सरूली अपनी माँ से डरती और माँ उसको नजदीक नहीं आने देती थी. अब ईजा के पास थेऊ से दूध पिलाने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता था. ईजा दो लोटा दूध सरूली के लिए अलग से निकाल देती थीं. हम तो दिन- रात सरूली के साथ खेलते और उसे परेशान करते रहते थे. जब भी उसे ईजा दूध पिलाती तो हम वहीं खड़े रहते थे.

दिन भर सरूली घर पर ही घूमती रहती थी. रात को ही उसे ‘छन’ बांधा जाता था. दिन में जब हम गोठ में खाना खा रहे होते तो बाहर से झाँकती थी. हम उसे ले.. ले.. बोलते लेकिन वह अंदर नहीं आती थी.  ईजा ने एक सुंदर सी ‘घानि’ (घंटी) उसके गले में बांध दी थी. अब वह टनटन करते हुए कभी इधर तो कभी उधर जाती रहती थी. ईजा को जब देखती तो पीछे-पीछे चल देती थी. 

ईजा थेऊ में दूध डालती थीं. उसके बाद एक हाथ से सरूली का मुँह खोलती और थेऊ उसके मुँह में डाल देती थीं. थोड़ा वो पीती और थोड़ा गिरा देती थी. ईजा को ये पता होता था तभी वह पहले से ही ज्यादा दूध निकाल कर रखती थीं. जब भी वो दूध गिराती तो ईजा कहतीं- “मर जाछैं” (मर जाता है). ऐसा कहते हुए उसे फिर दूध पिलाने लग जाती थीं. हम बस सरूली के पेट की तरफ ही देखते रहते थे.

जैसे-जैसे सरूली बडी हो रही थी तो दूध कम गिराती थी. ईजा एक हाथ से मुँह पकड़ती और दूध से भरा थेऊ  मुँह में डाल देती थीं. वह घट, घट, पी जाती थी. कभी-कभी तो ईजा की उंगली भी काट देती थी. ईजा तुरंत कहती- “आँगु बुक्के है म्यर, मर गैछे” (मेरी उंगली काट दी है, मर गया क्या). सरूली बटन जैसी आँखों और पत्ते जैसे कानों से ईजा को सुना-अनसुना कर देती थी.

दिन भर सरूली घर पर ही घूमती रहती थी. रात को ही उसे ‘छन’ बांधा जाता था. दिन में जब हम गोठ में खाना खा रहे होते तो बाहर से झाँकती थी. हम उसे ले.. ले.. बोलते लेकिन वह अंदर नहीं आती थी.  ईजा ने एक सुंदर सी ‘घानि’ (घंटी) उसके गले में बांध दी थी. अब वह टनटन करते हुए कभी इधर तो कभी उधर जाती रहती थी. ईजा को जब देखती तो पीछे-पीछे चल देती थी.

कभी-कभी ईजा थेऊ से उसे तेल भी पिलाती थीं. उसके साथ एक छोटी सी कंघी भी रखी हुई थी जिससे  उसके बाल भी बनाए जाते थे. सरूली छन पर कम और घर पर ही ज्यादा घूमती रहती थी. ईजा कहीं से भी आए हमको बाद में पहले सरूली को आवाज लगाती थीं-‘अरे सरूली ओ ए सरूली’. सरूली भी वांई… वांई… करते हुए ईजा के पास चली जाती थी.

एक दिन सरूली घर के नीचे चर रही थी. ईजा और हम घर पर ही थे. ईजा ने आवाज लगाई तो सरूली  वापस आ गई लेकिन वापस आने के बाद थोड़ा सुस्त-सुस्त सी लग रही थी. एक जगह बैठी तो बैठी ही रह गई थी. ईजा ने आवाज दी लेकिन वह उठकर नहीं आई. ईजा सरूली के पास गई और उसकी थोड़ा मालिश करके उठाने की कोशिश करने लगी लेकिन सरूली से उठा ही नहीं जा रहा था. धीरे-धीरे सरूली का पेट फूलने लगा. ईजा कुछ जड़ी बूटी लाई, उन्हें पीसा और थेऊ से पिलाने लगी लेकिन उसने आधे से ज्यादा तो फेंक दी. हम बार-बार सरूली को देख रहे थे. आवाज लगाते तो वह सिर्फ गर्दन ऊपर कर हसरत भरी आँखों से देख भर लेती थी लेकिन फिर गर्दन नीचे कर देती थी.

ईजा कुछ-कुछ उपाय करने लगी. कभी ‘क़िलमोड’ के काँटे से झाड़ा लगाती तो कभी उसके मुँह में हाथ डालती लेकिन सरूलीधीरे-धीरे और सुस्त होती जा रही थी.अब उसकी हालत यह थी कि वह अपने बदन की मक्खी भी नहीं हटा पा रही थी. ईजा और हम दो-दो मिनट में उसे देख रहे थे. हम सरूली, सरूली बोल रहे थे लेकिन सरूली की हिम्मत अपनी गर्दन उठाने की भी नहीं थी. सरूली का पेट ‘नागोर’ (नगाडा) की तरह फूल चुका था. उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. ईजा अलग-अलग उपायों पर लगी हुई थी और हमारे चेहरे रुआँसे हो रखे थे.

सुबह से शाम हो चली थी. सरूली घर पर दौड़ नहीं रही थी तो घर एकदम सूना लग रहा था. शाम को 5 बजे के आस-पास सरूली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. ईजा ने सरूली को हिलाया लेकिन उसकी आँखें खुली थी और सांस बंद हो चुकी थी. यह देखते ही ईजा के आँख का आँसू सरूली के माथे पर टपका और हम तो दूर जाकर रोने लगे. हम सबके बीच अजीब सा सन्नाटा छा गया था.

कुछ देर के बाद हम सब ने मिलकर एक खेत में गड्ढा खोदकर सरूली को दफना दिया. उस रात घर में अजीब सी शांति रही, किसी ने कुछ खाया भी नहीं और चुपचाप सो गए. सोने के बाद बार-बार सरूली की घंटी की आवाज कानों में गूँज रही थी.

ईजा ने बाद में जहां सरूली को दफनाया था वहाँ एक आम का पेड़ लगा दिया था. आज वो “सरूलीक आमक डाव” (सरूली का आम का पेड़) कहलाता है. सरूली नहीं रही लेकिन थेऊ चलता रहा. एक साल बाद सरूली की बहन हुई “शशि” फिर उसने थेऊ से दूध पिया. शशि अब गुठयार की रौनक और ईजा की हमराही है.

कई दिनों तक वो घंटी की आवाज हम सबके कानों में गूँजती रही. ईजा ने बाद में जहां सरूली को दफनाया था वहाँ एक आम का पेड़ लगा दिया था. आज वो “सरूलीक आमक डाव” (सरूली का आम का पेड़) कहलाता है. सरूली नहीं रही लेकिन थेऊ चलता रहा. एक साल बाद सरूली की बहन हुई “शशि” फिर उसने थेऊ से दूध पिया. शशि अब गुठयार की रौनक और ईजा की हमराही है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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