धर्मस्थल

जसुली शौकयाणी की मन्याओं का इतिहास

  कुमाऊं में मनिया मंदिर: एक पुनर्विवेचना -4

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार ‘मन्याओं’ का सबसे अधिक निर्माण दारमा जोहार क्षेत्र की महान दान वीरांगना जसुली शौकयाणी के द्वारा किया गया. लला (आमा) के नाम से विख्यात जसुली शौकयाणी ने कुमाऊ, गढ़वाल, नेपाल तक मन्याओं because और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया. सोमेश्वर, जागेश्वर, बागेश्वर, कटारमल, द्वाराहाट आदि स्थान धार्मिक मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध होने के कारण इन मार्गों पर सबसे अधिक मन्याओं का निर्माण कार्य हुआ है.

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अठारहवीं सदी या उससे पहले जब यातायात के संसाधन नहीं थे, तब व्यापारिक, धार्मिक, विवाह आदि यात्राएं पैदल ही की जाती थीं . ऐसे समय में पैदल मार्ग वाले निर्जन और धार्मिक महत्त्व के स्थानों में रात्रि विश्रामालयों और धर्मशालाओं का निर्माण करवाना पुण्यदायी कार्य माना जाता था. धारचूला के दांतू गांव की महान दानवीर महिला because जसुली दताल (शौक्याणी) ने लगभग दो सौ साल पहले दारमा घाटी से लेकर भोटिया पड़ाव हल्द्वानी तक व्यापारिक काफिलों और धार्मिक तीर्थयात्रियों के लिए पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, धारचूला, टनकपुर, अल्मोड़ा और बागेश्वर सहित पूरे कुमाऊं के पैदल रास्तों पर धर्मशालाओं का निर्माण करवाया था. इनमें से अधिकांश धर्मशालाएं अब खंडहर बनकर रह गई हैं.

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उल्लेखनीय है कि जसुली दताल का जन्म दांतू गांव, तहसील धारचूला,परगना दारमा, जिला पिथौरागढ में हुआ था. जसुली दताल कम उम्र में ही विधवा हो गयी थी और एक मात्र पुत्र की भी असमय मृत्यु हो गयी थी. सन्तानहीन महिला जसुली दताल के जीवन से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण घटना भी बहु चर्चित है. ब्रिटिश शासन काल में कुमाऊं के because कमिश्नर हेनरी रैमजे एक बार दौरे पर दांतू गांव जा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि न्यूलामती नदी के किनारे खड़ी एक वृद्धा चांदी के सिक्कों को एक-एक कर नदी में बहा रही थी. धन से इतनी निर्लिप्तता देखकर कमिश्नर हेनरी स्तब्ध रह गए. दांतू पहुंच कर रैमजे को गांव वालों ने बताया कि जसुली दताल हर सप्ताह मन भर रुपयों के सिक्के न्यूलामती नदी को दान कर देती है.

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रैमजे ने जसुली को समझाया कि इस धन का उपयोग जनहित में किया जाए तो उसे पुण्यलाभ होगा. because जसुली ने कमिश्नर की बात मान ली. और अपनी असीम धन सम्पत्ति को घोडों और भेड़-बकरियों में लाद कर अल्मोड़ा पहुंचा दिया. कहते हैं कि इसी धन से कमिश्नर रैमजे ने जसुली सौक्याण के नाम से 300 से अधिक धर्मशालाएं बनवाई.

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इन धर्मशालाओं को बनवाने में लगभग 20 वर्ष का समय लगा. इनमें सबसे प्रसिद्ध धर्मशालाएं नारायण तेवाड़ी देवाल, अल्मोड़ा की हैं. इसके अतिरिक्त वीरभट्टी (नैनीताल), हल्द्वानी, रामनगर, कालाढूंगी, रांतीघाट, पिथौरागढ़, भराड़ी, बागेश्वर, सोमेश्वर, लोहाघाट, टनकपुर, ऐंचोली, थल, अस्कोट, बलुवाकोट,धारचूला,कनालीछीना, तवाघाट, because खेला,पांगू आदि अनेक स्थानों पर बनी धर्मशालाएं उस महान दानवीर जसुली सौक्याण की दानशीलता को ही प्रकट करती हैं. ये धर्मशालाएं नेपाल-तिब्बत के व्यापारियों और वहां के तीर्थयात्रियों के लिए पुरे कुमाऊं क्षेत्र में बनवाई गयी थीं. इन धर्मशालाओं में पीने के पानी व अन्य सुविधाओं की भी अच्छी व्यवस्था होती थी.

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जसुली शौकयाणी द्वारा बनवाई गयी इन धर्मशालाओं का वर्णन सन् 1870 में अल्मोड़ा के तत्कालीन कमिश्नर शेरिंग ने अपने यात्रा वृत्तान्त में भी किया है. इन धर्मशालाओं के निर्माण के 250 साल तक इनका उपयोग होता रहा. उस समय कैलास मानसरोवर व अन्य तीर्थस्थलों को जाने वाले तीर्थयात्री, व्यापारी और आम यात्री इन धर्मशालाओं में because आराम करने और रात्रिविश्राम के लिए उपयोग करते थे. कालांतर में सड़कों के बन जाने और तीव्र गति के यातायात के साधनों का प्रचलन होने पर इन धर्मशालाओं का उपयोग बंद हो गया और उसके साथ-साथ ये धर्मशालाएं भी जीर्ण होती चली गईं. कुछ धर्मशालाओं को सड़कों के निर्माण मार्ग में आने के कारण तोड़ भी दिया गया.

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रानीखेत,जागरण संवाद सहयोगी की एक रिपोर्ट (30 जनवरी,2020) के अनुसार अब पर्यटन विभाग द्वारा बदहाली से जूझ रही अल्मोड़ा हल्द्वानी हाईवे पर खीनापानी बाजार के समीप because जसुली शौक्याणी की इन धर्मशालाओं की बीस लाख रुपये से मरम्मत आदि करके इन्हें हैरीटेज के रूप में विकसित किया जाएगा और रानी जसुली से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारियां लोगों तक पहुंचाने के लिए संग्रहालय भी तैयार किया जाएगा.

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वस्तुतः दो सौ साल पहले बनी जसूली शौक्याणी की मन्याओं को संरक्षित करने का विचार सराहनीय है. किंतु छह-सात सौ साल पुरानी सांस्कृतिक धरोहर स्वरूप इन कत्युरीकालीन ‘मन्याओं’ के because प्राचीन इतिहास को जानने के लिए प्रमाण हेतु हमारे पास पुरात्त्व विभाग के सौजन्य से आज द्वाराहाट के ‘मनिया मन्दिर समूह’ की ‘मन्याएं’ ही संरक्षित रह सकीं हैं. शेष मन्याएं या तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में नष्ट होती गईं अथवा किन्हीं स्थानों में पुनर्निर्माण के कारण इनका रूप और आकार बदल गया है.

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अंत में मैं उन सभी because महानुभावों का आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मेरी ‘मन्या’ सम्बन्धी इस वैचारिक संगोष्ठी में अपने बहुमूल्यों विचारों और नई-नई जानकारियों से मेरा और जन सामान्य का ज्ञानवर्धन किया.

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