धर्मस्थल

द्वाराहाट, सुरेग्वेल और जालली क्षेत्र की मन्याओं का इतिहास

कुमाऊं में मनिया मंदिर : एक पुनर्विवेचना-2

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

द्वाराहाट के ऐतिहासिक स्थलों से सम्बंधित शोध योजना के अंतर्गत मैंने वर्ष 2017 के 30 मई से 3 जून, की अवधि में सुरेग्वेल  और जालली के मंदिर और वहां स्थित विलुप्त ‘मन्याओं’ का सर्वेक्षण किया, तो इस क्षेत्र के मन्या मंदिरों के बारे में अनेक नए तथ्यों का भी रहस्योद्घाटन हुआ. इस क्षेत्र के वरिष्ठ स्थानीय प्रबुद्धजनों से पता चला कि because द्वाराहाट और पाली पछाऊं के इलाके में ‘मन्या’ उस धार्मिक स्थान को कहते हैं, जहां यात्रीगण या मुसाफिर लोग रात्रि के समय विश्राम करते हैं. एक प्रकार से यह मंदिर के निकट रात्रि विश्राम हेतु बना धर्मशाला जैसा  विशेष कक्ष होता था.

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द्वाराहाट का मनिया मन्दिर समूह

द्वाराहाट प्राचीन काल से ही तीर्थनगरी के रूप में प्रसिद्ध रहा है. चारधाम यात्रा हो या कैलास मानसरोवर की यात्रा द्वाराहाट उन सब धार्मिक स्थानों का प्रवेश द्वार माना गया है. because इसलिए इस शहर में पूरे वर्ष समूचे देश के विभिन्न प्रान्तों  के तीर्थयात्रियों के आवागमन का दौर चलता रहता रहा था. स्वाभाविक है कि कत्यूरी राजाओं के काल में यहां जो विभिन्न देवी देवताओं के मंदिर नौले आदि जलाशयों का निर्माण हुआ, तो उनमें मन्दिरों के निकट तीर्थयात्रियों के रात्रिनिवास हेतु बहुत संख्या में धर्मशालाएं भी बनाई गईं होंगीं.

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कत्यूरी राजाओं ने द्वाराहाट में मन्दिरों के साथ because यात्रीनिवास हेतु अनेक मन्याओं का भी निर्माण किया था. कालांतर में यहां मन्दिर तो संरक्षित रह सके, क्योंकि उनमें देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हुई थी और निरन्तर पूजा पाठ भी होता रहता था. किन्तु उनके साथ संलग्न रात्रि निवास हेतु बनी ‘मन्याएं’ मरम्मत आदि नहीं होने के कारण नष्ट होती चली गईं.

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इतिहास की पुस्तकों से ज्ञात होता है कि द्वाराहाट में कत्यूरी राजाओं ने यहां 55 मन्दिरों का निर्माण करवाया, किन्तु उनमें से अधिकांश मन्दिर आज नष्ट हो गए हैं. अब केवल पुरातत्त्व विभाग because के संरक्षण के कारण द्वाराहाट के सात-आठ मन्या मन्दिर ही अपना अस्तित्व बचा सके हैं. उनमें से द्वाराहाट के संरक्षित  प्राचीन मन्याओं  में ‘मनिया मन्दिर समूह’ ऐसा था जहां चार या पांच मन्याओं के होने की संभावना है. इसी लिए इसे ‘मनिया’, ‘मन्या’ या ‘मनदेव’ के नाम से भी जाना जाता है. इस मंदिर समूह में एक आयताकार गर्भगृह वाला ऐसा कक्ष आज भी देखा जा सकता है, जिसमें दस-पन्द्रह यात्री रात्रि निवास कर सकते हैं.

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द्वाराहाट के मनिया मन्दिर समूह की एक खास विशेषता यह भी है कि पुरातत्त्वविदों और मन्दिर स्थापत्य के जानकारों के अनुसार इस मंदिर में हिन्दू धर्म के देवी देवताओं के साथ साथ जैन तीर्थंकरों के मंदिर भी बने थे. इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि इस मन्या मन्दिर में हिन्दू तीर्थयात्रियों के अलावा जैन धर्मानुयायी भी पूजा अर्चना करते थे और सलग्न मन्याओं में because रात्रि निवास हेतु ठहरते भी थे. ऐतिहासिक दृष्टि से आज हमारे पास द्वाराहाट का यह ‘मन्या मंदिर समूह’ ही बचा है, जो मन्या मन्दिर के वास्तु स्थापत्य पर भी महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालता है.

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सुरेग्वेल और जालली की मन्याएं

रानीखेत-मासी मोटर मार्ग में सुरेग्वेल के मन्याओं के बारे में भी वहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि सौ साल पहले तक यहां कम से कम तीन मन्याओं को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था. पर because सुरेग्वेल और दूसरे स्थानों में बने ये तमाम ‘मन्या’ आज नष्ट हो चुके हैं. सुरे ग्राम के मूल निवासी श्री भैरवदत्त तिवारी के अनुसार यहां सुरे ग्वेल में न्याय देवता ग्वेलज्यू के प्राचीन मंदिर में लोग दूर दराज से अपने मुकदमे अथवा तहसील के कार्य के लिए रानीखेत जाते हुए मनौतियां मांगते थे और निकट में बने ‘मन्याओं’ में रात्रि विश्राम के लिए ठहरा करते थे.

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जोयूं गांव के 83 वर्षीय स्व. श्री दुर्गादत्त तिवारी जी ने पाली ग्राम के मास्टर श्री शंकरदत्त पालीवाल को इस सुरेग्वेल मंदिर के निकट पीपल के वृक्ष के नीचे छात्रों को पढाते हुए स्वयं देखा था because और बारिश हो जाने पर वे साथ में बनी तीन मन्याओं’ में शरण लेते थे.उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण जानकारी भी दी कि सुरेग्वेल से रानीखेत जाने वाला सबसे बड़ा घोड़ा मार्ग  ‘राज बाट’ (राजमार्ग) कहलाता था. इसी मार्ग से अंग्रेज अफसर रानीखेत से घोड़े में बैठकर सरकारी पाली जाया करते थे.

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दरअसल, कत्यूरी काल में  द्वाराहाट के अलावा रानीखेत-जालली-मासी राजमार्ग  भी सुरेग्वेल और जालली घाटी ऐतिहासिक मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध था. यहां सूरेग्वेल नामक एक मात्र मंदिर था जो because सल्ट चौकोट को रानीखेत से जोड़ने वाले सबसे बड़े राजमार्ग पर बना हुआ था. लम्बी दूरी वाले यात्रीगण इसी ग्वेलदेवता के मंदिर के समीप बनी मन्याओं में रात्रिवास भी करते थे. सन 1957 में हुई पैमाइश के दौरान सुरे ग्रामसभा की पंचायत के नक्शों में इस ग्वेलदेवता के मंदिर के निकट बने मन्याओं की भी पुष्टि होती है.

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सुरेग्वेल के भूमिया देवता मंदिर के ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सदियों पहले यहां सुरेग्वेल में कत्यूरी शैली का भव्य मंदिर बना हुआ था और पाली पछाऊं क्षेत्र के कत्यूरी राजा मानदेव ने यहां अपने शासन काल में कत्युरी शैली के अनेक मन्दिरों और यात्रियों की सुविधा के लिए  अनेक मन्याओं का भी निर्माण करवाया. इस क्षेत्र के इतिहास से जुड़ा because कोई प्रामाणिक शिलालेख या दानपत्र जैसा ऐतिहासिक दस्तावेज भले ही आज हमारे पास नहीं है, किंतु सुरेग्वेल के आधुनिक मंदिर के प्रांगण में मौजूद पुरातन कत्यूरी कालीन मंदिर के ध्वंशावशेष इस तथ्य का ठोस प्रमाण हैं कि सुरे ग्वेल का यह विख्यात प्राचीन मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से किसी जमाने में भव्य मन्दिर रहा होगा.

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द्वाराहाट मंदिर समूह की तरह सौ दो सौ because साल पहले तक यहां मन्याओं की संख्या बहुत अधिक रही होगी. इसका एक ठोस प्रमाण यह भी है कि सुरेग्वेल का निकटस्थ स्थान ‘मन्याओं’ के कारण ही ‘मनचौर’ या ‘मनिया चौरा’ कहलाया. पिछले वर्षों में मुझे इस ऐतिहासिक स्थान से महापाषाणकालीन कपमार्क ओखली भी मिली.

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सुरेग्वेल के मन्याओं के समान ही यहां से चार-पांच कि.मी. दूर जालली में स्थित ऐतिहासिक महत्त्व के कत्यूरी कालीन इटलेश्वर महादेव और बिल्वेश्वर महादेव मन्दिर भी विद्यमान हैं. जिनका संज्ञान आजतक किसी इतिहासकार या पुरातत्त्व विभाग ने नहीं लिया. यहां पर्याप्त संख्या में श्रद्धालुजन  दर्शन करने आते थे. ये दोनों मंदिर भी अतीत में because द्वाराहाट के मन्दिरों की भांति अत्यंत गौरवशाली मंदिरों में परिगणित थे, जिसके प्रमाण इन मंदिरों के प्रांगण में संरक्षित कत्यूर कालीन मंदिर स्थपत्य के अवशेष हैं. सुरेग्वेल के निकट बसा गांव वहां मन्याओं के कारण जैसे ‘मनिया चौर’ (मनचौर) कहलाता था उसी प्रकार जालली के निकट स्थित इटलेश्वर महादेव और बिल्वेश्वर महादेव के कारण यहां बसा गांव मनिया गैर (मनैगैर) कहलाया.

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मनैगैर के सम्बन्ध में मैंने अपनी पिछली शोध योजनाओं में बताया था कि यह क्षेत्र धान उत्पादक क्षेत्र होने के कारण एक समृद्ध और धार्मिक तीर्थ स्थान के रूप में प्रसिद्ध था. ‘दैनिक जागरण’ because में प्रकाशित जगत रौतेला की एक रिपोर्ट के अनुसार इस स्थान से बहुत अधिक संख्या में प्राचीन शवाधानों के अवशेष मिले हैं. इस तथ्य के भी ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि द्वाराहाट के कत्यूरी राजाओं ने जहां जहां मंदिर निर्माण किया उसके निकट ‘मनिया’ नाम से यात्री विश्रामालयों का भी निर्माण अवश्य किया. यही कारण है कि जालली की निचली भूमि में निर्मित मन्याएं यहां ‘मनैगैर’ कहलाई. वर्त्तमान में ‘मनैगैर’ गांव की कृषि भूमि में ही आज यहां जालली का बाजार बसा हुआ है.

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जैसा कि मैंने पिछले लेख में बताया है कि यह स्थान पाली पछाऊं के कत्युरी राजाओं के आधिपत्य वाला क्षेत्र था. कत्यूरी कालीन वंशावली से ज्ञात होता है कि राजा मानदेव ने चौदहवीं शताब्दी में जहां एक ओर द्वाराहाट में मनदेव के नाम से ‘मनिया मन्दिर समूह’ का निर्माण किया था,वहां दूसरी ओर उन्होंने रानीखेत-जालली-मासी राजमार्ग पर भी so अनेक भव्य कत्युरी शैली के शैव मन्दिरों का भी निर्माण किया,जिनमें तिपोला स्थित सिलोर महादेव,जालली स्थित, बिल्वेश्वर महादेव और इटलेश्वर महादेव, मनिया चौरा स्थित सुरेग्वेल मन्दिर, तकुल्टी स्थित पंचायतन देवालय (देवाल) और उड़लेश्वर महादेव,नौबाड़ा स्थित बागेश्वर महादेव आदि कत्युरी काल के प्रसिद्ध मंदिरों के अवशेष आज भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यह स्थान कत्यूरीकालीन मन्दिर स्थापत्य और मूर्तिकला का महत्त्वपूर्ण केंद्र था, जो पूरी तरह आज भी गुमनामी के हालात में हैं, किसी भी इतिहास कार या स्थापत्यकला के विशेषज्ञों ने इस समूचे क्षेत्र का संज्ञान नहीं लिया.

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यहां के प्राचीन मंदिर तो धर्म विध्वंशकों द्वारा नष्ट किए जा चुके हैं, इसलिए उनके साथ मन्याओं का नष्ट हो जाना भी स्वाभाविक है, किंतु यहां आज भी इन कत्युरी कालीन मन्दिरों के टूटे हुए द्वार because स्तम्भों, मन्दिर के शिखर आमलकों,गर्भगृह की खंडित देवमूर्तियों के अवशेष इस तथ्य का जीवंत प्रमाण हैं कि यहां कत्युरी काल में भव्य देव संस्कृति का अस्तित्व रहा था. वर्त्तमान में प्राचीन मन्याएं तो नष्ट हो चुकी हैं किंतु इन मंदिरों के निकट बसे ‘मनचौर’ और ‘मनैगैर’ नाम के गांव इस तथ्य का प्रमाण हैं कि यहां भव्य नागर शैली के मंदिरों  के निकट बहुत अधिक संख्या में मन्याओं का अस्तित्व रहा होगा.

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आज समस्त कुमाऊं क्षेत्र से मन्याओं का अस्तित्व समाप्त हो चुका है. पर पुरातत्त्व विभाग के संरक्षण के कारण मन्याओं का एक ही अवशेष द्वाराहाट में विद्यमान है, जिसे ‘मनिया मन्दिर समूह’ के but नाम से जाना जाता है. इस मन्या मन्दिर समूह में कम से कम तीन चार रात्रि धर्मशालाओं की विधिवत वास्तुशात्रीय प्रतिष्ठा कत्यूरी राजा मानदेव ने करवाई थी. कत्यूरी काल में राजा मानदेव ने पाली, सुरेग्वेल तथा जालली के मंदिरों के निकट यात्रियों के रात्रिविश्राम हेतु भी अनेक ‘मन्याओं’ का निर्माण करवाया था.

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आगे पढ़िए- कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों में मन्याओं के ऐतिहासिक अवशेष

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के  रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में so ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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