समसामयिक

सामाजिक दायित्वशीलता निभाने में अग्रणी व्यक्तित्व

  • डॉ. अरुण कुकसाल

‘‘होम्योपैथिक चिकित्सा रोगी की रोग से लड़ने की शरीर में मौजूद क्षमता को बढ़ाकर रोगी को रोग से मुक्त कराने में साहयता प्रदान करती है. विशेषकर एलर्जिक रोगों के संपूर्ण एवं सुरक्षित उपचार के लिए होम्योपैथी को ऐलोपैथी याने आधुनिक चिकित्सा पद्धति से बेहतर माना जाता है. वर्तमान मानवीय जीवन शैली का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि उसमें एलर्जिक रोगों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है.

होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक जर्मन चिकित्सक और प्राकृतिक वैज्ञानिक सैमुअल हैनीमन थे. आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व ‘समान लक्षणों द्वारा समान लक्षणों का उपचार’ के सिद्धांत को अपनाते हुए सैमुअल हैनीमन ने यह प्रमाणित किया कि व्यक्तियों की आन्तरिेक प्राकृतिक प्रक्रिया के स्वभाव एवं प्रकृति में बहुत अंतर होता है. अतः उनकी इस विशिष्टता को रोग निदान के समय सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए.

होम्योपैथी शब्द की उत्पति ग्रीक भाषा से हुई है. यह ऐसी उपचार पद्धति का नाम है जिसमें रोगी शरीर के मौलिक लक्षणों के अनुकूल बड़ी कोमलता के साथ उपचार किया जाता है. होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक जर्मन चिकित्सक और प्राकृतिक वैज्ञानिक सैमुअल हैनीमन थे. आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व ‘समान लक्षणों द्वारा समान लक्षणों का उपचार’ के सिद्धांत को अपनाते हुए सैमुअल हैनीमन ने यह प्रमाणित किया कि व्यक्तियों की आन्तरिेक प्राकृतिक प्रक्रिया के स्वभाव एवं प्रकृति में बहुत अंतर होता है. अतः उनकी इस विशिष्टता को रोग निदान के समय सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए. इस आधार पर एक ही रोग के लिए अलग-अलग रोगियों की दवाइंयों में भी विभिन्नता रखी जानी चाहिए. हर रोगी की आन्तरिेक प्राकृतिक प्रक्रिया के स्वभाव एवं प्रकृति को जानकर उसी के अनुरूप की दवाइंयां उसके रोग निदान के लिए कारगर सिद्ध होती है. होम्योपैथी इसी आधार पर एलोपैथी से रोगी को रोग से छुटकारा दिलाने में बेहतर मानी जाती है.

आज का नागरिक स्वास्थ्य के प्रति निरंतर जागरूक हो रहा है वह एलोपैथिक दवाइयों के अनावश्यक दुष्प्रभावों के जाल में नहीं फसना चाहता है. वह अपनी आन्तरिेक प्राकृतिक प्रक्रिया के स्वभाव एवं प्रकृति के अनुरुप हेम्योपैथी उपचार के प्रति उन्मुख हुआ है. वर्तमान युग होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के विश्वव्यापी जागरण का है. विश्वव्यापी कोरोना ने इस प्रक्रिया को और भी प्रभावी एवं गतिशील बनाया है.’’

उक्त वक्तव्य प्रतिभावान और लोकप्रिय होम्योपैथी डाक्टर. छाया पैन्यूली भट्ट के हैं. ज्ञातव्य है कि डा. छाया (तोषी होम्योपैथिक क्लीनिक, श्रीनगर गढ़वाल) इस कोरोना काल में होम्योपैथी के माध्यम से गढ़वाल के दूर-दराज के इलाकों में आम जन की इम्यूनिटी बढ़ाने के उद्वेश्य से स्वास्थ्य जागरूकता अभियान में जुटी हैं. इस अभियान के तहत अब तक 10 हजार लोगों तक वह निःशुल्क होम्योपैथी दवाइयां बांट चुकी हैं.

डा. छाया ने कोरोना के विरुद्ध विकट परिस्थितियों में दिन-रात सक्रिय कर्मवीर पुलिसकर्मी हर समय सेहतमंद सुरक्षा कवच में रहे, इसी विचार से 25 मार्च, 2020 से श्रीनगर (गढ़वाल) से यह अभियान प्रारम्भ किया. इस नेक कार्य को बढ़ाते हुए वे अब दूर-दराज के इलाकों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और आम जनता का निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें होम्योपैथी दवाइयां प्रदान कर रही हैं.

डा. छाया ने कोरोना के विरुद्ध विकट परिस्थितियों में दिन-रात सक्रिय कर्मवीर पुलिसकर्मी हर समय सेहतमंद सुरक्षा कवच में रहे, इसी विचार से 25 मार्च, 2020 से श्रीनगर (गढ़वाल) से यह अभियान प्रारम्भ किया. इस नेक कार्य को बढ़ाते हुए वे अब दूर-दराज के इलाकों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और आम जनता का निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें होम्योपैथी दवाइयां प्रदान कर रही हैं. श्रीनगर के निकटवर्ती गांवों यथा- खंडा, गहड, बछेली, अमधार के साथ चमोली जनपद के नागनाथ तहसील के अंतर्गत ‘हरिशंकर गांव’, बामसू-काडंई (बचणस्यूं) सीरौं, चामी, नाव, देदार (असवालस्यूं) आदि अन्य अनेकों गांवों में वह जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों के माध्यम से इसको कार्यरूप दिया है. यह सिलसिला निरंतर जारी है और इसे व्यापक स्तर पर जन मुहिम बनाने के लिए वह समर्पित भाव से कार्य कर रही हैं.

डा. छाया के माता-पिता (प्रभा पैन्यूली-दिनेश पैन्यूली) शिक्षक रहे हैं. सेलाकुई (देहरादून) में उनका पैतृक घर है. सेलाकुई, ऋषिकेश, डाकपत्थर से छाया जी ने अपनी विद्यालयी शिक्षा प्राप्त की. विद्यार्थी जीवन में प्रतिभावान खिलाड़ी वह रही हैं. माता-पिता उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में निपुणता हासिल करने के लिए प्रेरित करते रहते. इसके लिए सभी सुविधायें जुटाने में वे कदापि भी देरी नहीं करते थे. उनकी इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवाओं में अपना कैरियर चुने. परन्तु वर्ष- 2004 में ऋषिकेश में बीएससी द्वितीय वर्ष में अध्ययन के दौरान उनका चयन होम्योपैथी स्नातक शिक्षा के लिए हो गया था. संयोग से उनके साथ उनकी छोटी बहिन भावना पैन्यूली का भी इसी में चयन हुआ था. अतः पारिवारिक सुविधा को देखते हुए दोनों बहिनों ने ‘सोलन होम्योपैथी मडिकल कालेज, हिमाचंल प्रदेश’ में प्रवेश ले लिया. मेडिकल पढ़ाई के दौरान ही वर्ष-2007 में उनका विवाह श्री देवेन्द्र भट्ट, श्रीनगर (गढ़वाल) से हुआ.

वर्ष 2009 में मेडिकल की पढ़ाई हासिल करने के बाद प्रशिक्षु के रूप में दून अस्पताल, देहरादून एवं अन्य निजी संस्थानों में डा. छाया ने अपनी सेवायें प्रदान की. वर्ष 2011 में श्रीनगर आकर उन्होने ‘तोषी होम्योपैथिक क्लीनिक, श्रीनगर गढ़वाल’ का संचालन आरम्भ किया. साथ ही एक साल तक विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं यथा- गढ़वाल विश्वविद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय, एनआईटी में निःशुल्क डाक्टरी सेवायें प्रदान की. वर्तमान में वे गढ़वाल विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केन्द्र में फिजीशियन (होम्योपैथी) के रूप में भी सेवायें दे रही हैं. समय-समय पर विविध शैक्षिक संस्थाओं और विशेष स्वास्थ्य शिविरों में वे अपनी निःशुल्क सेवायें समर्पित भाव से प्रदान करती हैं.

 

डा. छाया का मानना है कि ‘‘पहाड़ में सर्वाधिक रूप में लोगों में त्वचा विकार है. जिसका मुख्य कारण किन्हीं वस्तुओं और वातावरण से उत्पन्न एलर्जी है. अधिकांशतया मामलों में यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि किन वस्तुओं और स्थितियों के कारण रोगी में एलर्जी का प्रकोप है? नतीजन यह रोग ठीक होने का नाम ही नहीं लेता है. ऐलोपैथी इस विकार को कुछ समय के लिए दबा देता है परन्तु इसका स्थाई इलाज होम्योपैथी में ही है. डा. छाया का कहना है कि त्वचा के बाद पहाड़ी इलाकों में आइरन, विटामिन डी, पोषण और खून की कमी के लक्षण ज्यादातर देखने को मिलते हैं. इसमें भी पुरुषों की अपेक्षा महिलायें इससे ज्यादा त्रस्त हैं.’’

इस कोरोना के समय में लोगों में इन्जाइटी, उदासी, सफाई का फोबिया, चिडचिडापन, नींद न आना, घबराहट, शिथिलता और नकारात्मकता के लक्षण स्वाभाविक रूप में प्रभावी हुए हैं. इन सब विकारों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि आदमी के इम्यून सिस्टम (पाचन तंत्र) को मजबूती प्रदान की जाए. इसके लिए होम्योपैथी की दवाई एक अचूक माध्यम है

डा. छाया कहती हैं कि ‘‘इस कोरोना के समय में लोगों में इन्जाइटी, उदासी, सफाई का फोबिया, चिडचिडापन, नींद न आना, घबराहट, शिथिलता और नकारात्मकता के लक्षण स्वाभाविक रूप में प्रभावी हुए हैं. इन सब विकारों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि आदमी के इम्यून सिस्टम (पाचन तंत्र) को मजबूती प्रदान की जाए. इसके लिए होम्योपैथी की दवाई एक अचूक माध्यम है. क्योंकि मैं इसी पेशे में हूं. अतः सामाजिक दायित्वशीलता का निर्वहन करते हुए अपने आस-पास आम जन से लेकर कोरोना के विरुद्ध अग्रिम पंक्ति में तैनात कर्मशील व्यक्तित्वों के हर समय सेहतमंद रहने की जिम्मेदारी मेरी भी है. प्रसन्नता की बात यह भी है कि सामाजिक सेवा के इस काम में मेरे पति श्री देवेन्द्र भट्ट के साथ-साथ तमाम मित्र आत्मीय सहयोगी बन कर मेरे साथ सक्रिय हैं.’’

धन्यवाद और आभार, डा. छाया पैन्यूली भट्ट और उनकी टीम.

(लेखक वरिष्‍ठ सात्यिकार एवं शिक्षाविद् हैं)

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