September 19, 2020
संस्मरण

बाजार ने कौतिक की रौनक भी छीन ली

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—45

  • प्रकाश उप्रेती

आज बात “कौतिक” की. साल भर जिसका इंतजार बच्चे, बूढ़े, बड़े सबको रहता था, वह कौतिक था. कौतिक मतलब “मेला” हुआ. कौतिक की तब इतनी हाम थी कि परदेश गए लोग भी कौतिक पर घर पहुंच जाते थे. मासाब कौतिक के दिन हाज़िरि लगाकर छोड़ देते थे. ईजा कौतिक ले जाने और जाने देने के नाम पर हफ़्ते भर पहले से, जी भर काम करवा लेती थीं. कौतिक तब सिर्फ बाजार नहीं था.

हमारे यहाँ केदार में कौतिक लगता था. कौतिक जाने की इतनी हौंस होती थी कि रात से मुँह धोकर तैयार हो जाते थे. एक बार तो कौतिक के लिए पहनकर जाने वाले कपड़ों की रात में ही रिहर्सल हो जाती थी- “ईजा देख यो ठीक छै” (माँ देखना ये ठीक है). ईजा- “हो होय, ठीक छौ, राते बति किले फरफराट पड़ रहो त्यर” (हां, हाँ, ठीक है, रात से क्यों बैचेन हो रखा है). ईजा एक नज़र देख लेती थीं. हम मिर्च वाले सरसों के तेल से सर और मुँह दोनों चुपड़े रहते थे. ईजा कई  बार कहती थीं- “एतुक तेल किले चपोडि हा” (इतना तेल क्यों लगा लिया है). हम ईजा की बात कम सुनते और शीशा ज्यादा देखते रहते थे.

वो बेचारी एकदम तैयार होकर रात में सो गई. सुबह उठी कुछ काम किया और कौतिक को चली गई. अब पूरे कौतिक में सब उसी को देख रहे थे- “ओ जा भनुलिक क्रीम पोडर देखो ढैय्, कोस बन बे आ रहे”. कौतिक में सब उसे ही देख रहे थे. उसे लगा कि सुंदर लगने की वजह से लोग उसे देख रहे हैं. वो तो बाद में किसी ने उसे बता दिया तब…’

हमारी इन हरकतों को देखकर ईजा एक किस्सा सुनाया करती थीं. “एक औरत को तुम्हारी तरह कौतिक जाने की हौंस लगी हुई थी. रात से ही वह टिकुली-बिंदुली और लटि करके तैयार हो गई थी. रात में ही उसने तुम्हारी तरह अपने चेहरे पर खूब तेल चपोड लिया था और बार-बार अपने चेहरे पर हाथ फेर रही थी, यह सोचते हुए कि कल तो एकदम सुंदर बनकर कौतिक जाउँगी. वह थोड़ा काम करती फिर चेहरे पर हाथ मलती. खाना बनाते हुए तवे से उसके हाथ में ‘झोल’ (कालिख) लग गया था. वह जब-जब चेहरे पर हाथ फेरती झोल उसके चेहरे पर लगता जाता था. तब आज जैसे तुम बार-बार शीशा देख रहे हो, ऐसा नहीं होता था. वो बेचारी एकदम तैयार होकर रात में सो गई. सुबह उठी कुछ काम किया और कौतिक को चली गई. अब पूरे कौतिक में सब उसी को देख रहे थे- “ओ जा भनुलिक क्रीम पोडर देखो ढैय्, कोस बन बे आ रहे” (भनुली का क्रीम पाउडर देखो, कैसी बनकर आ रखी है). कौतिक में सब उसे ही देख रहे थे. उसे लगा कि सुंदर लगने की वजह से लोग उसे देख रहे हैं. वो तो बाद में किसी ने उसे बता दिया तब…’

ईजा की इस कहानी के बाद हमारा रात से ही तैयार हो जाने का उत्साह कम हो जाता था. हम मिनट -मिनट में शीशा देखते और बार-बार हाथ की तरफ देखते थे, कहीं हाथ में ‘झोल’ तो नहीं लगा है.

अगर गाँव का कोई कौतिक जाते हुए दिख गया तो हमारी बैचनी बढ़ जाती थी. हम ईजा को-“धता-धत, ईजा.. ओ ईज… आ ए, पारे बाखे वो जाण बेहगी”. ईजा हो होई.. कहतीं और पूरा घास लेकर ही घर लौटती थीं. उनको कौतिक का कोई ऐसा शौक नहीं था. बस हमारे चलने के लिए चल देती थीं. ईजा के आने तक फिर से हम 10 बार तैयार होकर चेहरा देख लेते थे.

कौतिक जाने के दिन तो सुबह अपने आप जल्दी नींद खुल जाती थी. ईजा जो काम बोले चट-चट कर देते थे, अक्सर ईजा कहतीं- “मैं भ्योव बे एक गुढो घा लि हानु तुम नहो बे पाणि ली हा ओ, 10-11बजे तक जुल कौतिक हैं” (मैं जंगल से घास काट लाती हूँ तुम नोह से पानी ले आओ फिर 10-11 बजे तक मेले चलेंगे). हम न तो कहते ही नहीं थे. चट-चट तीन-चार बर्तन पानी सार के रख देते थे. कौतिक जाने के दिन भैंस को भी घर पर ही पानी पिलाया जाता था इसलिए ज्यादा पानी लाना पड़ता था. ईजा के भ्योव से आने से पहले तक हम सभी बर्तन पानी से भर देते थे. बर्तन भर जाने तक अगर ईजा नहीं आ पाती थीं तो हमारी नज़र भ्योव की तरफ रहती थी. अगर गाँव का कोई कौतिक जाते हुए दिख गया तो हमारी बैचनी बढ़ जाती थी. हम ईजा को-“धता-धत, ईजा.. ओ ईज… आ ए, पारे बाखे वो जाण बेहगी” (आवाज लगाते हुए, मां , मां आ जाओ, सामने घरों से लोग जाने लगे हैं). ईजा हो होई.. कहतीं और पूरा घास लेकर ही घर लौटती थीं. उनको कौतिक का कोई ऐसा शौक नहीं था. बस हमारे चलने के लिए चल देती थीं. ईजा के आने तक फिर से हम 10 बार तैयार होकर चेहरा देख लेते थे.

ईजा घर आकर गाय-भैंसों को घास-पानी पिलातीं. हम कौतिक जाने को बेचैन हो रहे होते थे-“ईजा हिट ये.. जब सब आजिल तब जुले हम” (माँ चलो, जब सब आ जाएंगे तब जाएंगे क्या हम). ईजा कहतीं- हिटो तुम..(चलो तुम) लेकिन हम जाते ईजा के साथ ही थे.

ईजा सब काम निपटा कर बाल बनाती और एक झोला लेकर चल देती थीं. हम ईजा के आगे-आगे ऐसे चल रहे होते मानो चांद पर जा रहे हों. कभी-कभी धीरे तो कभी दौड़ लगाते जाते थे. जाते-जाते बिनोली का गाँव पार कर वहाँ पहुँच जाते थे जहाँ से “केदारक कौतिक” दिखाई देने लगता था. वहाँ खड़े होकर ही मन भर कौतिक को देख लेते थे. ईजा तब तक आगे चली जाती थीं. फिर हम दौड़ लगाकर ईजा के पास पहुंच जाते थे. ईजा जाते हुए रास्ते में कहने लग जाती थीं- “जल्दी आ जुल हाँ घर के भैंस -गोरू इकले छैं” (जल्दी आ जाएंगे, घर पर गाय-भैंस अकेले हैं). यह सुनते ही गाय-भैंस हमें दुश्मन से कम नहीं लगते थे. हम बिना उन्हें जवाब दिए चलते रहते थे. ईजा फिर समझाने लग जातीं- “भीत में अरामेल हिटिए हां” (नदी पार करने के लिए लकड़ी के रखे फट्टों में आराम से चलना). तब  हम हर बात पर हां..हां ही कहते रहते थे.

चलते-चलते सड़क पर पहुंच जाते थे. सड़क पर पहली दुकान ही ताऊजी की थी. वो कौतिक के दिन जलेबी बना रहे होते थे. बाकी दिन हम इधर-उधर हो भी जाएँ लेकिन उस दिन उनके सामने जाकर – ‘ताऊजी नमस्कार’ जरूर कहते थे. इसके पीछे का कारण तो बताने की जरूरत नहीं है. वो भी हमें देखकर एक जलेबी दे देते थे और ईजा को बोलते- “ब्वारी घर हैं जान ढैय् जलेबी लिजये हां” (बहू घर जाते हुए जलेबी ले जाना). हम जलेबी खाते और पैंट पर हाथ पोंछते ही जहाँ मेन मेला लगा होता, वहाँ की तरफ चल देते थे. रास्ते में अखरोट बेचने वालों से लेकर कंचे बेचने तक मिलते थे. अब हम ईजा के बराबर में चलने लग जाते थे. रास्ते में ईजा को जानने वाले लोग मिलते जाते लेकिन ईजा थोड़ी-थोड़ी बात कर आगे बढ़ती रहती थीं.

हम ईजा के साथ-साथ हर दुकान पर जाते थे लेकिन गुब्बारे और खिलौनों की दुकान पर हमारी आँखे अटकी रह जाती थीं. हम वहाँ से खिसकते हुए अतिरिक्त समय लेते थे. ईजा हमारे मन को समझते हुए कहती थीं- “हिट पैली पुर कौतिक देख ले पै, घर हैं जान ध्या ल्यूंल” (चल पहले पूरा मेला देख लेते हैं फिर घर जाते हुए लेंगे). हम ईजा पर भरोसा करके चल देते थे. 

केदार के कौतिक में ईजा और हमें 3-4 लोगों के मिलने की आस होती थी. “गलगों” (गांव का नाम) और “तिमिल टनहो” (गाँव का नाम) वाली बुआ जी,  ‘मकोट’ (ननिहाल) की अम्मा और ‘डूंगरी’ (गाँव का नाम) के बुबू जी. हमको इनकी आस इसलिए रहती थी कि एक तो ये पैसे देते थे दूसरा जलेबी खाने और घर के लिए भी देते थे. ईजा अलग से मिलने कम ही जा पाती थीं तो उनका मकसद भेंट हो जाने का भी होता था. हमारी आँखे तो मेले में उनको खोजती रहती थीं.

कौतिक में पहुँचते ही दुकान ही दुकान दिखाई देती थीं. एक तरफ रायता, छोले, पकौड़ी, जलेबी बिक रहे होते थे तो दूसरी तरफ गुब्बारे, खिलौने, बर्तन, ताबीज़, चूड़ी, बिंदी, झुमके और कड़े बेचने वाले होते थे. थोड़ा आगे जाकर अलग-अलग तरह के कपड़े वाले दिखाई दे जाते थे. हम ईजा के साथ-साथ हर दुकान पर जाते थे लेकिन गुब्बारे और खिलौनों की दुकान पर हमारी आँखे अटकी रह जाती थीं. हम वहाँ से खिसकते हुए अतिरिक्त समय लेते थे. ईजा हमारे मन को समझते हुए कहती थीं- “हिट पैली पुर कौतिक देख ले पै, घर हैं जान ध्या ल्यूंल” (चल पहले पूरा मेला देख लेते हैं फिर घर जाते हुए लेंगे). हम ईजा पर भरोसा करके चल देते थे.

पूरा कौतिक घूमने के बाद ईजा पूछती थीं- “कै खाला” (क्या खाएगा), पकौडी. ईजा 5 रुपए के पकौडी ले लेती थीं. बिना जलेबी के कौतिक नहीं होता था. फिर थोड़ा जलेबी ईजा घर के लिए लेती और कुछ हम वहीं पर खाते थे. उसके बाद ईजा घर चलने को कहती लेकिन हमारा मन कौतिक छोड़कर जाने को करता ही नहीं था. ईजा फिर कहती थीं- “हिट जै ल्यणु तिकें ली ले, ज्यादे पैंस नि छैं” (चल जो लेना है तुझे ले ले परन्तु ज्यादा पैसे नहीं हैं). हमारे चेहरे पर रौनक आ जाती थी. फटाफट आँखों में बसी गुब्बारे वाली दुकान पर ईजा को ले जाते थे, वहां से एक गुब्बारा और पीं-पीं आवाज करने वाली पिपरी लेते थे. खिलौने वाली दुकान से एक डमरू और पेप्सी वाला चश्मा भी ले लेते थे. ईजा हमें सामान दिलाने में कंजूसी नहीं करती थीं. अपने लिए तो हाथ में सामान ले लेकर छोड़ देती थीं लेकिन हमें संतोष भर दिला देती थीं.

केदार में कौतिक अब भी लगता है लेकिन वैसी उत्सुकता कहाँ! कौतिक में अब समोसा और चाऊमीन पहुँच गए हैं. हमारे रायते और पकौड़ियों की पूछ कम हो गई है. ईजा बात-बात में कहती हैं- “च्यला अब पेलिकेक जेसि बात जै के छु”. मैं हां.. हां.. कहते हुए ईजा की बातों पर ठहर सा जाता हूँ…

घर को आते हुए हम आँखों पर चश्मा, एक हाथ में गुब्बारा और दूसरे हाथ में पिपरी बजाते हुए आते थे.  गुब्बारा तो घर पहुँचने से पहले ही कांटे में लगकर फूट जाता था. गुब्बारा फूटते ही ईजा का पंच- ‘ले अब खा’ तैयार रहता था. उसके बाद डमरू और पिपरी बजाते हुए घर पहुँचते थे. कौतिक की थकान सबसे ज्यादा लगती थी. इसलिए उस दिन जलेबी खाकर ही सो जाते थे.

केदार में कौतिक अब भी लगता है लेकिन वैसी उत्सुकता कहाँ! कौतिक में अब समोसा और चाऊमीन पहुँच गए हैं. हमारे रायते और पकौड़ियों की पूछ कम हो गई है. ईजा बात-बात में कहती हैं- “च्यला अब पेलिकेक जेसि बात जै के छु”(बेटा अब पहले जैसी बात थोड़ा न है). मैं हां.. हां.. कहते हुए ईजा की बातों पर ठहर सा जाता हूँ…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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