सुनीता भट्ट पैन्यूली

मैं स्त्री-स्वभाव वश स्त्रियों की because अभिरुचि, विचार, स्वभाव, आचरण, राष्ट्रीय विकास में उनके योगदान, उन्नयन का अध्यन करते-करते भारत के  स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारी वीरों के बलिदान से संबद्ध उस इतिहास के पन्ने पर पहुंच गयी हूं जहां उनका साथ देने वाली महिला क्रांतिकारियों के बारे में शायद ही हम में से किसी को पता है.

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दिल्ली में फतेहपुरी से चांदनी because चौक, घंटाघर तक जाने वाली सड़क का नाम ‘सुशीला मोहन मार्ग’ है किंतु सुशीला मोहन कौन शख़्शियत हैं शायद ही बहुत से लोगों को पता हो?

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इतिहास अगर मार्गदर्शक और सचेत रहा है देश की स्वाधीनता में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली वीरांगनाओं के प्रति तो निश्चित ही उन महान महिला क्रांतिकारी विभूतियों की यश-गाथा किसी न because किसी रुप में हम  सभी तक पहुंचनी चाहिए. स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के बलिदान और उनकी बहादुरी के प्रति या तो हम अनभिज्ञ हैं या फिर हमने बहुत आसानी से  उन देश प्रेम में डूबी महिलाओं के संघर्ष और बलिदान because को भूला दिया है. इन्हीं महान क्रांतिकारी महिलाओं की फ़ेहरिस्त में एक नाम है सुशीला मोहन का जो देश की आजादी की मुहिम में संपूर्ण रुप से सक्रिय होकर भी इतिहास के पन्नों में कहीं गुम होकर रह गयी हैं.

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सुशीला दीदी का जन्म पांच मार्च 1905 को ग्राम दत्तोचूहड़ (वर्तमान पाकिस्तान)में हुआ. दीदी की शिक्षा जालंधर के आर्य कन्या महाविद्यालय में हुई.उनके पिता सेना में डाक्टर थे पर विचारों से आर्यसमाजी.पढ़ाई के दौरान दीदी लज्जावती और आर्य कन्या महाविद्यालय की प्रिंसिपल शन्नो देवी के साथ-साथ क्रांतिकारी दलों से जुड़े because छात्र-छात्राओं के संपर्क में आयीं. उसी दौरान पंजाब से कुछ छात्राओं का एक दल देहरादून हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिस्सेदारी करने गया उसमें सुशीला दीदी भी थीं वहां उनकी मुलाकात लाहौर के नेशनल कालेज से आये because छात्रों से हुई,जो भगत सिंह आदि से परिचित थे.उसके बाद दीदी भगवतीचरण और उनकी पत्नी दुर्गा देवी (भाभी) से मिलीं जो भगत सिंह के बहुत क़रीबी थे उसके बाद से ही  भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ रहे क्रांतिदल में सुशीला दीदी  भीशामिल हो गयीं.

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सुशीला दीदी की देशभक्ति की प्रबल भावना और क्रांतिकारी आंदोलन में उनकी प्रमुख भुमिका का  अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि काकोरी कांड के मुकदमें की पैरवी के लिए because उन्होंने अपनी स्वर्गीय मां द्वारा उनकी शादी के लिए जुटाया गया दस तोला सोना दान में दे दिया. 19 दिसंबर ,1927 को काकोरी के चार क्रांतिकारियों की फांसी की सजा का समाचार सुनकर बीए का पहला पर्चा देते हुए because दीदी परीक्षा हाल में बेहोश हो गयी थीं उस केस के क्रांतिकारियों को जेल से छुड़ाने के लिए उन्होंने अपनी सोने की चुड़ियां उतारकर दे दीं.

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8 नवंबर 1927 साइमन कमीशन जो कि 1928 में भारत आया. लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व कर रहे पंजाब केसरी लाला लाजपतराय पर निर्मम लाठी प्रहार करने because वाले पुलिस अधीक्षक सांडर्स के वध के बाद जब भगत सिंह छद्म वेश में लाहौर से दुर्गा भाभी के साथ कोलकाता पहुंचे तो स्टेशन पर उन्हें लेने भगवतीचरण के साथ सुशीला दीदी भी पहुंची थी.

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भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के केंद्रीय असेंबली में विस्फोट करने के लिए जाने से पहले लाहौर से दिल्ली पहुंचकर दीदी और दुर्गा भाभी ने सुखदेव के साथ कश्मीरी गेट के because पास पहुंच कर इन दोनों क्रांतिकारियों को अपने रक्त से तिलक कर अश्रुपूर्ण विदाई दी थी.

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(लेखिका साहित्यकार हैं एवं विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं.)

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