संस्मरण

देहरादून से “द्वारा” गांव वाया मालदेवता…

लघु यात्रा संस्मरण

सुनीता भट्ट पैन्यूली

Treasure of thoughts are with us. They only have to be discovered….

मेरे अन्दर  पेड़ नदी,पहाड़, झरने,जंगली फूलों से सराबोर प्रकृति के विभिन्न आयामों की सुंदर व अथाह  प्रदर्शनी सजी हुई है किंतु फिर भी मेरा मन नहीं भरता है और मैं शरणोन्मुख because हो जाती हूं  नदियों, पहाड़ों और सघन जंगलों से बात करने की तृषा-तोष हेतु.

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स्मृतियों और अनूभूतियों के चिंतन का so कारवां  चलता रहता है मेरी यात्राओं में मेरे साथ-साथ जिससे सृजन के वेग को मेरी कलम की हौसला-अफ़जाई द्वारा एक बल मिलता है.

मेरे यात्रा अनुभव,मेरे संस्मरण और मेरे मोबाइल के कैमरे की जुगलबंदी कुछ इस तरह हो जाती है कि, या सीधा-साफ कहूं मेरे अनुभव और मेरे मोबाइल के बीच अच्छी बनने लगी है because जिससे मेरी लघु- या चिर यात्राओं  के गंतव्य की भौगोलिक-स्थिती वहां का खान-पान,वहां की वनस्पति और खासकर उस खास परिवेश के मानवीय स्वभाव की क्रिया-प्रतिक्रिया और उस पर हमारी संवेदनाओं के प्रभाव को मेरी यात्रा के अनुभवी पन्नों में अभिवृद्धि करना मेरे लिए बहुत आसान हो जाता है.

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मेरा मोबाइल कैमरा और मेरी but अनूभूतियों के स्पर्श का ताल-मेल प्रकृति  और मानवीय मनोवृत्ति के विभिन्न आयामों के  सौंदर्य को किस प्रकार सहेज  पाया है  आप सभी के हवाले.

आज 2अक्टूबर का दिन है बच्चों because की छुट्टी है अचानक से चाय बनाते हुए ख़्याल आया कि मौसम भी ख़ुशनुमा है क्यों ना मालदेवता घूमकर आया जाये?

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मालदेवता के हरे-भरे बुग्याल.. जहां मेरी सांसें चलती हैं  किंतु मन मेरी देह को बिना बताये ना जाने कहां-कहां चर कर आ जाता है. मालदेवता  क्या कहूं मेरी उम्मीदों का पड़ाव,मेरी अनूभूतियों का ऊद्गम,मेरी आत्मा के डूबते सूरज का उत्कर्ष.

पतिदेव को चाय देकर अपनी इच्छा because जतायी बावज़ूद इसके मैं जानती थी कि उनका उत्तर हां में ही होगा. फिर भी पूछ ही लिया.. उन्हें भी पता है कि मुझे देहरादून में केवल एक जगह ही तो जाना पसंद है वह है मालदेवता, किंतु पति का प्रत्युत्तर था कि “मैं तुम्हें ऐसी जगह ले जाऊंगा जहां मुझे सौ फीसदी  उम्मीद है कि तुम घर लौटना ही नहीं चाहोगी” मैंने पूछा ऐसी कौन सी जगह ढ़ूढी है आपने मेरे लिए मालदेवता में जहां से मैं लौटना ही नहीं चाहूंगी? कहने लगे तुम चलो तो सही..!

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आनन-फानन में मैंने बच्चों को नींद से जगाकर मालदेवता चलने के लिए पूछा,दोनों बेटियां भी सहर्ष चलने को तैयार हो गयीं.

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दरअसल मेरा व्यक्तिगत मानना है कि  कभी-कभी तो ठीक है बच्चों को शापिंग,माल, रेस्तरां में  ले जाना  किंतु हमें अपने बच्चों को प्रकृति के सानिध्य में  अक्सर ले जाना चाहिए ताकि वे हवा कि ख़ुशबू पहचान सकें,घास-पर्णों का रंग व आकृतियां उनके ऊपर चलने का नर्म अहसास,धूप की ताबिश,बारिश की बूंदों का because स्वभाव,कीट-पतंगों की आंख-मिचौली,मवेशियों का स्वभाव,पेड़ों के इंद्रजाल का जंगल में अस्तित्व,आकाश की विस्तीर्णता,मिट्टी की उपयोगिता और सबसे अहम सृष्टि के प्रत्येक सृजन की अपनी-अपनी महत्ता को सहज रुप में जान सकें. यक़ीन मानिए  बच्चों को प्रकृति का सामीप्य मिलने से निश्चित  ही उनमें एक स्वच्छ मानसिकता विकसित होगी.

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तक़रीबन हम साढ़े बारह बजे घर से निकल रहे हैं बीच वाली बड़ी बहन को भी उनके परिवार के साथ चलने के लिए मना लिया है.हम सभी साथ-साथ चलकर रायपुर में गाड़ी रोक लेते हैं बच्चों ने अपनी पसंद के चिप्स,कुरकुरे,चाकलेट कोल्ड ड्रिंक ले लिये हैं.बहन के बेटे ने मोमोज़ खरीद लिये हैं मैंने पतिदेव को कहा because आज मेरा जलेबी खाने का मन है उन्होंने जलेबी,गुलाब-जामुन दोनों ही ख़रीद लिये हैं हमारा कारवां अब सीधे मालदेवता की ओर चल रहा है काली,चमकीली,सीधी-सपाट चौड़ी रोड उस पर सरपट दौड़ती हमारी कार हर बार मुझे नये अहसासों से भर देती है. जब सड़क के किनारे छोले,कुलचे,भुट्टे की रेढियां,मोमोज बेचने वाले दिखने लगें समझो कि हम मालदेवता की ओर पहुंचने वाले हैं.

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फिर आता है मालदेवता का भीड़-भाड़ वाला गांव का बाज़ार  जिसकी पहचान सड़क के किनारे पेड़ के झुरमुटों के बीच प्राचीन शिव का  पौराणिक मंदिर है जिसे देखने के because लिए आपको कार से लंबी गर्दन निकालनी पड़ती है क्योंकि  स्थानीय परिवहनों का जमावड़ा ही इतना है कि उस भीड़ के पीछे मंदिर कहीं नज़र ही नहीं आता जहां सड़क के दोनों किनारों पर ढाबे ही ढाबे है,बेकरी है फल सब्जियों की दुकानें हैं यानि कि शहर और गांव की तर्ज़ पर टिका हुआ सुपर-फास्ट मार्केट.

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हमने क्योंकि अपनी ज़रूरत का because सामान रायपुर से ही ले लिया है इसलिए हम मालदेवता के पुल की ओर बढ़ रहे हैं.  मालदेवता के because पुल से होकर गुजरना व उसके नीचे से पुल की ओर ऊपर कुलांचे मारती स्वच्छ-निर्मल नदी का निनाद सुनना अलौकिक अनुभूति है मेरे लिए.

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मालदेवता के बीचों-बीच बहती इस नदी के जीवन के  हर रंगों को मैंने बहुत क़रीब से देखा है. जुलाई-अगस्त में यह अपने तटबंधों को तोड़ती हुई काली सर्पिणी सी गु्स्से में फुफकारती हुई so विनाश लीला रचती हुई अपने मद में बहती है.

सर्दियों में  डूबते सूरज और उगते चांद but की संधि में एक चमकीली रेखा सी मरे हुए सर्प की भांति भी मैंने इसे निश्चेत लेटे हुए देखा है. सितंबर से अक्टूबर में यही नदी झक, सफेद दुकूल सी हवा में लहराती  हुई चहकती सी बहती देखी है मैंने.

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आधे घंटे में नदी का स्पर्श because और उसके साथ तस्वीरें खिंचवाकर हम मालदेवता से आगे की ओर बढ़ रहे हैं .पतिदेव रास्ते भर  किसी रावत जी से बात कर रहे हैं,जैसे कि रावत जी क्या रूम खाली हैं? अच्छा कल  बुकिंग पर लगे थे, हम लंच वहीं करेंगे, क्या उपलब्ध है लंच में? वगैरह-वगैरह

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बहन को नदी में उतरकर थोड़ी देर के लिए उसकी अठखेलियों को निहाकर उसकी लहरों के साथ खेलकर तस्वीरें लेनी थीं अत: हम थोड़ी  देर के लिए मुख्य सड़क से because नीचे की ओर नदी की ओर चले गये.

आधे घंटे में नदी का स्पर्श और उसके साथ तस्वीरें खिंचवाकर हम मालदेवता से आगे की ओर बढ़ रहे हैं .पतिदेव रास्ते भर  किसी रावत जी से बात कर रहे हैं,जैसे कि रावत जी because क्या रूम खाली हैं? अच्छा कल  बुकिंग पर लगे थे, हम लंच वहीं करेंगे, क्या उपलब्ध है लंच में? वगैरह-वगैरह मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हम कहां जा रहे हैं? पूछ रही हूं तो जवाब मिल रहा है मुझे तुम चलो तो सही..!

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रास्ता तो जाना-पहचाना है मेरे लिए because क्योंकि हम अक्सर यहां आते हैं किंतु आज आभास हो रहा कि कहीं नयी जगह जा रहे हैं.

ख़ैर मालदेवता से क़रीब पच्चीस मिनट because आगे हम “द्वारा” गांव पहुंच गये हैं शांत व नीरवता में सड़क के किनारे पांति में खड़े पेड़ मानो हमारे  संवादों से उत्पनन  गतिरोध को झेल नहीं पायेंगे.

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पतिदेव ने मुख्य सड़क से कटकर कार ऊपर ऊंचाई में अवस्थित नीले और सफेद टिन से बने  ऊंची टांगों और ऊंची छत वाले घर की ओर मोड़ ली है.हमारे उस जगह पहुंचने पर एकbecause घुंघराले बालों वाला, पीली टी-शर्ट पहने हुए लड़के ने हमारा स्वागत किया. पतिदेव ने जब उन्हें रावत जी कहकर संबोधित किया तब मुझे आभास हुआ कि इन्हीं रावत जी से पतिदेव की बात चल रही थी सुबह से. आख़िर अब हम सभी पर रहस्य खुला कि इन रावत जी का “द्वारा गांव में होम स्टे है “Blue and White Home Stay “के नाम से.

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तीन के क़रीब बज गया है हम सभी को अब तक बहुत भूख भी लग आयी है, सीढ़ियों से चलकर हम सीधे ऊपर आ गये हैं. सड़क से बहुत ऊंचाई पर है यह होम स्टे. सीढ़ियों के ख़त्म because होते ही बाल्कनी फिर किचन और उसके बाद एक-दूसरे से सीधे लगे हुए दो साधारण से कमरे सुख-सुविधायें जिनमें कुछ नहीं सिवाय कमरों में पंखे,बैड और साइड टेबल्स और बाथरूम में गीजर के लेकिन मुझ जैसी को क्या सुख-सुविधाओं की जिसे कोई खास आकांक्षा नहीं  बनिस्बत  प्रकृति की गोद की नीरवता,दाल-रोटी,सब्जी और किताबों के..अब मुझे समझ आया क्यों पतिदेव कह रहे थे कि ऐसी जगह ले जाऊंगा जहां से तुम लौटोगी ही नहीं.

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यहां पहुंचने के पांच मिनट में ही because रावत जी ने डाइनिंग में खाना लगा दिया है वह अकेले ही यहां-वहां भाग रहे हैं. अंदर किचन में चूड़ियों की खनखनाहट से आभास हो रहा है कि कोई स्त्री हमारे लिए रोटी बना रही है, पूछने पर अंदाज़ा सही निकला.. रावत जी ने बताया कि उनके कोई गांव की संबंधी उनकी मदद के लिए यहां काम करती है साथ में उसका छोटा बेटा भी है जो छोट-मोटे काम कर दिया करता है.

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रावत जी ने पहले डाइनिंग में  मिक्स दाल रखी जो कि सभी दालों छोले-काले चने,उड़द,अरहर,दला-चना और ना जाने क्या-क्या मिक्स करके बनवायी थी जिसे खाने से पहले सभी मुंह सिकोड़ रहे because थे उसके बाद उन्होंने कद्दू की सब्जी रखी यह कहते हुए कि यह नीचे  मेरे खेत की ही है,फिर उन्होंने आलू-बीन्स की सब्जी रखी यह कहकर कि यह भी खेत से ही निकाली है फिर पहाड़ी खीरे और प्याज  का सलाद,हरी मिर्च वह भी घर की यह सुनकर मैं तो जैसे अभिभूत ही हो गयी कि सारा भोजन जैविक है और  फिर क्या था सभी के साथ मैंने ठेट पहाड़ी स्टाइल में  खाने  को सपोड़कर खाकर खाने का  जमकर लुत्फ़ उठाया.

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अब जो हमारे खाने का क्रम शुरू because हुआ तो बहुत देर से जाकर ही रूका इतना सुस्वादु भोजन, घर जैसे स्वाद वाला कि तृप्ति  ही हो गयी मन की. खाना खाने के बाद मैं अकेली वापस सीढ़ियों से नीचे उतर गयी हूं .नीचे से देखने पर  ब्लू-एंड वाइट स्टे हाउस बहुत ख़ूबसूरत लग रहा है चारों ओर  साग-सब्जी  और जंगली फूलों से घिरा हुआ.

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सीढ़ी से नीचे उतरकर मुझे  बांय तरफ़ एक पतली सी पगडंडी दिखाई दी उसके किनारे कद्दू की बेल की सजी हुई झालरों ने मुझे बहुत आकर्षित किया और  मैं उसमें घुसती चली गयी, because पगडंडियों से आगे जहां देखो लौकी,कद्दू,ककड़ी,तोरी,करेले की  सरसराती हुई बेलों के मजमें ,होम स्टे के नीचे सीढ़ीदार खेत में गुटमुटे मचान और उनके भीतर बैठने की व्यवस्था.उन मचानों के ऊपर भी सब्जी की बेलें  लहराती हुई.कहीं  बेलों पर पकी हुई ककड़ी लटकी हुई कहीं पर छोटी-छोटी तोरियां और कद्दू ,लौकी लटकते हुए, कहीं पर छोटे-छोटे हरी मिर्च के खेत ,कहीं पर तुलसी उगी हुई क्यारियां कहीं पर जंगली गेंदे ज़मीन पर फैले हुए.मैंने तुलसी के पेड़ों के बीच ,यहां तक कि खेतों का  कोई टुकड़ा नहीं छोड़ा जहां मैंने अपनी तस्वीरें नहीं खिंचवाई हों.

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शाम को चाय के साथ रावत जी से because पकोड़े बनवाने को कहा था पतिदेव ने किंतु खाना ही इतना खा लिया था कि पकौड़े खाने का सवाल ही नहीं उठता था .

मेरा तो बिल्कुल भी घर जाने का मन नहीं हो रहा है मेरा क्या किसी का भी मन नहीं हो रहा है .हम सभी ने यहीं स्टे करने का मन बना भी लिया है किंतु दूसरे दिन मायके में पिताजी के श्राद्ध के लिए हमें शाम को ही लौटकर जाना पड़ रहा है.

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शाम के साढ़े छः बज गये हैं रात होने को आयी है मैंने रावत जी से व्यक्तिगत रुप से बात की वह थोड़ी असुविधाओं के लिए संकुचित हो रहे हैं. किंतु जब मैंने कहा आप का होम स्टे मेरे लिए तो लाख आधुनिक सुविधाओं से लैस होटलों से अच्छा है और  मुझे अपने जीवन जीने के तरीकों में जो शामिल करना है वह यहां भरपूर है. because यह सुनकर रावत जी ख़ुशी से बाग-बाग हो गये हैं. मैंने रावत जी के  होमस्टे के बारे में लिखने के लिए के लिए इजाज़त मांग ली है और उन्होंने सहर्ष दे भी दी है.

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अंत में रावत जी को मैंने जल्दी ही because कम से कम दो दिन  “ब्लू-वाइट होम स्टे” में रूकने का आश्वासन देकर हाथ जोड़कर उनसे विदा ले ली है.

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कोहरे ने “ब्लू-वाइट होम स्टे “को अपने आगोश में ले लिया है रात घनी हो गयी है.  इसी घने अन्धकार में बारिश की बूंदाबांदी में हम  घर लौट रहे हैं. “द्वारा” गांव के आस-पास, because ऊपर-नीचे मेरी कलम की रोशनाई के लिए बहुत कुछ बिखरा पड़ा है.

दोबारा आने पर ही समेट पाऊंगी इसी उम्मीद के साथ अलविदा! ब्लू एंड वाइट होम स्टे.

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Himantar Uttarakhand

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

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