March 5, 2021
जल विज्ञान

उत्तराखंड के ऐतिहासिक नौले : जल संस्कृति की अमूल्य धरोहर

भारत की जल संस्कृति-34

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

उत्तराखण्ड में जल-प्रबन्धन-5

उत्तराखंड की जल समस्या को लेकर मैंने पिछली अपनी पोस्टों में परम्परागत जलप्रबंधन और वाटर हार्वेस्टिंग से जुड़े गुल,नौलों और धारों पर जल विज्ञान की दृष्टिसे प्रकाश डाला है. इस लेख में  परम्परागत ऐतिहासिक नौलों और उनसे उभरती जलसंस्कृति के बारे में कुछ जानकारी देना चाहूंगा.

वाटर हारवैस्टिंग

कुमाऊं,गढ़वाल के अलावा हिमाचल प्रदेश और नेपाल में भी जल आपूर्ति के परंपरागत प्रमुख साधन नौले ही रहे हैं. ये नौले हिमालयवासियों की समृद्ध-प्रबंध परंपरा और लोकसंस्कृति के प्रतीक हैं. कौन नहीं जानता है कि अल्मोड़ा नगर,जिसे चंद राजाओं ने 1563 में राजधानी के रूप में बसाया था,वहां परंपरागत जल प्रबंधन के मुख्य स्रोत वहां के 360 नौले ही थे. इन नौलों में चम्पानौला, घासनौला, मल्ला नौला, कपीना नौला, सुनारी नौला, उमापति का नौला, बालेश्वर नौला,बाड़ी नौला, नयाल खोला नौला, खजांची नौला, हाथी नौला, डोबा नौला,दुगालखोला नौला आदि प्रमुख हैं. लेकिन अपनी स्थापना के लगभग पांच शताब्दियों के बाद अल्मोड़ा के अधिकांश नौले लुप्त हो कर इतिहास की धरोहर बन चुके हैं और इनमें से कुछ नौले भूमिगत जलस्रोत के क्षीण होने के कारण आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. जल संकट की वर्त्तमान परिस्थितियों में आज भूमिगत जलविज्ञान की इस महत्त्वपूर्ण धरोहर को न केवल सुरक्षित रखा जाना चाहिए, बल्कि इनके निर्माण तकनीक के संरक्षण व पुनरुद्धार की भी महती आवश्यकता है.

वाटर हारवैस्टिंग

नौले उत्तराखंड की ग्राम संस्कृति तथा लोकसंस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं. लेकिन हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो नौलों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते खासकर नई पीढ़ी के युवावर्ग को इनके बारे में कम ही जानकारी है. जल वितरण की नई व्यवस्था के कारण इन नौलों का प्रचलन अब भले ही बंद हो गया है किन्तु जल संकट के समाधान की दृष्टि से इन पुराने नौलों की उपादेयता आज भी बनी हुई है.नौलों का निर्माण भूमिगत पानी के रास्ते पर गड्डा बनाकर उसके चारों ओर से सीढ़ीदार चिनाई करके किया जाता था. इन नौलों का आकार वर्गाकार होता है और इनमें छत होती है तथा कई नौलों में दरवाजे भी बने होते हैं. जिन्हें बेहद कलात्मक ढंग से बनाया जाता था. इन नौलों की बाहरी दीवारों में देवी-देवताओं के सुंदर चित्र भी बने रहते हैं. ये नौले आज भी स्थापत्य एवं वास्तुशिल्प का बेजोड़ नमूना हैं.

वाटर हारवैस्टिंग

नौलों का भूमिगत जलस्रोत अत्यन्त संवेदनशील जल नाड़ियों से संचालित रहता है. इसलिए विकासपरक गतिविधियों तथा समय-समय पर होने वाले भूकम्पीय झटकों से इन नौलों के जलप्रवाह जब बाधित हो जाते हैं तब ये नौले भी सूखने लगते हैं. उत्तराखण्ड हिमालय में अन्धाधुन्ध विकास एवं कंकरीट की सड़कें बनने के कारण भी अधिकांश नौले जलविहीन होने से सूख गए हैं. एक सर्वेक्षण के अनुसार नौलों के लिए प्रसिद्ध कुमाऊ के द्वाराहाट स्थित अधिकांश नौले इसी प्राकृतिक प्रकोप के कारण सूख गए.वराहमिहिर के जल विज्ञान से प्रेरणा लेकर उत्तराखण्ड में नौलों की स्थापना भूमिगत जल नाड़ियों और महानाड़ी के सम्मिलन स्थल पर की जाती थी. पहाड़ों में आज भी ‘सीर फूटना’ का व्यवहार होता है,जिसका तात्पर्य जल की शिराओं या जल नाड़ियों से है. इसकी जलवैज्ञानिक चर्चा मैंने अपने लेख “भारत की जल संस्कृति -15” में की है. नौले या जलाशय के चारों ओर विभिन्न प्रकार के वृक्षों को लगाया जाने का उल्लेख भी वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में आया है, जिनमें आंवला, बड़, खड़िक, शिलिंग, पीपल, बरगद, तिमिल, दुधिला, पदम, आमला, शहतूत आदि के वृक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. इन वृक्षों की सहायता से नौलों में भूमिगत जल नाड़ियां सक्रिय होकर द्रुतगति से जल को रिचार्ज करती रहती हैं.

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उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में 13-14 सौ वर्ष प्राचीन जो नौला आज भी सुरक्षित है वह नौला है बागेश्वर जिले के गडसर गांव में स्थित बद्रीनाथ का नौला. यह नौला उत्तराखंड का सबसे प्राचीन नौला माना जाता है. कत्यूरी वंश के राजाओं ने 7वीं शताब्दी ई.में इस नौले का निर्माण किया था.

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उत्तराखण्ड के जल प्रबन्धन के सांस्कृतिक स्वरूप को जानने के लिए ‘पीपल्स साइन्स इन्स्टिट्यूट’, देहरादून से प्रकाशित डॉ.रवि चोपड़ा की लघु पुस्तिका ‘जल संस्कृति ए वाटर हारवेस्टिंग कल्चर’ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इस लघु पुस्तिका में उत्तराखण्ड के इन ऐतिहासिक नौलों के बारे में जो महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है उस पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि उत्तराखंड में नौलों का इतिहास डेढ़ हजार वर्ष पहले तक ले जाया जा सकता है. उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में 13-14 सौ वर्ष प्राचीन जो नौला आज भी सुरक्षित है वह नौला है बागेश्वर जिले के गडसर गांव में स्थित बद्रीनाथ का नौला. यह नौला उत्तराखंड का सबसे प्राचीन नौला माना जाता है. कत्यूरी वंश के राजाओं ने 7वीं शताब्दी ई.में इस नौले का निर्माण किया था. जल विज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर बना होने के कारण यह नौला आज भी जल से भरपूर रहता है.

दरअसल,उत्तराखण्डवासियों के लिए नौले जल आपूर्ति के साधन मात्र ही नहीं हैं बल्कि धार्मिक,सांस्कृतिक तथा सामाजिक सन्निवेश के रूप में भी इनकी खास पहचान बनी हुई है.इन नौलों के माध्यम से उत्तराखंड में प्रचलित अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की स्थापत्य कला और वास्तुकला का निदर्शन हुआ है.भारतीय परम्परा के अनुसार जलाशय के निकट ही देवमन्दिर तथा देव प्रतिमाओं का भी निर्माण किया जाता है ताकि इन जल निकायों की शुद्धता और पवित्रता बनी रहे और भारतीय परम्परा में जल को जो ईश्वर तुल्य आस्थाभाव प्राप्त है उसे ही नौलों और धारों के माध्यम से मूर्त रूप दिया जा सके.

उत्तराखंड के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नौले

उत्तराखंड में ज्यादातर नौलों का निर्माण कत्यूर व चंद राजाओं के समय में किया गया था.जैसा कि मैंने बताया है कि नौलों के इतिहास की दृष्टि से बागेश्वर स्थित बद्रीनाथ का नौला उत्तराखण्ड का सर्वाधिक प्राचीन नौला माना जाता है जिसकी स्थापना सातवीं शताब्दी ई.में हुई थी.

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चंपावत के बालेश्वर मंदिर का नौला उत्तराखंड का सर्वोत्कृष्ट सांस्कृतिक वैभव सम्पन्न नौला है. इस नौले की स्थापना 1272 ई. में चंदवंश के राजा थोरचंद ने की थी. इस पर उत्कीर्ण शिलालेख बताते हैं कि राजा कूर्मचंद ने1442 ई. में इसका जीर्णोद्धार किया.चम्पावत की सांस्कृतिक पहचान बना यह नौला उत्तराखंड की वास्तुकला और स्थापत्य कला का भी एक अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है.बड़ी बड़ी प्रस्तर शिलाओं पर सुंदर नक्काशियां उकेरी गई हैं. यहां अनेक देवमूर्तियाँ के ध्वंशावशेष हैं जिसमें एक मूर्ति भगवान बुद्ध से बहुत मिलती जुलती है.

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चम्पावत-मायावती पैदल मार्ग पर ढकन्ना गांव में स्थित ‘एकहथिया नौला’ भी एक सांस्कृतिक महत्त्व का नौला है. इस नौले की दीवारों में ऊपर से नीचे तक अनेक देव आकृतियां अंकित हैं.‘एकहथिया नौला’ कुमाऊं की प्राचीन स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण है. लोगों का विश्वास है कि इस नौले का निर्माण एक हाथ वाले शिल्पी ने किया था. इसके अलावा अल्मोड़े का पंथ्यूरा नौला, रानीधारा नौला,तुलारामेश्वर नौला,द्वाराहाट का जोशी नौला, गंगोलीहाट का जाह्नवी नौला, डीडीहाट का छनपाटी नौला आदि अनेक प्राचीन नौले भी अपनी अद्भुत कलाकारी के बेजोड़ नमूना हैं.

अल्मोड़ा के निकट 14-15वीं शताब्दी के लगभग निर्मित स्यूनारकोट का नौला आज भी मौजूद है. बावड़ी के चारों ओर बरामदा है, जिसमें प्रस्तर प्रतिमाएं लगी हुई हैं. मुख्य द्वार के सामने दो नक्काशीदार स्तम्भ बने हुए हैं.बावड़ी की छत कलात्मक रूप से विचित्र है.इसकी दीवारों में देवताओं और उनके उपासकों के चित्र अंकित हैं. यह अल्मोड़ा जनपद का सबसे प्राचीन एवं कला की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ नौला माना जाता है.

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परंपरागत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप अधिकांश ये नौले समुचित रख-रखाव न होने के कारण जलविहीन हो गए हैं और इन नौलों के माध्यम से आविर्भूत पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक वैभव भी हमारी लापरवाही के कारण नष्ट होने के कगार पर है.

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गढ़वाल में भी टिहरी नरेशों द्वारा नौलों, धारों और कुंडों का निर्माण किया गया था. गढ़वाल के प्रसिद्ध नौलों,धारों और कुंडों में रुद्रप्रयाग जिले में गुप्तकाशी स्थित ‘गंगा-यमुना धारा’ तथा नारायणकोटि स्थित ‘नवग्रह मंदिर धारा’ और ‘बहकुंड’ (ब्रह्मकुंड) स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना हैं. किन्तु विडम्बना यह है कि उत्तराखंड के परंपरागत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप अधिकांश ये नौले समुचित रख-रखाव न होने के कारण जलविहीन हो गए हैं और इन नौलों के माध्यम से आविर्भूत पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक वैभव भी हमारी लापरवाही के कारण नष्ट होने के कगार पर है. पुरातत्व विभाग की उदासीनता के कारण भी नौलों की पुरातन जल संस्कृति आज बदहाली की स्थिति में है.ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप इन नौलों की रक्षा करना और इन्हें संरक्षण देना क्षेत्रीय जनता और उत्तराखंड सरकार दोनों का साझा दायित्व है.

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जल, जमीन और जंगलों के संरक्षण से जुड़ी एक पर्यावरणवादी समस्या भी है. यह लोक संस्कृति के संरक्षण की समस्या भी है. हम यदि अपनी देवभूमि को हरित क्रांति से जोड़ना चाहते हैं तो हमें अपने पुराने नौलों, धारों, खालों,तालों आदि जलसंचयन के संसाधनों को पुनर्जीवित करना होगा.

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दरअसल, नौलों और गधेरों के जलस्रोतों के साथ हमारे उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और लोक साहित्य के गहरे सांस्कृतिक स्रोत भी जुड़े हुए हैं. वर्त्तमान हालात में नौलों और जलधारों के सूखने का मतलब है एक जीवंत पर्वतीय जल संस्कृति का लुप्त हो जाना हजारों वर्षों की अमूल्य धरोहर का विनाश हो जाना. इसलिए जल की समस्या महज एक उपभोक्तावादी समस्या नहीं बल्कि जल, जमीन और जंगलों के संरक्षण से जुड़ी एक पर्यावरणवादी समस्या भी है. यह लोक संस्कृति के संरक्षण की समस्या भी है. हम यदि अपनी देवभूमि को हरित क्रांति से जोड़ना चाहते हैं तो हमें अपने पुराने नौलों, धारों, खालों,तालों आदि जलसंचयन के संसाधनों को पुनर्जीवित करना होगा.

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पारंपरिक जल-स्रोत यथा नोले, धारे, चाल, खाल बचाने की मुहिम जलसंचेतना की दिशा में अच्छी पहल है.आज आवश्यकता है चीड़ के स्थान पर चौड़ी पत्तियों वाले बाँज, बुरांश, उतीस, आदि वृक्षों को लगाए जाने की ताकि भूमिगत जल रिचार्ज हो सके. प्रदेश शासन को इस मुहिम में अपना भरपूर योगदान देना चाहिए.जल समस्या का सबसे बड़ा समाधान है जल के प्रति जनसामान्य के बीच जागरूकता पैदा करना.

*सभी सांकेतिक चित्र गूगल से साभार*

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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