November 25, 2020
संस्मरण

इस्कूल से ई-स्कूल तक : ये कहाँ आ गए हम…

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़ भाग—2

  • रेखा उप्रेती

स्कूल बंद हैं. नहीं, बंद नहीं हैं… आजकल मोबाइल के रास्ते घर के कोने तक पहुँच गए हैं. मेरा बच्चा बिना नहाए-धोए, बिना यूनिफार्म पहने उस कोने में बैठा अध्यापिका से पाठ सुन रहा है. अध्यापिका का चेहरा भर दीखता है स्क्रीन पर… . सहपाठी गायब हैं और शरारतें भी… बच्चे को सामाजिक प्राणी बनाने वाला एकमात्र ज़रिया स्कूल ही बचा था… उसके भी द्वार बंद हैं.

एक हमारा इस्कूल था, इस ई-स्कूल के मुकाबले कितना ‘कूल’ था. आइए आपको ले चलती हूँ- “प्राइमरी पाठशाला, माला”

छात्रों की टोली बारी-बारी अँजुरी भर-भर कर पानी पीती. उस ठंडे-मीठे सोते के पानी से हम फिर स्फूर्ति से भर उठते. कभी-कभी मुँह में पानी भरकर वापस आते और जब मुँह में पानी को ‘होल्ड’ करने की क्षमता चुक जाती तो उसे पी लेते. यह हमारा जुगाड़ था पानी स्टोर करने का.

मेरे घर से एकदम खड़ी चढ़ाई थी इस्कूल के लिए.. ऊबड़-खाबड़, टेढ़ी-मेड़ी, पथरीली पगडंडियों से गुज़रता वह रास्ता एकदम सूनसान था. घर और इस्कूल के बीच में सिर्फ एक बाखई (घरों की पंक्ति) पड़ती थी. तख्ती बस्ता उठाए उस चढ़ाई को पार कर जब इस्कूल पहुँचते तो प्यास लग आती थी. पानी का प्रबंध तो था नहीं, तो हम तख्ती-बस्ता रख पानी पीने निकल पड़ते थे. इस्कूल की दूसरी तरफ, लगभग घर जितनी ही दूरी पर ‘धारा’ था. ‘धारा’ यानी जहाँ पानी का सोता फूटता था वहाँ एक टीन की पत्ती लगाकर जलधार बना दी जाती थी. छात्रों की टोली बारी-बारी अँजुरी भर-भर कर पानी पीती. उस ठंडे-मीठे सोते के पानी से हम फिर स्फूर्ति से भर उठते. कभी-कभी मुँह में पानी भरकर वापस आते और जब मुँह में पानी को ‘होल्ड’ करने की क्षमता चुक जाती तो उसे पी लेते. यह हमारा जुगाड़ था पानी स्टोर करने का. उधर इस्कूल में घंटी बज जाती और प्रार्थना के बोल गूँजते हुए कानों में पड़ने लगते “वह शक्ति हमें दो दयानिधे..” और हम पूरी शक्ति से दौड़ लगा देते. आधा रास्ता पार करते ही ‘जन-गण-मन’ शुरू हो जाता और हम जहाँ के तहाँ खड़े हो जाते…

इस्कूल में दो ही कमरे थे. एक में हेड-मास्साब का दफ्तर था और दूसरे में चौथी-पाँचवीं के बच्चे बैठते थे. छोटी कक्षाओं के लिए इस्कूल का बड़ा-सा अहाता था. हम इस्कूल की सफ़ाई करते, टाट-पट्टी बिछाते, ब्लैकबोर्ड बाहर निकालते. फिर पंक्तिबद्ध टाट पर बैठ जाते. सामने हिमालय का धवल शिखर दिखता, ऊपर नीला निखरा आकाश…पंछियों के कोलाहल के साथ-साथ हम भी गाते… दो इक्कम दो..दो दुनी चार… और ‘इमला’ लिखते.. दवात में रखा हुआ कमेट सूख जाता तो साथियों से उधार लेना पड़ता. “अरे, थोड़ा कमेट दे दे रे.. कल लौटा दूँगी.” कभी टाट-पट्टी के नीचे की मिट्टी को खुरचकर हम उसमें कमेट का धोल डाल दबा देते. हमें यकीन था कि इससे नीचे मिट्टी की खान बन जाएगी और हम कमेट के धनी हो जाएंगे. दो-चार दिन बाद उस जगह को खुरचने पर मिट्टी सफ़ेद मिलती और हम समझते कि खान जम रही है.

कभी-कभी कोई नवविवाहित जोड़ा दल-बल के साथ इसी रास्ते से गुज़रता. हम पढ़ाई बीच में छोड़ उनके पीछे लग जाते. दुल्हन का मुँह देखना हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे. एक-एक कर सब छोटे से घूँघट में छुपी उसकी मुखड़ी देखते.. दुल्हन लजाती सी मुस्कुराती और दूल्हा भी.

इस्कूल से सटा हुआ देवी का थान था. उसका रास्ता इस्कूल के अहाते के बीच से था. कभी-कभी कोई नवविवाहित जोड़ा दल-बल के साथ इसी रास्ते से गुज़रता. हम पढ़ाई बीच में छोड़ उनके पीछे लग जाते. दुल्हन का मुँह देखना हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे. एक-एक कर सब छोटे से घूँघट में छुपी उसकी मुखड़ी देखते.. दुल्हन लजाती सी मुस्कुराती और दूल्हा भी. कभी देवी पूजन के बाद हम लड़कियों को कन्या-पूजन के लिए इस्कूल से बुलवा लिया जाता.

स्कूल के पास का देविथान (जीर्णोद्धार के बाद)

हाट्टैम (हाफ़-टाइम) में हम अहाते से बाहर निकल आते. झाड़ियों से हिसालू, पंय, किल्मोड़ी, घिंगारू चुन-चुन कर खाते, पकड़म-पकड़ाई खेलते या पानी पीने धारे की ओर निकल जाते.

एक बार न जाने कैसे मैं लिखने में इतना मशगूल हो गयी कि पता ही नहीं लगा और सब एक-एक कर कमरे से निकल गए. मैं शायद दरवाज़े के पीछे की तरफ कोने में थी. किसी ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया और दरवाज़ा बंद कर सब चले गए. जब मुझे स्थिति का भान हुआ तब तक देर हो चुकी थी. दरवाज़े के बाहर ताला और कमरे में अकेली छूट गयी मैं.

मौसम ख़राब होता तो सारी कक्षाओं को अन्दर एक साथ बैठा दिया जाता. हर टाट-पट्टी  पर अलग-अलग दर्जे के विद्यार्थी बैठ जाते. मास्साब हर कक्षा को कुछ काम दे देते और हम कॉपी या तख्ती घुटने में रख, सर झुकाए कुछ न कुछ लिखते रहते.

एक बार न जाने कैसे मैं लिखने में इतना मशगूल हो गयी कि पता ही नहीं लगा और सब एक-एक कर कमरे से निकल गए. मैं शायद दरवाज़े के पीछे की तरफ कोने में थी. किसी ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया और दरवाज़ा बंद कर सब चले गए. जब मुझे स्थिति का भान हुआ तब तक देर हो चुकी थी. दरवाज़े के बाहर ताला और कमरे में अकेली छूट गयी मैं. इस्कूल के आसपास का इलाका वीरान हुआ करता था. वह आम रास्ता भी नहीं था कि कोई आते-जाते मेरी पुकार सुन ले. देवी के मंदिर में पर्व-त्योहारों पर ही आवाजाही रहती थी. थोड़ी देर में अँधेरा हो जाएगा. बत्ती तो क्या मोमबत्ती भी नहीं होती थी इस्कूल में.. पहाड़ों में रातें वैसे भी काफ़ी डरावनी होती हैं. घुप्प अँधेरा और जंगल की सांय-सांय … मुझे कोई ढूँढने इस्कूल तक आ जाएगा ऐसा आश्वस्त करने वाला ख्याल भी नहीं आया ज़हन में.

… मैं फिर से खिड़की पर चढ़ी. पूरी मशक्कत लगाकर अन्दर सरकी. कमरे में कूदी. बस्ते से किताबें निकाल कर बाहर डालीं, फिर तख्ती-बस्ता को बाहर किया और पुन: अपनी मुंडी सलाखों से सरकाकर मैंने खुद को बाहर निकला. फिर बस्ते में किताबें भर, घर की ओर दौड़ लगा दी.

मैं उन दिनों काफ़ी डरपोक किस्म की प्राणी हुआ करती थी… आज भी हूँ… पर उस दिन बड़ी हिम्मत दिखाई. कमरे के दूसरी तरफ खिड़की थी. उसमें लोहे की सीधी-सीधी सलाखें थीं. रोशनी की किरण वहीं से छनकर आई. मैंने अपनी मुंडी टेड़ी कर उन सलाखों के बीच डालने कोशिश की. पर वह अटक रही थी. उन दिनों बहुत लम्बे और मोटे बाल हुआ करते थे जिन्हें दीदी दो चोटियों में गूंथकर लाल रिबन से दोहरा कर बाँध देती थी. उस पर फूल भी बने होते थे. दिमाग चल गया मेरा. दोनों चोटियाँ खोली. बाल सीधे किए, फिर मुंडी सलाखों के बीच डाली.

स्कूल परिसर से दिखता विहंगम दृश्य

इस बार जुगत चल गयी. मुंडी निकली तो सांप की तरह मैंने खुद को भी सलाखों के बीच से सरका लिया और बाहर की तरफ़ कूद गयी. ऐसी खुशी मिली मानो कोई उम्रकैदी खुद को जेल से मुक्त करने में सफल रहा हो. मगर अगले ही क्षण मेरी खुशी काफ़ूर हो गयी. ध्यान आया कि तख्ती बस्ता अन्दर ही रह गए. अक्ल तब शायद घुटनों में थी. बिना बस्ता घर कैसे जाया जाए भला… तो मैं फिर से खिड़की पर चढ़ी. पूरी मशक्कत लगाकर अन्दर सरकी. कमरे में कूदी. बस्ते से किताबें निकाल कर बाहर डालीं, फिर तख्ती-बस्ता को बाहर किया और पुन: अपनी मुंडी सलाखों से सरकाकर मैंने खुद को बाहर निकला. फिर बस्ते में किताबें भर, घर की ओर दौड़ लगा दी.

तब यह घटना इतनी सामान्य लगी कि घर पहुँचकर इस का ज़िक्र तक नहीं किया और इस्कूल आना-जाना बदस्तूर जारी रहा. लेकिन आज जानती हूँ कि वह घटना मेरे अपने आत्मविश्वास के लिए संजीवनी थी. शायद उसी का असर है कि जीवन में जब भी कोई मुसीबत आती है तो हिम्मत भी पीछे-पीछे चली आती है…

अब ई-स्कूल में पढ़कर यह ‘अनुभव की सीख’ कहाँ से पाएगा मेरा बच्चा… जो अभी कमरे के कोने मैं बैठा मोबाईल से पाठ पढ़ रहा है…

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं) 

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