
नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला – 6

दो दशकों से सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित दीपा कौशलम न केवल घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव से जूझ रही महिलाओं की आवाज़ बन रही हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी निरंतर कार्य कर रही हैं।
समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए अनेक कानून बने, जागरूकता अभियान चले और महिला सशक्तीकरण के बड़े-बड़े दावे किए गए। इसके बावजूद लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा और रूढ़िवादी सामाजिक सोच आज भी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। आए दिन समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ अन्याय और उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती हैं। अधिकांश लोग इन घटनाओं के मूकदर्शक बने रहते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पीड़ित महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं।
ऐसी ही एक सशक्त आवाज़ हैं उत्तराखंड की सामाजिक कार्यकर्ता दीपा कौशलम, जो पिछले दो दशकों से सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं और विशेष रूप से वंचित, आर्थिक रूप से कमजोर तथा घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को न्याय और सम्मान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।
शिक्षा से सामाजिक सेवा तक का सफर
देहरादून में जन्मी दीपा कौशलम बचपन से ही मेधावी छात्रा रही हैं। उनके पिता का नाम रमेश चंद्र और माता का नाम चंद्रकला है। दो बहनों में दीपा बड़ी हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई देहरादून में ही पूरी की। अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर दीपा की हिंदी लेखन में भी विशेष रुचि है। वे संस्मरण, सामाजिक विषयों पर लेख और कभी-कभी कविताएं भी लिखती हैं। उनकी लेखनी में समाज की उन महिलाओं की पीड़ा और संघर्ष झलकता है, जिनकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है।

पढ़ाई पूरी होने के बाद दीपा का विवाह हुआ। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने अपने सपनों और सामाजिक सरोकारों को भी जीवित रखा। साधारण व्यक्तित्व वाली दीपा के संकल्प असाधारण हैं। समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर महिलाओं की परिस्थितियों को नजदीक से समझने की उनकी जिज्ञासा ने उन्हें सामाजिक कार्यों की ओर प्रेरित किया।
शिक्षिका से सामाजिक कार्यकर्ता बनने की कहानी
दीपा कौशलम ने तीन केंद्रीय विद्यालयों में अंग्रेजी विषय की स्नातकोत्तर शिक्षिका (पीजीटी) के रूप में कई वर्षों तक सेवाएं दीं। हालांकि उनका उद्देश्य केवल कक्षा में विद्यार्थियों को शिक्षित करना नहीं था। वे शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से समाज के अन्य वर्गों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाना चाहती थीं।
उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ बेटी के जन्म के लगभग एक वर्ष बाद आया। बेटी की देखभाल के लिए घर में कोई उपलब्ध नहीं था। ऐसे में उन्होंने आसपास शिशु देखभाल केंद्र (क्रेच) की तलाश शुरू की। इसी दौरान उनका संपर्क एक ऐसे केंद्र से हुआ, जिसका संचालन अस्तित्व ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा था।
केंद्र में नियमित आने-जाने के दौरान उन्हें ट्रस्ट की अन्य सामाजिक गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली। महिलाओं और बच्चों के लिए किए जा रहे कार्यों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। धीरे-धीरे वे अस्तित्व ट्रस्ट से जुड़ गईं और सामाजिक सेवा उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
वंचित महिलाओं के लिए न्याय की लड़ाई
दीपा पिछले लगभग दस वर्षों से विशेष रूप से उन महिलाओं को परामर्श, मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान कर रही हैं, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं तथा अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज़ उठाने की स्थिति में नहीं हैं। घरेलू हिंसा, पारिवारिक विवाद, लैंगिक भेदभाव और आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याओं से जूझ रही महिलाओं की सहायता के लिए उन्हें कई बार अदालतों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं।

दीपा का मानना है कि केवल कानूनी सहायता उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। जब तक महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बनेंगी, तब तक उनके लिए अन्याय और शोषण के विरुद्ध मजबूती से खड़ा होना कठिन रहेगा। यही कारण है कि वे महिलाओं को परामर्श देने के साथ-साथ उन्हें स्वरोजगार, कौशल विकास और आजीविका के अवसरों से जोड़ने का भी प्रयास करती हैं। उनके लिए महिला सशक्तीकरण केवल एक नारा नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने योग्य बनाने का सतत अभियान है।
‘जागोरी’ ने निखारी प्रशिक्षण और नेतृत्व क्षमता
दीपा अपने सामाजिक कार्यों और प्रशिक्षण कौशल को विकसित करने में दिल्ली की महिला अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘जागोरी’ की महत्वपूर्ण भूमिका मानती हैं। इस संस्था के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण (ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स) का अवसर मिला। इससे उनकी संवाद क्षमता, समन्वय कौशल, नेतृत्व और प्रशिक्षण देने की दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
विशेष रूप से लैंगिक समानता और महिला अधिकारों के विषय में उनकी समझ और अधिक व्यापक हुई। दीपा का कहना है कि आज भी समाज में ‘जेंडर’ अर्थात लैंगिक समानता की अवधारणा को लेकर स्पष्ट समझ का अभाव है। अक्सर महिला अधिकारों की चर्चा को महिला बनाम पुरुष के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है, जबकि वास्तविक उद्देश्य दोनों के बीच समानता, सम्मान और न्यायपूर्ण संबंध स्थापित करना है।

उनके अनुसार परिवार और समाज में व्याप्त भेदभाव को सामान्य व्यवहार मान लेने की प्रवृत्ति भी एक बड़ी समस्या है। कई बार महिलाएं कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद अपने काम और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए लौट जाती हैं, लेकिन उनके संघर्ष को उचित महत्व नहीं दिया जाता। वे मानती हैं कि लैंगिक समानता के लिए केवल महिलाओं को जागरूक करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पुरुषों, परिवारों और पूरे समाज की सोच में बदलाव लाना भी आवश्यक है।
पहाड़ से मैदान तक सामाजिक सरोकार
दीपा कौशलम का कार्यक्षेत्र केवल देहरादून तक सीमित नहीं रहा। उन्हें जब भी अवसर मिला, उन्होंने उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर काम किया। महिला अधिकारों, आजीविका संवर्धन, जलवायु परिवर्तन और जल संरक्षण जैसे विषयों पर उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। पर्वतीय क्षेत्रों में कार्य करते हुए उन्होंने वहां की महिलाओं के जीवन, कठिन परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को भी समझने का प्रयास किया।
उनका मानना है कि पहाड़ की महिलाओं का जीवन अनेक संघर्षों से भरा होता है। परिवार, आजीविका, जल और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जिम्मेदारियों के बीच उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में महिलाओं के सशक्तीकरण के प्रयास स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए।
पुराने कपड़ों से खिलौने, महिलाओं के लिए आजीविका
वर्तमान में दीपा देहरादून स्थित अस्तित्व ट्रस्ट की विभिन्न गतिविधियों का संचालन और समन्वय कर रही हैं। ट्रस्ट में 14 सदस्यों की टीम के साथ वे महिलाओं और बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए कार्यरत हैं। उनके प्रमुख कार्यों में घरेलू कामगार महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करना, उन्हें आजीविका के अवसरों से जोड़ना तथा वंचित बस्तियों के बच्चों तक शिक्षा के संसाधन पहुंचाना शामिल है। मलिन बस्तियों के बच्चों के लिए पुस्तकालय की व्यवस्था और पुस्तकें उपलब्ध कराने की दिशा में भी वे सक्रिय हैं, ताकि आर्थिक अभाव किसी बच्चे की शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा में बाधा न बने।

उनकी एक उल्लेखनीय पहल पुराने कपड़ों के पुनर्चक्रण से खिलौने तैयार करवाना है। इसके माध्यम से जहां अनुपयोगी कपड़ों का रचनात्मक इस्तेमाल होता है, वहीं महिलाओं को कौशल विकास और आय अर्जित करने का अवसर भी मिलता है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण और महिला आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ने का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
संघर्ष और साहस को मिला राष्ट्रीय सम्मान
महिला अधिकारों और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में दीपा कौशलम के योगदान को विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया गया है। वर्ष 2016 में उन्हें दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दलाई लामा से जुड़ी प्रतिष्ठित संस्था WISCOMP द्वारा ‘आइकॉन ऑफ करेज’ (Icon of Courage Award) से सम्मानित किया गया। महिलाओं के संघर्ष, साहस और अधिकारों के लिए उनके प्रयासों को देखते हुए उत्तराखंड से उनका चयन इस सम्मान के लिए किया गया था।

इसी वर्ष सामुदायिक कार्यों में योगदान के लिए उन्हें सी. सुब्रमण्यम अवार्ड भी प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त वर्ष 2026 में उन्हें बच्चीराम कौंसवाल स्मृति सम्मान से भी सम्मानित किया गया। ये सम्मान उनके लंबे सामाजिक संघर्ष, समर्पण और महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने के निरंतर प्रयासों की पहचान हैं।
शिक्षा और जागरूकता ही सशक्तीकरण का आधार
आज भी दीपा कौशलम देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में संघर्षशील महिलाओं और युवतियों को शिक्षा, स्वरोजगार, संगठन निर्माण और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका विश्वास है कि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों की वास्तविक रक्षा तभी संभव है, जब वे शिक्षित, जागरूक और आर्थिक रूप से सक्षम हों। दीपा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए बड़े पद, संसाधन या प्रसिद्धि आवश्यक नहीं होती। इसके लिए संवेदनशील दृष्टि, दृढ़ संकल्प और समाज के वंचित वर्गों के साथ खड़े रहने का साहस चाहिए।

नवदुर्गा सीरीज की छठी कड़ी में दीपा कौशलम ऐसी नारी शक्ति के रूप में सामने आती हैं, जो स्वयं आगे बढ़ने के साथ उन महिलाओं का हाथ भी थामती हैं, जिन्हें समाज ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा। उनका संघर्ष केवल महिलाओं को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, जागरूक और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए सक्षम बनाने का अभियान भी है।
दीपा कौशलम की कहानी उस नारी शक्ति की कहानी है, जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती है, संघर्ष से पीछे नहीं हटती और दूसरों के जीवन में उम्मीद की नई रोशनी जगाती है।
