उत्तराखंड हलचल

पलायन  ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है

पलायन  ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है

उत्तराखंड हलचल
भाग-एक पहले कृषि भूमि तो बचाइये!चारु तिवारी विश्वव्यापी कोरोना संकट के चलते पूरे देश में लॉक डाउन है. अभी इसे सामान्य होने में  समय लगेगा. इसके चलते सामान्य जन जीवन प्रभावित हुआ है. देश में नागरिकों  का एक बड़ा तबका है जो अपनी रोटी रोजगार के लिए देश के महानगरों या देश से बाहर रह रहा है. उसके सामने अब अपने जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया है. स्वाभाविक रूप से उसका सबसे सुरक्षित ठिकाना अपना गांव-घर ही है. यही कारण है बड़ी संख्या में  शहरों से लोग अपने-अपने गांव जा रहे हैं. उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है, जहां  से पिछले तीन-चार दशकों  से पलायन तेज हुआ है. राज्य बनने के दो दशक बाद तो यह रुकने की बजाय बढ़ा है. कोरोना के चलते बड़ी संख्या में लोग पहाड़ लौटे हैं. लोगों  को लगता है कि इसी बहाने लोग गांव में  रहने का मन बनायेंगे. सरकार भी इसे एक अवसर मान रही है. उत्तराखंड ग्राम विकास  एवं पलायन आ...
नाराज़ होने की जगह ‘पहाड़वाद’ की बात क्यों नहीं करते जनाब?

नाराज़ होने की जगह ‘पहाड़वाद’ की बात क्यों नहीं करते जनाब?

उत्तराखंड हलचल
ललित फुलारा लगातार 'पहाड़वाद' के सवाल को उठा रहे हैं. दिल्ली/एनसीआर में बड़े ओहदों पर बैठे पहाड़ियों की अपनों के प्रति निष्क्रियता और पहाड़ी अस्मिता पर जोरदार कटाक्ष कर रहे हैं. इसे लेकर विवाद भी हो रहा है. युवा समर्थन कर रहे हैं तो कई लोगों को उनकी यह बातें चुभ भी रही है. हिमांतर ने इसी विषय पर उनसे पूछा था जिसके जवाब में उन्होंने हमें यह लेख लिखकर दिया है-ललित फुलाराप्रिय साथियों/पहाड़ियों... जब मैं स्नातकोत्तर का विद्यार्थी था, तो हर तरह के 'वाद' का विरोध करता था. मुझे लगता था ये चीजें हमारे भीतर हर तरह की कट्टरता को बढ़ावा देती हैं. भाषाई अस्मिता/क्षेत्रीय अस्मिता का धुर विरोधी भी रहा. अपनी सत्ता के भाव का अर्थ ही है, अपने भीतर अहंकार का भाव लाना, श्रेष्ठता का बोध होना. पर भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता से मुझे बेहद लगाव और प्रेम रहा....जब मैं 'पहाड़वाद' कह रहा हूं, तो आपक...
यमुना घाटी: जल संस्कृति की अनूठी परम्परा

यमुना घाटी: जल संस्कृति की अनूठी परम्परा

उत्तराखंड हलचल, साहित्‍य-संस्कृति
यमुना—टौंस घाटी की अपनी एक जल संस्कृति है. यहां लोग स्रोतों से निकलने वाले पानी को देवताओं की देन मानते है. इन नदी—घाटियों में जल स्रोतों के कई कुंड स्थापित हैं.​ विभिन्न गांवों में उपस्थित इन पानी के कुंडों की अपनी—अपनी कहानी है. इस घाटी के लोग इन कुंडों से निकलने वाले जल को बहुत ही पवित्रत मानते हैं और उनकी बखूबी देखरेख करते हैं. जल संस्कृति में आज हम ऐसे ही कुंडों से आपको रू—ब—रू करवा रहे हैं. यमुना घाटी के ऐसे ही कुछ जल कुंडों बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ प​त्रकार प्रेम पंचोली—जल संस्कृति भाग—2कमलेश्वर महादेव कमलेश्वर नामक स्थान का इस क्षेत्र में बड़ा महत्व है लोग शिवरात्री के दिन उक्त स्थान पर व्रत पूजने पंहुचते है श्रद्धालुओं का इतना अटूट विश्वास होता है कि यहां नंगे पांव पंहुचते है जबकि इस स्थान पर जाने के लिए तीन किमी पैदल मार्ग है. यहां पानी के दो धारे है तथा एक कुण्ड भी है...
जौनसार के गौरव वीर केसरी चंद की शहादत की याद

जौनसार के गौरव वीर केसरी चंद की शहादत की याद

इतिहास, उत्तराखंड हलचल
चारु तिवारीवीर केसरी चंद के शहादत दिवस (3 मई) पर विशेष जौनसार. उत्तराखंड के ऐतिहासिक थाती का महत्वपूर्ण क्षेत्र. विशिष्ट सांस्कृतिक वैभव की भूमि. जीवंत और उन्मुक्त जीवन शैली से परिपूर्ण समाज. यहां की लोक-कथाओं और लोक-गाथाओं में बसी है यहां की सौंधी खुशबू. लोक-गीत, नृत्यों और मेले-ठेलों में देख सकते हैं लोक का बिंब. यहीं चकरौता के पास है, रामताल गार्डन (चौलीथात). यहां प्रतिवर्ष 3 मई को एक मेला लगता है- 'वीर केसरी चंद मेला.' अपने एक अमर सपूत को याद करने के लिये. जौनसारी लोकगीत-नृत्य 'हारूल' के माध्यम से इस अमर सेनानी की शहादत का जिक्र होता है. बहुत सम्मान के साथ. गरिमा के साथ- सूपा लाहती पीठी है ताउंखे आई गोई केसरीचंदा जापान की चीठी हे जापान की चीठी आई आपूं बांच केसरी है. जिस अमर शहीद के सम्मान में यह लोकगीत गाया जाता है, उनका नाम है- अमर शहीद केसरी चंद. जौनसार बावर का वह सपूत जिस...
यमुना घाटी: बूंदो की संस्कृति का पर्याय

यमुना घाटी: बूंदो की संस्कृति का पर्याय

उत्तराखंड हलचल, साहित्‍य-संस्कृति, हिमालयी राज्य
उत्तराखंड के प्रत्येक गांव की अपनी एक जल संस्कृति हैं. यहां किसी न किसी गांव में एक स्रोत का पानी आपको जरूर मिलेगा,जिसकी अपनी एक परम्परा होती है, संस्कृति होती है। उसका वर्णन वहां किसी न किसी देवात्मा से जुड़ा मिलता है। यमुना घाटी के ऐसे ही कुछ जल स्रोतों के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ प​त्रकार प्रेम पंचोली—जल संस्कृति भाग—1 उत्तराखंड हिमालय में जल सहजने की परम्परा अपने आप में एक मिशाल है। आप जहां कही भी जल सस्कृति के प्रति लोगों का जुड़ाव देखेंगें वहां पानी को सिर्फ देवतुल्य ही मानते है, अर्थात पानी के संरक्षण को यहां आध्यात्म का एक मूल आधार मान गया है. उत्तराखंड की जल संस्कृति को लोग वेद पुराणों में लिखित कथा के अनुरूप मानते हैं। यह सच है कि अधिकांश स्थानों के नाम इन पुराणों में मिलते-जुलते भी है. यमुना घाटी में जल संरक्षण की संस्कृति के अब अवशेष भर रह गये है तथा अधिकतर स्थानों पर ...
उत्तराखंड में बेहतर रोजगार का जरिया हो सकती है केसर की खेती!

उत्तराखंड में बेहतर रोजगार का जरिया हो सकती है केसर की खेती!

अभिनव पहल, उत्तराखंड हलचल, हिमालयी राज्य
जे. पी. मैठाणीआजकल आप नकली केसर यानी कुसुम के कंटीले फूलों के बारे में भी ये सुनते हैं की ये केसर है लेकिन सावधान रहिये. ये नकली है इसके झाड़ीनुमा पौधो पर गुच्छों में उगने वाले फूलों को सुखकर केसर जैसा रंग निकलता है. इसलिए कृपया सावधान रहिये!जैसे ही हम केसर का नाम सुनते हैं हमें कश्मीर का ध्यान आता है. पूजा पाठ, भोजन , प्रसाद, आयुर्वेदिक ओषधियां और इसके अलावा केसर के कई उपयोग हैं. केसर के तंतु जो धागे जैसे होते हैं वो फूल के मध्य भाग के बारीक रेशे वाले पुंकेसर होते हैं. केसर के फूल की पंखुड़ियों से केसर नहीं बनता बल्कि फूल के मध्य भाग में जो धागे सदृश तंतु यानी पुंकेसर होते हैं उनको सुखाकर असली केसर बनती है! इसकी खेती सबसे अधिक खेती कश्मीर के पम्पौर और किश्तवाड़ में होती है. आजकल आप नकली केसर यानी कुसुम के कंटीले फूलों के बारे में भी ये सुनते हैं की ये केसर है लेकिन सावधान रहिये. य...
सागर से शिखर तक का अग्रदूत

सागर से शिखर तक का अग्रदूत

इतिहास, उत्तराखंड हलचल, संस्मरण, हिमालयी राज्य
चारु तिवारीस्वामी मन्मथन जी की पुण्यतिथि पर विशेष। हमने 'क्रियेटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड़' की ओर से हमेशा याद किया। हमने श्रीनगर में उनका पोस्टर भी जारी किया था। उन्हें याद करते हुये- हे ज्योति पुत्र! तेरा वज्र जहां-जहां गिरा ढहती कई दीवारें भय की स्वार्थ की, अह्म की, अकर्मण्यता की तू विद्युत सा कौंधा और खींच गया अग्निपथ अंधकार की छाती पर तुझे मिटाना चाहा तामसी शक्तियों ने लेकिन तेरा सूरज टूटा भी तो करोड़ों सूरजों में। उनकी हत्या के बाद गढ़वाल में शोक की लहर दौड़ गई। अंजणीसैंण (टिहरी गढ़वाल) में उनके द्वारा स्थापित श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम के आनन्दमणि द्विवेदी ने इस कविता से अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये। कौन है यह ज्योति पुत्र! निश्चित रूप से स्वामी मन्मथन। इस नाम से शायद ही कोई गढ़वाली अपरिचित हो। साठ-सत्तर के दशक में गढ़वाल में सामाजिक चेतना के अग्रदूत। एक ऐसा व्यक्तित्व ...
सामूहिक और सांस्कृतिक चेतना का मेला- स्याल्दे बिखौती

सामूहिक और सांस्कृतिक चेतना का मेला- स्याल्दे बिखौती

इतिहास, उत्तराखंड हलचल, संस्मरण, हिमालयी राज्य
चारु तिवारी। सुप्रसिद्ध स्याल्दे-बिखौती मेला विशेष । सत्तर का दशक। 1974-75 का समय। हम बहुत छोटे थे। द्वाराहाट को जानते ही कितना थे। इतना सा कि यहां मिशन इंटर कॉलेज के मैदान में डिस्ट्रिक रैली होती थी। हमें लगता था ओलंपिंक में आ गये। विशाल मैदान में फहराते कई रंग के झंडे। चूने से लाइन की हुई ट्रैक। कुछ लोगों के नाम जेहन में आज भी हैं। एक चौखुटिया ढौन गांव के अर्जुन सिंह जो बाद तक हमारे साथ वालीबाल खेलते रहे। उनकी असमय मौत हो गई थी। दूसरे थे महेश नेगी जो वर्तमान में द्वाराहाट के विधायक हैं। ये हमारे सीनियर थे। एक थे बागेशर के टम्टा। अभी नाम याद नहीं आ रहा। उनकी बहन भी थी। ये सब लोग शाॅर्ट रेस वाले थे। अर्जुन को छोड़कर। वे भाला फेंक, चक्का फेंक जैसे खेलों में थे। महेश नेगी जी का रेस में स्टार्ट हमें बहुत पसंद था। वे स्पोर्टस कालेज चले गये। बाद में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी जीते। हम ...
सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण का अनूठा प्रयास

सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण का अनूठा प्रयास

अभिनव पहल, उत्तराखंड हलचल, साहित्‍य-संस्कृति, हिमालयी राज्य
दिनेश रावतरवाँई लोक महोत्सव ऐसे युवाओं की सोच व सक्रियता का प्रतिफल है, जो शारीरिक रूप से किन्हीं कारणों के चलते अपनी माटी व मुल्क से दूर हैं, मगर रवाँई उनकी सांसों में रचा-बसा है। रवाँई के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई वैशिष्ट को संरक्षित एवं सवंर्धित करने सउद्देश्य प्रति वर्ष महोत्सव का आयोजन किया जाता है।लोक की सांस्कृतिक संपदा को संरक्षित एवं संवर्धित करने के उद्देश्य से आयोजित होने वाला ‘रवाँई लोक महोत्सव’ ‘अनेकता में एकता’ का भाव समेटे रवाँई के ठेठ फते-पर्वत, दूरस्थ बडियार, सीमांत सरनौल व गीठ पट्टी के अतिरिक्त सुगम पुरोला, नौगांव, बड़कोट के विभिन्न ग्राम्य क्षेत्रों से आंचलिक विशिष्टतायुक्त परिधान, आभूषण, गीत, संगीत व नृत्यमयी प्रस्तुतियों के माध्यम से रवाँई का सांस्कृतिक वैशिष्टय मुखरित करता है।इस महोत्सव का प्रयास समूचे रवाँई के दूरस्थ ग्राम्य अंचलों से लोकपरक प्रस्तुत...
उनके जाने का अर्थ एक समय का कुछ पल ठहर जाना

उनके जाने का अर्थ एक समय का कुछ पल ठहर जाना

उत्तराखंड हलचल, संस्मरण, साहित्यिक-हलचल
डॉ. हेमचन्द्र सकलानीजब भी उनको फोन करता तो बड़ी देर तक उनके आशीर्वादों की झड़ी लगी रहती थी जो मेरी अंतरात्मा तक को भिगो जाती थी। वो उत्तराखंड की वास्तव में अनोखी ज्ञानवर्धक विभूति थीं।6 मार्च को उत्तराखंड की विभूति वीणा पाणी जोशी जी के निधन का जब सामाचार मिला तो हतप्रभ रह गया। तीन माह पूर्व उनसे बसंत विहार में मिलने पहुंचा था, पता चला था गिरने के कारण कुछ अस्वस्थ हैं। यूं तो लगभग तीस वर्षों से उनसे परिचय था निरंतर संपर्क में भी था। एक पत्रिका ने उनके बारे में मुझसे कुछ जानना चाहा था तो मुझे भी मिलने की उत्सुकता थी। मुझे पहचानने में उन्हें एक दो मिनट का समय लगा। ध्यान आते ही उनका पहला प्रश्न था लेखन कैसा चाल रहा है और स्वास्थ कैसा है। दस वर्ष पूर्व जब से उन्हें पता चला था मेरा ऑपरेशन हुआ है तो स्वास्थ के सम्बन्ध में हमेशा पहले पूछती बाकी बातें बाद में होती। मुझे याद है सी.एम.आई.मे...