उत्तराखंड हलचल

विकास की बाट जोहते सुदूर के गाँव…

विकास की बाट जोहते सुदूर के गाँव…

पिथौरागढ़
उतकै-उतकै नहीं!डॉ. गिरिजा किशोर पाठक  उत्तराखंड का राज्य पक्षी यद्यपि हिमालयन मोनाल है लेकिन जनमानस का सबसे लोकप्रिय पक्षी है घूघूती. घूघूती पर यहाँ के सैकड़ों गाने, कथाएं, किवदंतियाँ है. घूघूती के बोल “के करू पोथी उतकै-उतकै” (क्या करू बेटा बस इतना सा ही और इतना ही है) यह एक कहानी से भी जुड़ा है. उतकै-उतकै माने जिसमें परिवर्तन/बृद्धि नहीं हुई है परिश्रम के वाबजूद. घूघूती के ये बोल उतकै-उतकै, उत्तराखंड के सुदूर सीमांत गांवों के विकास की यात्रा पर फिट बैठते हैं. इस बार एक लंबे अंतराल के बाद सुदूर हिमालय की तलहटी में बसे अपने सीमांत गाँव डौणू, बेरीनाग, जिला पिथौरागढ़ 1 माह के प्रवास की तैयारी के साथ पहुच गया. सोच था जिन संस्थानों और संस्थाओं को वेब स्पीच देनी होगी वहीं से दे दूंगा. कुछ जाड़े के अहसास के साथ जीने का आनंद भी आ जाएगा. 1982 की फरवरी में मेरी छोटी बहिन का ब्याह हुआ था तब जाड़...
न्यायदेवता ग्वेलज्यू की जन्मभूमि कहां? धूमाकोट में, चंपावत में या नेपाल में?

न्यायदेवता ग्वेलज्यू की जन्मभूमि कहां? धूमाकोट में, चंपावत में या नेपाल में?

अल्‍मोड़ा
डॉ. मोहन चन्द तिवारीउत्तराखंड के न्याय देवता ग्वेलज्यू के जन्म से सम्बंधित विभिन्न जनश्रुतियां एवं जागर कथाएं इतनी विविधताओं को लिए हुए हैं कि ग्वेल देवता की वास्तविक जन्मभूमि निर्धारित करना आज भी बहुत कठिन है. because न्याय देवता की जन्मभूमि धूमाकोट में है,चम्पावत में है या फिर नेपाल में? इस सम्बंध में भिन्न भिन्न लोक मान्यताएं प्रचलित हैं. कहीं ग्वेल देवता को ग्वालियर कोट चम्पावत में राजा झालराई का पुत्र कहा गया है तो किसी जागर कथा में उन्हें नेपाल के हालराई का पुत्र बताया जाता है. विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित पारम्परिक जागर कथाओं और लोकश्रुतियों में भी but न्यायदेवता ग्वेल की जन्मभूमि के बारे में अनिश्चयता की स्थिति देखने में आती है. पिछले कुछ वर्षों में जो ग्वेल देवता से सम्बंधित लिखित साहित्य सामने आया है,उसमें भी जन्मभूमि के सम्बंध में भ्रम की स्थिति बनी हुई है. उदाहरण के लिए मथ...
उत्तराखंड राज्य के लिए भुलाया नहीं जा सकता दिल्लीवासियों का संघर्ष

उत्तराखंड राज्य के लिए भुलाया नहीं जा सकता दिल्लीवासियों का संघर्ष

देहरादून
उत्तराखंड राज्य के स्थापना दिवस (9 नवम्बर) पर विशेष याद आ रहे हैं डॉ. नारायण दत्त पालीवालडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 9 नवम्बर को उत्तराखंड because राज्य का 21वां स्थापना दिवस है। हम सभी उत्तराखंडवासियों के लिए चाहे वह उत्तराखंड राज्य में रह रहे नागरिक हों, जो एक स्वतंत्र राज्य के अहसास से जीवन यापन कर रहे हैं, या फिर राज्य की बदहाली के कारण दूर दराज के मैदानी इलाकों में मजबूरी से गुजर बसर कर रहे प्रवासी जन हों,सबके लिए अत्यन्त ही हर्ष और गर्व का मौका है कि आज के दिन लंबे संघर्ष और अनेक लोगों के बलिदान के बाद नए राज्य का हमें हमारा संविधान सम्मत अधिकार मिला। प्रवासी यह गर्व करने का दिन इसलिए भी है क्योंकि so आज हमें एक स्वतंत्र राज्य के अलावा अपनी एक नई पहचान भी मिली थी। वरना तो उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य के किसी कोने में हम भी अपनी पहचान और लोक संस्कृति के लिए संघर्ष कर रहे होते ...
सुरेग्वेल नौले में वराह और नृसिंह अवतार की दुर्लभ मूर्तियां

सुरेग्वेल नौले में वराह और नृसिंह अवतार की दुर्लभ मूर्तियां

अल्‍मोड़ा
सुरेग्वेल क्षेत्र के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण की नवीनतम खोजडॉ. मोहन चंद तिवारी15, अक्टूबर 2019 को सुरेग्वेल से ऊपर लगभग एक कि.मी. की दूरी पर स्थित ग्राम सूरे के एक अति प्राचीन नौले के पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण के दौरान मुझे वहां नवनिर्मित मन्दिर में ऐसी दो प्राचीन मूर्तियां मिली हैं, जो भगवान विष्णु के दो अवतारों- वराह अवतार और नृसिंह अवतार से सम्बंधित पुरातात्त्विक महत्त्व की अत्यंत दुर्लभ मूर्तियां हैं. becauseइनमें से एक विष्णु की खड़ी प्रतिमा है जिसके दाईं ओर सिंह तथा बाईं ओर वराह की मुखाकृति उकेरी गई है. मूर्तिकार ने विष्णुमूर्ति के दाईं ओर नरसिंह, बाईं ओर वराहावतार की मुद्रा को दर्शाने का प्रयास किया है. इस विष्णुमूर्ति का शिल्प और अलंकरण वैष्णव परम्परा की मूर्तिकला जैसा ही है. मन्दिर के दूसरे कोने में प्राचीन प्रस्तर खंड में एक साथ बैठी हुई मुद्रा में तीन देव प्रतिमाएं भी उकेरी...
उजाड़ बाखई के हिय की पीर

उजाड़ बाखई के हिय की पीर

पिथौरागढ़
डॉ. गिरिजा किशोर पाठक  हिमालयी संस्कृति में बखाई का मतलब होता है पूरे मकानों की एक कतार और एक साइज. आज से लगभग दो-तीन सौ साल पहले कुमायूँ के लोग बाखलियों में ही सामूहिक रूप से रहते रहे होंगे. becauseआज के शहरी डूप्लेक्स की तरह बाखई में मकानों की एक दीवार कॉमन होती थी. शायद इससे पत्थरों की लागत भी कम रहती होगी. ऐसे घर लागत और सुरक्षा के दृष्टिकोण से सुंदर रहते होंगे. 1867 स्टीवेंसन ने भी but अपनी  बेरीनाग यात्रा मे पक्के पत्थर के घरों का उल्लेख किया हैं. एटकिनसन के हिमालयन गजेटियर 1888 में भी पत्थर के घरों और बाखई का लेख हैं. मुझे लगता है की बाखई का कन्सेप्ट कत्तूरी और चंद राजाओं के काल में ही विकसित हो गया  होगा. पत्थरों के भवनों के पुरातत्वीय प्रमाण भी मिलते ही हैं. यूं कहें कि बाखई कुमाउनी संस्कृति की आधारशिला है तो गलत नहीं होगा.बाखईहम भी बाखई में रहते थे. इस बाखई में करीब 1...
एक उजड़े गाँव की दास्तां

एक उजड़े गाँव की दास्तां

पिथौरागढ़
डॉ. गिरिजा किशोर पाठकइतिहास का अवलोकन किया जाये तो देखने को मिलेगा कि कई शहर, गाँव, कस्बे कालखंड विशेष में बसते और उजड़ते रहते हैं. कई सभ्यतायें और संस्कृतियाँ इतिहास का पन्ना बन कर रह जाती हैं. मोसोपोटामियां, सिंधु घाटी से लेकर कई सभ्यतायें आज पुरातात्विक अनुसंधान के विषय हैं. हाँ,  यह सच है कि शहरों के उजड़ने और बसने के कई कारण होते हैं. उत्तराखंड के संदर्भ में बात की जाय तो बड़े चौकाने वाले तथ्य सामने आते हैं. ब्रिटिश इंडिया में जो गाँव शत-प्रतिशत आवाद थे आजादी के सात दशकों बाद आज ये वीरान और बंजर हो गए हैं. जबकि ब्रिटिश भारत का विकास व्यापारिक हितों से प्रभावित था उसमें लोक कल्याणकारी राज्य का कोई दृष्टिकोण निहित नहीं था. सन 1947 के बाद तो एक लोकतान्त्रिक, लोक कल्याणकारी और समाजवादी सरकार ने काम करना शुरू किया. फिर इतना पलायन क्यों?  यह पलायन पूरे हिमालय और पूरी सीमाओं के लिए गंभीर...
अनाज भंडारण की अनूठी परम्परा है कोठार

अनाज भंडारण की अनूठी परम्परा है कोठार

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालकोठार यानी वह गोदाम जिसमें अनाज रखा जाता है, अन्न का भंडारण का वह साधन जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सालों तक रखी जा सकती है. कोठार में रखे हुए इन धनधान्य के खराब होने की संभावना न के बराबर होती है. कोठार को पहाड़ी कोल्ड स्टोर के नाम से जाना जाता है, जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सुरक्षित रखी जाती है. कोठार अथवा कुठार जो कि मुख्यतः देवदार की लकड़ी के बने होते हैं और ये सिर्फ भंडार ही नहीं हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग भी रहे हैं, इस भंडार में हमारे बुजुर्गों ने कई पीढ़ियों तक अपने अनाजों और जरूरत के सारे साजो-सामान रखे हैं. ये दिखने में जितने आकर्षक होते हैं उतने ही फायदेमंद भी. पहाड़ों में पुराने समय में लोग सिर्फ खेती किसानी को ही बढ़ावा देते थे और उसी खेती किसानी के जरिए उनकी आमदनी भी होती थी वस्तु विनिमय का जमाना भी था तो लोग बाज़ार और...
रिंगाल: उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हरा सोना

रिंगाल: उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हरा सोना

उत्तराखंड हलचल
जे. पी. मैठाणीपहाड़ की अर्थव्यवस्था के साथ रिंगाल का अटूट रिश्ता रहा है. रिंगाल बांस की तरह की ही एक झाड़ी है. इसमें छड़ी की तरह लम्बे तने पर लम्बी एवं पतली पत्तियां गुच्छी के रूप में निकलती है. यह झाड़ी पहाड़ की संस्कृति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण वनस्पति समझी जाती है. पहाड़ के जनजीवन का पर्याय रिंगाल, पहाड़ की अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ अंग रहा है. प्राचीन काल से ही यहाँ के बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का श्री गणेश रिंगाल की बनी कलम से होता था. घास लाने की कण्डी से लेकर सूप, टोकरियां, चटाईयां, कण्डे, बच्चों की कलम, गौशाला, झोपडी तथा मकान तक में रिंगाल अनिवार्य रूप में लगाया जाता है. वानस्पतिक परिचय- वन विभाग के अनुसार रिंगाल एक वृक्ष है, परन्तु वन विभाग की 1926-1928 से सन् 1936-37 की कार्य योजना में रिगाल की परिभाषा- “रिंगाल एक बहुवर्षीय पेड़ों के नीचे उगने वाली झाड़ी/ घास है जो नोड्स एवं इन्टर नोड्स म...
संकट में सीमांत

संकट में सीमांत

उत्तराखंड हलचल
सुमन जोशीबरसात का मौसम है. खिड़कियों के शीशों पर पड़ी बूंदों को देखते हुए अदरक-इलायची वाली चाय की चुस्कियों के बीच अपनी पसंदीदा किताब पढ़ने के दिन. और उसी के साथ म्यूजिक स्टोर से, "रिम-झिम गिरे सावन,  सुलग-सुलग जाए मन,  भीगे आज इस मौसम में,  लगी कैसी ये अगन". गीत सुनते-सुनते कहीं पहाड़ों व बचपन की यादों में खो जाने के दिन. तेल की कढ़ाई में प्याज़ और आलू का बेसन में लिपटकर गोते खाने के दिन.हम इस बरसात में जहाँ जाने का मन बनाते हैं. जिस जगह की छवि हम मन में उकेरते हैं असल में वहां के लोग पल-पल डरों के अंधेरों में जीते हैं. जो लोग इस मंजर का आँखों देखा हाल देख रहे है और त्रादसी से जूझ रहे हैं उनके लिए बरसात एक डरावने सपने की तरह हैं.और इसी बीच शहर में बैठे अपने 12×14 फ़ीट के कमरे में बैठे फेसबुक,इंस्टाग्राम पर बरसात की चुनिंदा तस्वीरों पर लाइक करते हुए हम सोचते हैं कि काश हम वहा...
राज्य मिलने के बीस साल बाद भी उपेक्षित है जालली सुरेग्वेल क्षेत्र

राज्य मिलने के बीस साल बाद भी उपेक्षित है जालली सुरेग्वेल क्षेत्र

अल्‍मोड़ा
डॉ. मोहन चन्द तिवारीअभी हाल ही में 22, जुलाई, 2020 को जालली क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्त्ता और समाजसेवी भैरब सती ने अमरनाथ, ग्राम प्रधान जालली; मनोज रावत, ग्राम प्रधान ईड़ा; सरपंच दीन दयाल काण्डपाल, मोहन काण्डपाल, नन्दन सिंह, गोपाल दत, पानदेव व महेश चन्द्र जोशी आदि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के एक शिष्टमंडल की अगुवाई करते हुए जालली क्षेत्र के विकास और वहां उप तहसील के कार्यालय की स्थापना की मांग को लेकर द्वाराहाट तहसील के एसडीएम श्री आर के पाण्डेय से मुलाकात की और उन्हें ज्ञापन भी सौंपा है. जालली क्षेत्रवासियों की एक मुख्य मांग है कि वहां एक साधन संपन्न कार्यालय खोला जाए और तुरंत वहां डाटा आपरेटर की नियुक्ति की जाए, ताकि इस कोरोना काल की चरमराई हुई राज्य परिवहन व्यवस्था के दौर में स्थानीय लोगों को अपने खतोंनी की नकल प्राप्त करने और परिवार रजिस्टर, आय प्रमाण पत्र,स्थायी निवास पत्र, जातिपत...