उत्तराखंड हलचल

फाल्गुनी प्रीत का रंगोत्सव: भील संस्कृति का जीवंत पर्व ‘भगोरिया’

फाल्गुनी प्रीत का रंगोत्सव: भील संस्कृति का जीवंत पर्व ‘भगोरिया’

उत्तराखंड हलचल
  भगोरिया पर्व 2026: भील जनजाति का अनोखा प्रेम उत्सव, जानें इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक महत्वमंजू काला, देहरादून जब हवाएँ गर्मी के तेवर दिखाने लगती हैं, जब उनमें मादक खुशबू तैरने लगती है, गीतों में उन्माद भरने लगता है, पत्थर तोड़ने वाले हाथों की उँगलियों पर मेहँदी की लाली सजने लगती है, ताड़ी और महुआ में रस भरने लगता है, टेसू के फूल खिल उठते हैं और वसंत यौवन की सीमा पर पहुँच जाता है, तो समझ लीजिए कि भगोरिया का आगमन हो रहा है। यह भील समुदाय का अपना विशेष त्योहार है, जिसे हम फाल्गुन मास की प्रीत या भगोरिया के नाम से जानते हैं। यह ऐसा पर्व है जो हर युग की नई चमक को अपनी प्राचीन तहजीब और संस्कृति से जोड़ता है। यह न केवल मनुष्य का उत्सव है, बल्कि प्रकृति भी अपने संकेतों, फूलों, हवाओं और रंगों के साथ इसमें शामिल हो जाती है। भगोरिया उन लोगों का त्योहार है जिनकी हड्डियाँ रोज़ाना कठिन श...
सरुताल ट्रेक उत्तरकाशी: ट्रेक ऑफ द ईयर 2024, पर्यटन और रोजगार की नई उम्मीद

सरुताल ट्रेक उत्तरकाशी: ट्रेक ऑफ द ईयर 2024, पर्यटन और रोजगार की नई उम्मीद

उत्तरकाशी
  पर्यटन की अपार संभावनाएं समेटे सर बडियारनीरज उत्तराखंडी, उत्तरकाशी उत्तरकाशी जनपद के विकासखंड पुरोला अंतर्गत सीमांत उच्च हिमालयी क्षेत्र सर बडियार में स्थित सरुताल ट्रेक पर्यटन एवं रोजगार की अपार संभावनाएं समेटे हुए है। यह ट्रेक न केवल साहसिक पर्यटन का केंद्र बन सकता है, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों के लिए आजीविका का मजबूत स्रोत भी साबित हो सकता है। उत्तराखंड सरकार द्वारा इसे 2024 में ट्रेक ऑफ द ईयर घोषित किए जाने के बाद अब इसकी प्रसिद्धि बढ़ रही है और विकास की दिशा में कदम तेज हो गए हैं। आवश्यकता है इसे पूर्ण रूप से पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की, ताकि पर्यटन को नए पंख लगें और दूरस्थ गांवों में आर्थिक उन्नति हो। सरुताल ट्रेक उत्तरकाशी के सर बडियार क्षेत्र (सरनौल-सोतरी या आसपास के गांवों से शुरू) एक अद्वितीय हिमालयी पदयात्रा है, जो लगभग 40+ किलोमीटर लंबा है और सामान्यतः 5 स...
पिज़्ज़ा-बर्गर के दौर में लुप्त हो रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’, सांस्कृतिक पहचान पर संकट

पिज़्ज़ा-बर्गर के दौर में लुप्त हो रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’, सांस्कृतिक पहचान पर संकट

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडीहिमालयी क्षेत्रों की समृद्ध पाक परंपरा का अहम हिस्सा रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’ आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. कभी त्योहारों, मेलों और विशेष अवसरों की शान माने जाने वाले ये व्यंजन अब धीरे-धीरे पहाड़ी रसोई से गायब होते जा रहे हैं.बदलती जीवनशैली का असरविशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट फूड की बढ़ती लोकप्रियता, शहरीकरण और नई पीढ़ी की बदलती खान-पान आदतों ने पारम्परिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है. पहले जहां घरों में गेहूं या मंडुए के आटे से सिड़ा (भाप में पका व्यंजन) और असका (स्थानीय शैली की रोटी/पकवान) बनाए जाते थे, वहीं अब उनकी जगह बाजारू खाद्य पदार्थों ने ले ली है.मेहनत और समय की मांगग्रामीण महिलाओं के अनुसार, सिड़ा–असका बनाने की प्रक्रिया समय और धैर्य की मांग करती है. आटे को विशेष तरीके से गूंथना, उसे खमीर उठाने देना और पारम्पर...
विश्व के बाल लेखकों का लेखक गाँव में सम्मान

विश्व के बाल लेखकों का लेखक गाँव में सम्मान

उत्तराखंड हलचल
  65 से अधिक देशों के साहित्यकार जुड़े, 30 नवोदित रचनाकार अलंकृतहिमांतर ब्यूरो, देहरादून (थानो)अंतर्राष्ट्रीय लेखक दिवस के अवसर पर लेखक गाँव, थानो (देहरादून) में एक भव्य एवं गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया. यह आयोजन अपनी विशिष्टता के कारण देश में पहली बार इस स्वरूप में संपन्न हुआ, जिसमें भारत सहित विश्व के 65 से अधिक देशों के साहित्यकार एक मंच से जुड़े. कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित 26 वरिष्ठ लेखकों तथा विभिन्न देशों से ऑनलाइन जुड़े हिंदी एवं प्रवासी हिंदी साहित्यकारों को ‘लेखक सम्मान’ प्रदान किया गया. साथ ही 30 बाल रचनाकारों- जिनकी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं- को ‘नवोदित लेखक सम्मान’ से अलंकृत कर उनके साहित्यिक अवदान का अभिनंदन किया गया. सम्मानित बाल लेखकों में प्रणवी भारद्वाज (व्हिस्पर्स ऑफ़ हिल्स), लावण्या कुशवाहा (ट्रेवलिंग थ्रू ए सोलो वेंडरर), देवांश गुप्त...
यमुना घाटी के लाल CA अरविंद सिंह रावत बने आईसीएआई देहरादून के सचिव, CA अंकित गुप्ता अध्यक्ष निर्वाचित

यमुना घाटी के लाल CA अरविंद सिंह रावत बने आईसीएआई देहरादून के सचिव, CA अंकित गुप्ता अध्यक्ष निर्वाचित

देहरादून
 हिमांतर ब्यूरो, देहरादूनThe Institute of Chartered Accountants of India (आईसीएआई) की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल (सीआईआरसी) की देहरादून शाखा की नई कार्यकारिणी घोषित कर दी गई है। इसमें अंकित गुप्ता को अध्यक्ष तथा अरविंद सिंह रावत को सचिव निर्वाचित किया गया है। इसके अतिरिक्त, जस्मीत सिंह चौधरी को उपाध्यक्ष और प्रणय सेठ को कोषाध्यक्ष चुना गया है। वहीं, साहेब आनंद को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स स्टूडेंट्स एसोसिएशन (सीआईसीएएसए) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जबकि परिमल पटेट को कार्यकारिणी समिति का सदस्य मनोनीत किया गया है। नव-निर्वाचित अध्यक्ष अंकित गुप्ता ने सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नई कार्यकारिणी पेशेवर उत्कृष्टता को बढ़ावा देने, सतत शिक्षण कार्यक्रमों के संचालन और सदस्यों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता, सामूहिक नेतृत्व और ...
ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

देहरादून, साहित्‍य-संस्कृति, हिमालयन अरोमा
 फकीरा सिंह चौहान स्नेही वरिष्ठ कवि, गायक कलाकार तथा गीतकार ग्राम गोरछा, जौनसार जौनसारी विवाहित महिलाओं के सिर पर धारण किया जाने वाला ढांटु मात्र एक रंगीन कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि गौरव और गरिमा की पहचान है। जौनसार-बावर, रवांई-जौनपुर, बंगाण, बिनार तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सिर पर ढांटु बांधना केवल एक परिधान या आवरण नहीं, बल्कि मान-सम्मान, स्वाभिमान, मर्यादा और जिम्मेदारी का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ढांटु धारण करने की परंपरा विरासत, संस्कृति और नारीत्व की गरिमा को दर्शाती है। इसे नारी स्वाभिमान का मुकुट और सिर की शोभा माना जाता है। किसी के सामने सम्मानपूर्वक ढांटु उतारना विश्वास, जिम्मेदारी तथा क्षमा-याचना का अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। जौनसार-बावर क्षेत्र में विवाहित महिलाओं के लिए ढांटु धारण करना सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान और गौरव का प्रतीक है...
सौड़-सांकरी का देवगोत मेला: देव आस्था, मैती-धियाणी मिलन और लोक संस्कृति का भव्य संगम

सौड़-सांकरी का देवगोत मेला: देव आस्था, मैती-धियाणी मिलन और लोक संस्कृति का भव्य संगम

उत्तरकाशी
  देव आस्था, रिश्तों की गरमाहट और लोक संस्कृति का संगम नीरज उत्तराखंडीसौड़-सांकरी (मोरी),  उत्तरकाशी   हिमालय की शांत वादियों में जब ढोल-दमाऊ की थाप गूंजती है और रणसिंघा की ध्वनि देवदार के जंगलों से टकराकर लौटती है, तब समझ लीजिए कि पहाड़ में कोई बड़ा लोक उत्सव आकार ले चुका है. सीमांत विकासखंड मोरी के सौड़-सांकरी गांव में आयोजित देवगोत मेला और मैती-धियाणी मिलन कार्यक्रम ने इस बार भी आस्था, परंपरा और भावनाओं को एक सूत्र में पिरो दिया.लोक देवता सोमेश्वर महादेव के सानिध्य में सजे इस मेले की शुरुआत विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना और देवडोली के स्वागत के साथ हुई. मंदिर परिसर में उमड़े श्रद्धालुओं की भीड़, जयकारों की अनुगूंज और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर थाप ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. श्रद्धालुओं ने भगवान सोमेश्वर महादेव के श्रीचरणों में नमन कर क्षेत्र की सुख-सम...
उत्तराखंड के गांवों, कस्बों व शहरों में गूंज रही होली गायन की धूम

उत्तराखंड के गांवों, कस्बों व शहरों में गूंज रही होली गायन की धूम

नैनीताल
 सी.एम. पपनैं, भतरौंजखान (नैनीताल)रंगों का पर्व होली सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है. इसे होली, होलिका या होलाका के नाम से बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व उत्तर भारत में लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जबकि Manipur में यह उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है.बैठकी होली से होती है शुरुआत उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पौष माह से बैठकी होली की शुरुआत हो जाती है. बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक होली, पंचमी से महाशिवरात्रि तक अर्ध-श्रृंगारिक और उसके बाद पूर्ण श्रृंगार रस में डूबी होली गाई जाती है. बसंत पंचमी के साथ ही होल्यारों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है. महाशिवरात्रि से खड़ी होली प्रारंभ होती है और रंग एकादशी को चीर बांधी जाती है. इसके बाद होली का पर्व पूरे शबाब पर होता है. महिला और पुरुष समूह कदमताल...
 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

उत्तरकाशी
पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका की रीढ़ बना भेड़-बकरी पालन, हजारों परिवारों को मिल रहा सहारानीरज उत्तराखंडी, पुरोलापर्वतीय क्षेत्रों में खेती की सीमित जमीन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच भेड़-बकरी पालन पहाड़ की आर्थिकी और आजीविका की मजबूत रीढ़ बनकर उभरा है. सर बड़ियार क्षेत्र के दुर्गम गांवों में हजारों परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से सीधे जुड़े हुए हैं.आय और आत्मनिर्भरता का आधार विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ में छोटे और सीमांत किसानों के लिए भेड़-बकरी पालन कम लागत और शीघ्र आमदनी देने वाला व्यवसाय है.बकरी का दूध, मांस और खाद स्थानीय बाजार में आसानी से बिक जाते हैं. भेड़ों से ऊन का उत्पादन होता है, जो हस्तशिल्प और वस्त्र उद्योग में उपयोगी है. प्राकृतिक चरागाहों की उपलब्धता से चारे की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है.महिलाओं की बढ़ती भागीदारी...
उत्तराखंड में विलुप्त होती काष्ठ तकली और कंघी: पारंपरिक शिल्पकार देख रहे संरक्षण की राह

उत्तराखंड में विलुप्त होती काष्ठ तकली और कंघी: पारंपरिक शिल्पकार देख रहे संरक्षण की राह

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, पुरोलापारंपरिक काष्ठ शिल्प की एक अनमोल धरोहर आज गुमनामी की कगार पर है। बाज़ार में काष्ठ निर्मित तकली और कंघी बेचते हुए श्रीकोट (पुरोला) निवासी केशवानंद, पुत्र जीतराम, मिले—जो वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं।जिज्ञासावश जब उनसे पूछा गया कि ये तकली किस लकड़ी की बनी है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि तकली चुल्लू के पेड़ की लकड़ी से तैयार की जाती है, जबकि कंघी मोल यानी कैंथ की लकड़ी से बनाई जाती है। उनके अनुसार इन दोनों वस्तुओं को तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है। लकड़ी का चयन करना, उसे सुखाना, तराशना और फिर महीन घिसाई कर उपयोगी आकार देना—पूरी प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य होती है।केशवानंद बताते हैं कि पहले गांव-गांव में काष्ठ से बनी तकली और कंघियों की अच्छी मांग रहती थी, लेकिन अब प्लास्टिक और मशीन निर्मित वस्तुओं ने इन पारंपरिक ...