October 22, 2020
संस्मरण

बुदापैश्त में गुरुदेव स्मृति

बुदापैश्त डायरी-9

  • डॉ. विजया सती

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को मई माह के आरम्भ से अगस्त तक कई रूपों में याद किया गया. बुदापैश्त से मेरे मन की भी यह एक मधुर स्मृति !

बुदापैश्त में मार्च महीने के अंतिम सप्ताह में सामान्यत: ऐसा मौसम नहीं होता था.

किन्तु उस दिन अप्रत्याशित रूप से सुखद हल्की ठंडक लिए धीरे-धीरे बहती ठंडी हवा और चमकती धूप ने शहर के पूरे वातावरण को खुशनुमा बना दिया था.

इस प्रिय माहौल में संपन्न एक सार्थक आयोजन की स्मृतियाँ अब भी उतनी ही जीवंत बनी हुई हैं. भारतीय दूतावास, यहाँ के प्रसिद्ध एत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय और दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के संयुक्त प्रयासों से एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी विश्वविद्यालय के प्रांगण में हुई जो बंगाल और भारत से बाहर  गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति एक सामयिक समझ विकसित करने की आकांक्षा का मूर्त रूप कही जा सकती है.

गोष्ठी में भारतीय विद्वानों के अतिरिक्त, फ्रांस, हंगरी, फिनलैंड, रोमानिया और इंग्लैण्ड के लेखकों और कलाविदों के अतिरिक्त रूस के विशिष्ट वक्ताओं की भागीदारी रही. कितनी ही नई दिशाओं की जानकारी के झरोखे खुले. गुरुदेव की बहुआयामी छवि के अनेक नए पहलुओं से साक्षात्कार हुआ.

दो दिनों के इस आयोजन में गुरुदेव का सानिध्य कई रूपों में मिला. उनके रचना कर्म के नए अध्ययन और मूल्यांकन के प्रश्न उठे. यह कार्यक्रम गुरुदेव के जन्म के एक सौ पचास वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में, भारत की पहल पर विश्व भर में आयोजित किए जा रहे विविध समारोहों में से एक था.

गोष्ठी में भारतीय विद्वानों के अतिरिक्त, फ्रांस, हंगरी, फिनलैंड, रोमानिया और इंग्लैण्ड के लेखकों और कलाविदों के अतिरिक्त रूस के विशिष्ट वक्ताओं की भागीदारी रही. कितनी ही नई दिशाओं की जानकारी के झरोखे खुले. गुरुदेव की बहुआयामी छवि के अनेक नए पहलुओं से साक्षात्कार हुआ.

यूरोपीय वक्ताओं से यह जानकारी मिली की यूरोप में गुरुदेव का स्वागत पूर्व के प्रतिनिधि दार्शनिक कविके रूप में हुआ.

यूरोपीय वक्ताओं के वक्तव्यों में एक ओर गुरुदेव को धरती का कवि मानने का आग्रह दिखाई दिया, गीतांजलि की आध्यात्मिक कविताओं की तुलना में प्रेम कविताओं की प्रियता रेखांकित हुई. गुरुदेव से लगभग अपरिचित किसी देश विशेष की नई पीढ़ी को गुरुदेव से परिचित कराने की अभिलाषा व्यक्त हुई.

इस समारोह में शान्तिनिकेतन में यूरोपीय स्त्रियों के आगमन का रोचक घटनाक्रम तथा उनके रचनात्मक योगदान को जानने का अवसर भी मिला.

सन् 1920 में जब यूरोप में कई स्थानों पर गुरुदेव के भाषण आयोजित हो रहे थे, कुछ साहित्यिक मित्रों ने उन्हें हंगरी की राजधानी बुदापैश्त आमंत्रित किया. 26 अक्टूबर 1926 को अपनी पुत्रवधु तथा अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के साथ वे बुदापैश्त पहुंचे.

साठ वर्ष की उम्र में गुरुदेव का चित्रकला से जुड़ना और तन्मय होना हैरान करता रहा. उनकी कला के पारखी और उनसे प्रेरित-प्रभावित भारतीय सर्जकों की प्रस्तुतियों ने गुरुदेव की कलादृष्टि के कई रहस्यों को खोला. उनकी कविताओं के बंगला से हिन्दी में संगीतमय अनुवादों का पाठ हुआ. अनुवाद की व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख भी किया गया.

पुरुष सर्जक के भीतर छिपे नारी मनोभावों की सोदाहरण प्रस्तुति के साथ भारतीय पौराणिक चरित्रों – कर्ण, कुंती, शकुन्तला, सीता, चित्रांगदा, अर्जुन के प्रति गुरुदेव की नवदृष्टि और सृष्टि का विश्लेषण हुआ.

मुक्त्मना और प्रयोगधर्मी कलाकार गुरुदेव और उनके परिवार के वस्त्र-विन्यास की गरिमा से आकर्षित समसामयिक विन्यासकार की दृष्टि को साकार करने वाली फिल्म भी दिखाई गई.

सन् 1920 में जब यूरोप में कई स्थानों पर गुरुदेव के भाषण आयोजित हो रहे थे, कुछ साहित्यिक मित्रों ने उन्हें हंगरी की राजधानी बुदापैश्त आमंत्रित किया. 26 अक्टूबर 1926 को अपनी पुत्रवधु तथा अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के साथ वे बुदापैश्त पहुंचे.

समारोह के आरम्भ में गुरुदेव की इस यात्रा का वीडियो हंगरी का प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट अतिथि के सौजन्य से दिखाया गया.

इस समय शहर के कई भागों में गुरुदेव ने महत्वपूर्ण भाषण दिए. किन्तु यहीं गुरुदेव इतने अस्वस्थ हुए की उन्हें विश्राम के लिए प्रसिद्ध बलातोंन झील के तट पर ले जाया गया. फिर इलाज के लिए वहीं अस्पताल में भारती भी करना पड़ा.

अस्पताल के जिस कक्ष में गुरुदेव ने आराम किया, उनका इलाज हुआ, उस कक्ष के बाहर, आज भी उनका नाम अंकित है और उनकी स्मृति में कमरे को यथावत सुरक्षित रखा गया है.

कालान्तर में गुरुदेव ने हंगरी से कई कलाकारों को सम्मान सहित शान्ति निकेतन आमंत्रित किया. अध्यापक द्यूला गर्मानुस और चित्रकार सास और एलिजाबेथ ब्रूनर ने शान्तिनिकेतन में सार्थक समय बिताया.

बलातोंन के सुन्दर वातावरण ने कवि मन को मोह लिया, यहाँ उन्होंने कई कविताएं लिखी. एक पौधा भी रोपा जो आज घना वृक्ष है.

उसी वृक्ष की छाँव में गुरुदेव की प्रतिमा स्थापित की गई और उसके निकट विचरण स्थल को टैगोर पथ नाम भी दिया गया है, जहाँ ये कविता पंक्तियाँ अंकित हैं –
जब मैं इस धरा पर नहीं हूँ, मेरे वृक्ष
वसंत में सदा नए हो जाने वाले तुम्हारे पत्ते
पथिक के कानों में गुनगुनाएं
कि कवि ने अपने जीवन में प्यार भी किया !

बलातोंन आने वाले पर्यटकों को यह स्थान आज भी आकर्षित करता है.

बीसवीं शती के आरम्भ में हंगरी निवासियों पर गुरुदेव के लेखन, जीवन और व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पडा. उनकी बीस से अधिक रचनाओं के अनुवाद हुए. भारत-हंगरी सम्बन्ध को गुरुदेव के आगमन से बल मिला.

कालान्तर में गुरुदेव ने हंगरी से कई कलाकारों को सम्मान सहित शान्ति निकेतन आमंत्रित किया. अध्यापक द्यूला गर्मानुस और चित्रकार सास और एलिजाबेथ ब्रूनर ने शान्तिनिकेतन में सार्थक समय बिताया.

2007 में एत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग में टैगोर रिसर्च फेलोशिप की स्थापना भी की गई.

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर (हिन्दी) हैं। साथ ही विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी – ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *