संस्मरण

बाखली वहीं छूट जाती है हमेशा की तरह

  • नीलम पांडेय “नील”

तब भी आसपास जंगली कविताएं और चित्त उदगार करने वाले मौसम अपनी दस्तक देना शुरु कर देते थे. तब भी मैं प्रकृति को महसूस करना चाहती थी शायद. पर प्रकृति ही एक जादू कर देती और मैं कहीं दूर विचरण के लिए निकल पड़़ती. ये बहती हवा, ये पेड़, आकाश, मिट्टी और दूब की हरी घास जैसे मेरे साथ—साथ बड़े हो रहे थे. तब जाने क्यों ऐसा लगता था, सब कुछ जीवन का ही हिस्सा है, कुछ भी बुरा नही लगता था. किन्तु आज एक जगह बैठकर स्मृतियों में सब कुछ लौटा ला रही हूं जैसे कि पनघट वाले आम के बगीचे और जंगलों से घास लाती या मंगरे के धारे तथा सिमलधार वाले नौले से पानी भरती औरतें अपनी चिरपरिचित आवाज में हुलार भर रही है… जैसे ओ रे पनियारियों, या ओ रे घसियारियों और उनकी ये आवाज पहाड़ों से टकराकर उनके पास वापस आ जाती है.

उत्तराखंड की शान पारंपरिक घर ‘बाखली’ (फोटो गूगल से साभार )

 मुझे जाने ऐसा क्यों लगता था कि पनघट के गावँ से नीचे के गावों में रेडियों में एक पुराना गीत बज रहा है ‘ओ बसन्ती पवन पागल आ जा रे आ जा’ …वो गीत जैसे उन्हीं महिलाओं के लिए  था. उसमें मेरी ईजा भी होती, काखी, कैंजा, ज्येड़जा सभी स्त्रियां जो दिनभर पसीना बहाने के बाद शाम तक पटांगण (पत्थरों के आंगन) की दीवार में बैठते ही पस्त होकर सच्ची में पागल बसंती बन जाती थी. उनके पास करने को बहुत कुछ होता था.

…आइ तो गोरु, भैंसू कैं घा दिण छू, फिर एक आध लोटी दूध लिबेर, दिया बत्ती कर, चूल फूंकण छू, फिर चूल्हा—चौका करते—करते इतना टैम हो जाएगा कि बाघ की पार गधेरे से घ्वां—घ्वां सुनाई देने लगेगी. तब काम निपटा कर वह रसोई से बाहर हाथ में जलता हुआ छिलूक लेकर आएगी और सरपट चाख पारकर मलखान वाले कमरे में जाकर ही सांस लेगी.

…आइ तो गोरु, भैंसू कैं घा दिण छू, फिर एक आध लोटी दूध लिबेर, दिया बत्ती कर, चूल फूंकण छू, फिर चूल्हा—चौका करते—करते इतना टैम हो जाएगा कि बाघ की पार गधेरे से घ्वां—घ्वां सुनाई देने लगेगी. तब काम निपटा कर वह रसोई से बाहर हाथ में जलता हुआ छिलूक लेकर आएगी और सरपट चाख पारकर मलखान वाले कमरे में जाकर ही सांस लेगी. कटे—फटे हाथों में लाई (सरसों) का तेल या वैसलीन घसोडे़गी और फिर निनान (उनीदी) होकर पसर जाएंगी. …उसके बाद वह कब उठती थी कि सुबह मुंह अंधेरे वह नौले में होती थी.

उत्तराखंड की शान पारंपरिक घर ‘बाखली’ (फोटो गूगल से साभार )

इस वक्त, मैं एक ऊंचे टीले वाले बगीचे के मुहाने पर बैठे-बैठे नीचे के गावों की सुबह की आवाजाही को देख रही हूं. मैं देख रही हूं कि सुबह के समय भी साँझ से डूबते गावों को.

मन में एक अपराध बोध हैं कि मैं भी तो नही हूं अब इस बाखली का हिस्सा, आखिर किसी को कैसे दोष दूं ? क्यों सोचूं कि कैसी होती है इंसानों की बाखली? मुझे क्यों फर्क पड़ता है, कुछ भी हो रहा हो? क्यों सोचना  कि ये बाखली धीरे—धीरे अपना अस्तित्व खो रही है. फिर भी सोचती हूं कि बाखली के कुछ अस्तित्व खण्डहरों में खड़े हैं.

खाली पड़ी गावं की बाखली में, मैं खोज रही थी आने वाली कोई एक सुबह जब यह बाखली इंसानी आवाजों, गायों के रंभाने की आवाजों, बकरियों के ममियाने, मुर्गियों की बेहिसाब लड़ाई के बाद, होती उनकी सुलह में एक दूसरे की गर्दन को चोंच से ठुकेरना. सब कुछ स्मृतियों में जीवित हो रहा है. मैंने फिर अपने बचपन को वापस भाग कर मुर्गियों के बाडे़ में आते देखा और अपनी उंगली उनके जाले में फंसा दी, तभी एक मुर्गी ने मेरी उंगली पर चोंच मार दी और मैं जाले में दोनों हथेलियां मार कर पुनः कल्पना से बाहर आ गयी.

मन में एक अपराध बोध हैं कि मैं भी तो नही हूं अब इस बाखली का हिस्सा, आखिर किसी को कैसे दोष दूं ? क्यों सोचूं कि कैसी होती है इंसानों की बाखली? मुझे क्यों फर्क पड़ता है, कुछ भी हो रहा हो? क्यों सोचना  कि ये बाखली धीरे—धीरे अपना अस्तित्व खो रही है. फिर भी सोचती हूं कि बाखली के कुछ अस्तित्व खण्डहरों में खड़े हैं. बस अब कोई आवाजाही नहीं बची वहां, उसी बाखली के नीचे एक और बाखली है जहाँ कुछ लोग रहते हैं अधिकतर प्रौढ़ और वृद्ध लोग. अकसर वे काम करते करते कभी ऊपर वाली बाखली की तरफ नजरें उठा लेते हैं जैसे कहना चाह रहे हो तुम सब मनखी किधर हरा (खो) गये हो रे.

उत्तराखंड की शान पारंपरिक घर ‘बाखली’ (फोटो गूगल से साभार )

एक आमा अपनी जवानी में धात लगा कर ऊपर वाली बाखली के लोगों को आवाज दिया करती थी, कभी उनके उज्याड़ गोरु के नीचे अपने खेतों में चले आने पर, खूब गाली हुदती (गाली देना)  थी. अब वह भी चाहती है कोई तो आऐ कि वह धात लगा कर आवाज दे किन्तु कोई नहीं आया अभी तक.  बस फिर वह उधर से नजरें घुमा लेती है. सोचती है उसको चार आदमी मिल जायेगे कंधा लगने के लिए एन बखत पर ।

अचानक एक ढेडूवा (बिल्ला) कूद कर मेरे सामने आ गया और मेरे लिऐ तो ढेडूवा ही बाघ हुआ. डर से मेरी दोनो हथेलियों से जुगनू आजाद हो जाते थे. तभी टूटती स्मृतियों के साथ, मैं भी लौट आती वापस अपने शहर में और बाखली वहीं छूट जाती है हमेशा की तरह…

 जाने कब  फिर से  मैं खुद को पटांगण में आइस—पाइस खेलते  या शाम को लालटेन की रोशनी में आने वाली पूरपुतईयों (परवाने) को उड़ते हुए या जलते हुए देख रही हूं, फिर एकाएक अंधेरा घिर जाता है और मैं जुगनूओं को पकड़ने दौड़ पड़ती हूं, तभी मुझे पार की आमा की आवाज सुनायी देती है ओ बिराई!  भितेर जा, बाघ खाल तकैं…. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है जब तक दो तीन जुगनू मेरी दोनों हथेली से बनी मुठ्ठी में कैद ना हो जाएं, तभी पड़ोस का भुबन आकर कह देगा, तुझे पाप लगेगा और देखना बाघ सच्ची में ले जाएगा तुझे एक दिन.

अचानक एक ढेडूवा (बिल्ला) कूद कर मेरे सामने आ गया और मेरे लिऐ तो ढेडूवा ही बाघ हुआ. डर से मेरी दोनो हथेलियों से जुगनू आजाद हो जाते थे. तभी टूटती स्मृतियों के साथ, मैं भी लौट आती वापस अपने शहर में और बाखली वहीं छूट जाती है हमेशा की तरह…

(लेखिका कवि, साहित्यकार एवं पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहती हैं)

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