जोहार घाटी में शिक्षा की अलख जगाने वाले विपिन चंद्र जोशी को क्यों भुला दिया गया?

 

  • मनोहर सिंह रावत

हमारे समाज में अनेक ऐसी शख्सियतें हुई हैं, जिन्होंने नाम और धन की अपेक्षा किए बिना समाज के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। लेकिन समय के साथ उनके योगदान को भुला दिया जाना उन लोगों को पीड़ा देता है, जिन्होंने उनके कार्यों को करीब से देखा और महसूस किया है। उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसे सीमांत क्षेत्र मुनस्यारी में ऐसी ही एक शख्सियत थे शिक्षाविद् विपिन चंद्र जोशी। उन्होंने उस दौर में दुर्गम जोहार घाटी में शिक्षा की अलख जगाई, जब विद्यालय तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। उनका मानना था कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर, अनुशासित और संस्कारवान भी बनाना चाहिए।

जोशी जी की दूरदर्शिता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पहाड़ों में कंप्यूटर शिक्षा की आवश्यकता भी महसूस की और मुनस्यारी में कंप्यूटर लैब स्थापित करने का सपना देखा। हालांकि, उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। आज उनके पूर्व विद्यार्थी और स्थानीय समाजसेवी उनके योगदान को याद करते हुए कहते हैं, ‘कुछ लोग केवल विद्यालय नहीं बनाते, वे पीढ़ियों का भविष्य संवारते हैं। श्रद्धेय जोशी जी ऐसे ही दूरदर्शी शिक्षाविद् थे, जिन्होंने दुर्गम जोहार घाटी के मुनस्यारी में शिक्षा, अनुशासन, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और मानवीय मूल्यों की मजबूत नींव रखी।’ ऐसे में सवाल उठता है कि क्षेत्र की पीढ़ियों का भविष्य संवारने वाले इस शिक्षाविद् को अपेक्षित पहचान क्यों नहीं मिली?

अल्मोड़ा से मुनस्यारी आकर स्वीकार की चुनौती

लेखक ख्याली राम पंत के प्रकाशित संस्मरण ‘मुनस्यारी व वहां के छात्रों को नहीं भुला सकता हूं!’ के अनुसार, मार्च 1954 में मुनस्यारी में राजकीय हाईस्कूल खोलने का आदेश जारी हुआ था। मूल रूप से अल्मोड़ा निवासी विपिन चंद्र जोशी ने दुर्गम पहाड़ी रास्तों, पुलों के अभाव, भूस्खलन और गिरते पत्थरों के खतरों के बावजूद मुनस्यारी आने की चुनौती स्वीकार की। उन्होंने 16 अगस्त 1954 को राजकीय हाईस्कूल, मुनस्यारी के प्रधानाचार्य का कार्यभार संभाला।

उनका उद्देश्य केवल विद्यालय का संचालन करना नहीं, बल्कि सीमांत क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध कराना था। वह चाहते थे कि विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ कृषि, बागवानी, कताई-बुनाई और पशुपालन जैसे व्यावहारिक कौशल भी सिखाए जाएं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

विद्यालय निर्माण में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

स्थानीय लोगों के अनुसार, जोशी जी ने वर्तमान राजकीय इंटर कॉलेज, मुनस्यारी के लिए भूमि की व्यवस्था, उसकी स्वीकृति और विद्यालय भवन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य था कि गरीब परिवारों के बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए अपना क्षेत्र छोड़ने को मजबूर न होना पड़े।

बताया जाता है कि उन्होंने विद्यालय के लिए प्रस्तावित भूमि की उपयोगिता समझाकर स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास किया। भवन का नक्शा तैयार कराने से लेकर निर्माण संबंधी व्यवस्थाओं तक वह सक्रिय रहे। स्थानीय स्मृतियों के अनुसार, अल्मोड़ा के एक ठेकेदार ने संभावित आर्थिक घाटे के बावजूद विद्यालय भवन का निर्माण कार्य पूरा किया। विद्यालय की स्थापना और भवन निर्माण में जोशी जी के योगदान ने जोहार घाटी के बच्चों के लिए शिक्षा के नए अवसर उपलब्ध कराए।

अकाल के समय बने राहत दूत

जोशी जी की सेवाएं केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं थीं। स्थानीय लोगों के अनुसार, क्षेत्र में पड़े भीषण अकाल के दौरान उन्होंने जरूरतमंदों तक राहत पहुंचाने के प्रयास किए। बताया जाता है कि उनके प्रयासों से मुनस्यारी के वर्तमान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्थान पर हेलीकॉप्टर के माध्यम से राशन पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी।

यह प्रसंग बताता है कि वह शिक्षा के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर भी संवेदनशील थे। स्थानीय लोग बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता फैलाने और जरूरतमंद परिवारों की सहायता करने के उनके प्रयासों को भी याद करते हैं।

विद्यालय के स्तंभों पर अंकित कराए 24 जीवन-मूल्य

जोशी जी की शिक्षा-दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण विद्यालय के स्तंभों पर अंकित 24 जीवन-मूल्य हैं। उपलब्ध तस्वीरों और विवरणों के अनुसार, इनमें चरित्र, धैर्य, सफलता, ज्ञान, दया, उमंग, ध्यान, प्रेम, आशा, निष्ठा, सहयोग, उन्नति, प्रगति, शांति, सदाचार, विनय, उत्साह, परिश्रम, साहस, सत्य, अहिंसा, दर्शन, विवेक और करुणा जैसे मूल्य शामिल हैं।

दरकोट निवासी लक्ष्मण सिंह पांगती उर्फ ‘लज्बू’ एक प्रसंग याद करते हुए बताते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद जब जोशी जी विद्यालय आए, तो उन्होंने प्रार्थना सभा में विद्यार्थियों से स्तंभों की संख्या, उन पर लिखे शब्दों और उनके अर्थ पूछे। विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके। इस पर जोशी जी ने कहा कि उन्हें आज भी वे सभी बातें याद हैं।

यह प्रसंग दर्शाता है कि उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों को आत्मसात करना भी था।

बीएसएफ के पूर्व कमांडेंट ने साझा की स्मृतियां

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व कमांडेंट एवं मल्ला जोहार विकास समिति के अध्यक्ष राम सिंह धर्मशक्तू वर्ष 1961 में उसी विद्यालय के विद्यार्थी थे, जहां विपिन चंद्र जोशी प्रधानाचार्य थे। वह याद करते हैं, ‘जोशी जी स्वयं कक्षाओं में जाते थे। विद्यार्थियों के नाम याद रखते थे और पढ़ाई की नियमितता पर विशेष ध्यान देते थे। वह नहीं चाहते थे कि शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो। विद्यालय में स्वच्छता, बागवानी, एनसीसी, स्काउट, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाता था।’

विद्यालय की ऐतिहासिक फोटो-पट्टिका के अनुसार, वर्ष 1961 में राजकीय हाईस्कूल, मुनस्यारी ने उत्तर प्रदेश की राज्यस्तरीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उल्लेखनीय है कि उस समय उत्तराखंड अलग राज्य नहीं था और यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था।

राम सिंह धर्मशक्तू के अनुसार, विद्यालय के विद्यार्थियों को लखनऊ भी ले जाया गया था, जहां उन्होंने पारंपरिक वेशभूषा में मार्च-पास्ट और लेज़िम की प्रस्तुति दी। तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता ने विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रशंसा की थी। वापसी के दौरान भारी बर्फबारी के कारण विद्यार्थियों और शिक्षकों को कठिन पहाड़ी रास्तों से पैदल लौटना पड़ा। यह यात्रा विद्यार्थियों के लिए साहस, अनुशासन, सामूहिकता और गुरु-शिष्य संबंधों की अविस्मरणीय मिसाल बन गई।

सेवानिवृत्ति के बाद भी विद्यार्थियों के लिए बने प्रेरणास्रोत

विद्यालय के अभिलेखों के अनुसार, विपिन चंद्र जोशी ने 16 अगस्त 1954 से 24 जुलाई 1964 तक प्रधानाचार्य के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने 15 अक्टूबर 1974 को पुनः कार्यभार संभाला और 30 जून 1976 को इसी विद्यालय से सेवानिवृत्त हुए।

उनके शिष्य रहे लोक निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता पुरमल सिंह मर्तोलिया कहते हैं, ‘जोशी जी केवल हमारे प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि अनुशासन, सादगी, संवेदनशीलता और कर्मठता के प्रेरणास्रोत थे। उनके दोबारा आने से कॉलेज में अनुशासन और व्यवस्था बेहतर हुई। विद्यार्थियों, अभिभावकों और पूरी जोहार घाटी में उनके आगमन से प्रसन्नता का माहौल था। उनका स्नेह और मार्गदर्शन विद्यार्थियों को मेहनत, ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था।’

मर्तोलिया बताते हैं कि जोशी जी विद्यार्थियों से श्रमदान भी करवाते थे, ताकि उनमें सामूहिक जिम्मेदारी और श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो। वह भावुक होकर कहते हैं, ‘आज जीवन में मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, उसमें जोशी जी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद का महत्वपूर्ण योगदान है। उनके दिए संस्कारों ने मुझे अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने और समाज के लिए उपयोगी बनने की प्रेरणा दी।’

पहाड़ों में कंप्यूटर शिक्षा का देखा सपना

विपिन चंद्र जोशी की दूरदर्शिता का एक और उदाहरण पहाड़ों में कंप्यूटर शिक्षा शुरू करने की उनकी इच्छा थी। डॉ. मोहन सिंह लसपाल बताते हैं कि जोशी जी मुनस्यारी में एक कंप्यूटर लैब स्थापित करना चाहते थे, ताकि सीमांत क्षेत्र के बच्चों को भी आधुनिक तकनीक से जुड़ने का अवसर मिल सके।

इसी उद्देश्य से वह थल से नाचनी तक पैदल पहुंचे थे। लेकिन लगातार बारिश और रास्ते की कठिन परिस्थितियों के कारण उन्हें तीन दिन तक इंतजार करना पड़ा। दुर्भाग्यवश, उनका यह सपना साकार नहीं हो सका। यह प्रसंग उनकी उस सोच को सामने लाता है, जिसमें शिक्षा को बदलते समय और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़ने की चिंता थी। वह चाहते थे कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के बच्चे भी आधुनिक ज्ञान और तकनीक से वंचित न रहें।

आज भी जीवित हैं उनके दिए संस्कार

मुनस्यारी स्थित विद्यालय की स्मृति-पट्टिका के अनुसार, विपिन चंद्र जोशी मूल रूप से अल्मोड़ा के निवासी थे। पट्टिका में उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय विभाश जोशी, पुत्रियों बीनू जोशी और रेनू जोशी पांडे सहित परिवार के अन्य सदस्यों का उल्लेख है। स्मृति-पट्टिका पर उनकी पुण्यतिथि 7 दिसंबर 2002 अंकित है।

जोशी जी आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा स्थापित शैक्षिक परंपराएं, विद्यार्थियों को दिए गए संस्कार और समाज के प्रति समर्पण की भावना आज भी स्थानीय लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं। उनके पूर्व विद्यार्थियों की उपलब्धियां इस बात का प्रमाण हैं कि एक समर्पित शिक्षक किस प्रकार दूरस्थ क्षेत्र में रहकर भी अनेक पीढ़ियों का भविष्य संवार सकता है।

आज जब शिक्षा में आधुनिक तकनीक, कौशल विकास, नैतिक मूल्यों और आत्मनिर्भरता की बात की जाती है, तब विपिन चंद्र जोशी की सोच और भी प्रासंगिक दिखाई देती है। उन्होंने दशकों पहले ही इन विषयों के महत्व को समझ लिया था।

ऐसे में स्थानीय लोगों की पीड़ा और सवाल स्वाभाविक हैं। जिस व्यक्ति ने दुर्गम जोहार घाटी में शिक्षा के माध्यम से बदलाव की नींव रखी, उसके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए क्या पर्याप्त प्रयास हुए हैं? क्या ऐसे शिक्षाविद् के जीवन और कार्यों को व्यापक पहचान नहीं मिलनी चाहिए?

विपिन चंद्र जोशी जैसे शिक्षकों का योगदान केवल एक विद्यालय या क्षेत्र की विरासत नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा है। उन्हें याद करना महज श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा और समर्पण की उस परंपरा को आगे बढ़ाना है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी अनेक पीढ़ियों को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

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