

डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र
सहायक प्रोफेसर
दिल्ली विश्वविद्यालय
भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जिन्हें केवल उनके किरदारों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनका व्यक्तित्व उनके निभाए हुए पात्रों से कहीं बड़ा होता है। वे पर्दे पर आते हैं तो लगता है कि कोई किरदार बोल नहीं रहा, बल्कि समाज की कोई दबाई हुई आवाज हमारे सामने खड़ी है। नाना पाटेकर इसी श्रेणी के अभिनेता थे। उनकी आवाज में खुरदुरापन था, संवादों में आक्रोश था, चेहरे पर जीवन के संघर्षों की रेखाएं थीं और उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी बेचैनी थी, जो केवल अभिनय की बेचैनी नहीं थी।
नाना पाटेकर का जीवन भारतीय सिनेमा, रंगमंच, सेना, सामाजिक सरोकार और किसानों के प्रश्नों से होकर गुजरता है। उनका राष्ट्रवाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता से परिभाषित नहीं होता था। बल्कि उन्होंने स्वयं राजनीति से दूरी बनाए रखने की बात कही थी। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं बनने चाहिए, क्योंकि दलगत पहचान व्यक्ति की स्वतंत्र आवाज को सीमित कर सकती है।
यही कारण है कि नाना पाटेकर को समझने के लिए उनके उस कथन को याद करना जरूरी है जिसमें उन्होंने राष्ट्र को कलाकार से ऊपर रखा था। 2016 में पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर विवाद के दौरान उन्होंने कहा था कि कलाकारों की तुलना में राष्ट्र पहले आता है और सीमा पर लड़ने वाले जवान वास्तविक नायक हैं। यह वक्तव्य उनके राष्ट्रवादी विचारों की एक महत्वपूर्ण झलक देता है।
लेकिन नाना का राष्ट्रवाद केवल भाषणों का राष्ट्रवाद नहीं था। उनकी जिंदगी के कई अध्याय इस बात की ओर संकेत करते हैं कि वे देश को केवल सीमा, झंडे या सैन्य शक्ति के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए देश का अर्थ सैनिक भी था, किसान भी था, भूखा आदमी भी था और वह सामान्य नागरिक भी था जिसकी आवाज, व्यवस्था के शोर में दब जाती है।
संघर्ष से निकला हुआ राष्ट्रबोध
नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। उनका जन्म महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ और उन्होंने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने 1978 में फिल्म गमन से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की।
उनका बचपन और युवावस्था किसी फिल्मी परिवार की सुविधाओं में नहीं बीती। संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयां और जीवन की कठोर वास्तविकताएं उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनीं। “द लल्लनटॉप” के साथ बातचीत में उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों और भूख से जुड़े अनुभवों को याद किया था। इसी बातचीत में उन्होंने अपने नाम ‘नाना’ से जुड़ी कहानी भी बताई थी। शायद यही कारण है कि नाना का अभिनय हमेशा जमीन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। उनकी आंखों में केवल अभिनेता का अभिनय नहीं था, उसमें उस आदमी का अनुभव था, जिसने जीवन को दूर से नहीं, बहुत करीब से देखा था।
उनकी फिल्मी यात्रा में अंकुश, प्रतिघात, परिंदा, प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, यशवंत, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति, नटसम्राट और द वैक्सीन वॉर जैसी फिल्में आती हैं। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले और 2013 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। लेकिन पुरस्कारों से नाना को समझना अधूरा है। उनकी असली पहचान उस बेचैनी में थी जो उन्हें बार-बार व्यवस्था, समाज और व्यक्ति के संबंध पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करती थी।
‘प्रहार’: पर्दे से वास्तविक जीवन तक
नाना पाटेकर के राष्ट्रवादी व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ को विशेष रूप से देखना चाहिए। 1991 में बनी इस फिल्म के लिए उन्होंने भारतीय सेना से सैन्य प्रशिक्षण लिया था। यह प्रशिक्षण केवल अभिनय की तैयारी नहीं था; इसने उनके जीवन में सेना के प्रति एक गहरा जुड़ाव पैदा किया। उपलब्ध जीवनवृत्त के अनुसार उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी में सेवा की और बाद में लेफ्टिनेंट कर्नल के मानद पद तक पहुंचे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ जुड़े रहे।
द लल्लनटॉप को दिए अपने साक्षात्कार में नाना ने कारगिल जाने की इच्छा और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेने की बात बताई थी। आज तक ने इस साक्षात्कार के आधार पर रिपोर्ट किया कि नाना ने कहा था कि वे कारगिल युद्ध का हिस्सा बनना चाहते थे और उन्हें विशेष अनुमति मिली थी।
इंडियन एक्सप्रेस की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार नाना ने कारगिल के दौरान लगभग 60 दिन सेना के साथ बिताए और क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा रहे। रिपोर्ट ने उनके उसी लल्लनटॉप साक्षात्कार का भी संदर्भ दिया है।
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां अभिनेता और सैनिक के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। जिस व्यक्ति ने प्रहार में सैनिक की भूमिका निभाई, उसने वास्तविक जीवन में भी सेना के साथ समय बिताया। अभिनय में राष्ट्रवाद दिखाना एक बात है, लेकिन वास्तविक युद्धक्षेत्र के वातावरण में सैनिकों के साथ खड़ा होना दूसरी बात। इसीलिए नाना का राष्ट्रवाद केवल सिनेमाई राष्ट्रवाद नहीं कहा जा सकता।
‘तिरंगा’ और देशभक्ति का सिनेमाई चेहरा
नाना पाटेकर की फिल्म तिरंगा भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में देशभक्ति की फिल्मों के महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिनी जाती है। फिल्म में उन्होंने इंस्पेक्टर शिवाजीराव वागले की भूमिका निभाई थी, जबकि राजकुमार ने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह का किरदार निभाया था।
‘द लल्लनटॉप’ ने 8 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपने लेख में तिरंगा को देशभक्ति, आतंकवाद, भ्रष्ट राजनीति और पुलिस-सेना के संघर्ष से जोड़कर देखा। लेख में यह भी कहा गया कि फिल्म की देशभक्ति अपने समय की शैली के अनुरूप अत्यंत जोशीली और संवादप्रधान थी।
नाना के लिए देशभक्ति केवल सीमा पर खड़े सैनिक का विषय नहीं थी। उनकी फिल्मों में भ्रष्टाचार, अपराध, सामाजिक असमानता, राजनीतिक स्वार्थ और व्यवस्था की कमजोरियां भी देश के सवाल से जुड़ती हैं।
क्रांतिवीर में उनका प्रताप नारायण तिलक एक ऐसा पात्र था जो सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश का प्रतिनिधित्व करता है। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
नाना के संवादों की ताकत भी इसी कारण अलग थी। वे संवाद बोलते नहीं थे, उन्हें जीते थे। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने उनके निधन के बाद उनके प्रसिद्ध संवादों को याद करते हुए क्रांतिवीर, तिरंगा, यशवंत और अब तक छप्पन के संवादों का उल्लेख किया।
नाना की राष्ट्रवाद की परिभाषा
2023 में जब नसीरुद्दीन शाह की ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘गदर 2’ जैसी फिल्मों की लोकप्रियता पर टिप्पणी को लेकर बहस चल रही थी, तब नाना पाटेकर से राष्ट्रवाद के बारे में पूछा गया। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के अनुसार नाना ने कहा कि उनके लिए राष्ट्र के प्रति प्रेम दिखाना ही राष्ट्रवाद है और इसमें कुछ गलत नहीं है। यहीं नाना के राष्ट्रवाद की एक महत्वपूर्ण विशेषता दिखाई देती है।
वह राष्ट्रवाद को केवल नारे के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके लिए राष्ट्रवाद में प्रेम भी है और जिम्मेदारी भी। देश से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं कि हर चीज को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लिया जाए। बल्कि देश के प्रति प्रेम का अर्थ यह भी हो सकता है कि उसकी कमियों को सामने रखा जाए और उसके नागरिकों की समस्याओं पर सवाल किया जाए। उनके विचारों को इसी व्यापक अर्थ में पढ़ना चाहिए।
राष्ट्रवाद और किसान: नाना की सोच का दूसरा चेहरा
अगर कोई यह समझता है कि नाना पाटेकर का राष्ट्रवाद केवल सेना और सीमा तक सीमित था, तो उनके किसान संबंधी कार्य इस धारणा को बदल देते हैं।
2015 में महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में किसानों की आत्महत्याओं और सूखे की स्थिति ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। NDTV की उस समय की रिपोर्ट के अनुसार नाना किसान परिवारों के बीच पहुंचे, आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं को आर्थिक सहायता दी और किसानों से आत्महत्या न करने की अपील की। उन्होंने किसानों की समस्या को अपने जीवन के मिशन से जोड़ा। उनके इसी सामाजिक कार्य ने आगे चलकर ‘नाम फाउंडेशन’ के रूप में संस्थागत रूप लिया। नाना पाटेकर और अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सूखा प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों की सहायता करना था।
यहां राष्ट्रवाद की उनकी सोच का एक अलग आयाम दिखाई देता है।
यदि सीमा पर खड़ा सैनिक राष्ट्र की रक्षा करता है, तो खेत में खड़ा किसान भी राष्ट्र के अस्तित्व का आधार है। सैनिक देश की सीमा सुरक्षित करता है और किसान देश का पेट भरता है। नाना ने दोनों को अलग-अलग नहीं देखा। इसलिए उनके लिए किसान का प्रश्न भी राष्ट्र का प्रश्न था।
राष्ट्रवाद बनाम दलगत राजनीति
नाना पाटेकर का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे राष्ट्रवादी विचारों के बावजूद किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्वयं को बांधने के इच्छुक नहीं थे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उन्हें राजनीति में आने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने से इनकार किया। उनका तर्क था कि कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता समाज की साझा संपत्ति हैं; उन्हें किसी पार्टी की सीमा में नहीं बांधा जाना चाहिए। यह बात आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आज सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रवाद अक्सर राजनीतिक पहचान के साथ जोड़ दिया जाता है। नाना का व्यक्तित्व इस धारणा से थोड़ा अलग दिखाई देता है। वे राष्ट्रवादी विचार व्यक्त कर सकते थे, सरकार या व्यवस्था से सवाल भी कर सकते थे और किसानों के पक्ष में खड़े भी हो सकते थे – लेकिन स्वयं को किसी दल के प्रचारक की भूमिका में रखने से बचते थे। इस अर्थ में उनका राष्ट्रवाद राजनीतिक से अधिक नागरिक राष्ट्रवाद के करीब दिखाई देता है।
नाना पाटेकर के राष्ट्रवाद को केवल कठोर या सैन्य राष्ट्रवाद के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में सामाजिक एकता का पक्ष भी स्पष्ट दिखाई देता है। द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने हिंदू-मुस्लिम रक्त के बीच कोई अंतर न मानने की बात कही थी और धार्मिक नफरत पर सवाल उठाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। इस दृष्टि से नाना का राष्ट्रवाद विरोधाभासी नहीं, बल्कि व्यापक दिखाई देता है।
एक ओर वे सीमा की सुरक्षा और सैनिकों के सम्मान की बात करते हैं, दूसरी ओर वे देश के भीतर धार्मिक विभाजन के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं। एक ओर वे राष्ट्र को सर्वोच्च बताते हैं, दूसरी ओर किसानों और कमजोर वर्गों की चिंता करते हैं।
‘नाम’ से ‘काम’ तक
नाना पाटेकर की सामाजिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने केवल भाषण नहीं दिए। उन्होंने आर्थिक और सामाजिक स्तर पर हस्तक्षेप करने की कोशिश की।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार उन्होंने किसानों के परिवारों को आर्थिक सहायता दी, सूखा राहत के लिए पुरस्कार राशि दान की और ‘पाठशाला’ फिल्म से प्राप्त अपनी पारिश्रमिक राशि विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान की।
NDTV ने भी उनके किसान सहायता कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने किसान परिवारों की मदद के लिए व्यक्तिगत स्तर पर धन दिया और बाद में नाम फाउंडेशन की स्थापना की। यहां नाना का व्यक्तित्व अभिनेता से सामाजिक कार्यकर्ता में बदलता दिखाई देता है। उनका संदेश यह था कि यदि समाज में समस्या है तो केवल सरकार या किसी संस्था की ओर देखने के बजाय व्यक्ति को भी अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देना चाहिए।
मीडिया में नाना: बेबाकी, विवाद और स्वतंत्र आवाज
नाना पाटेकर का सार्वजनिक व्यक्तित्व हमेशा निर्विवाद नहीं रहा। वे विवादों में भी रहे और उनके कई बयान बहस का कारण बने। 2018 में तनुश्री दत्ता द्वारा लगाए गए आरोपों ने बॉलीवुड में #MeToo बहस को गति दी। इस पूरे प्रकरण में आरोप और जवाब दोनों सार्वजनिक चर्चा का विषय रहे हैं।
इस पक्ष को नाना की विरासत की चर्चा में छिपाना भी उचित नहीं होगा। किसी सार्वजनिक व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय उसकी उपलब्धियों के साथ विवादों को भी तथ्यात्मक और संतुलित रूप से देखना चाहिए। लेकिन यही नाना की सार्वजनिक छवि की जटिलता भी है। वे ऐसे व्यक्ति थे जो अपनी बात सीधे कहते थे। कभी उनकी बेबाकी प्रशंसा का कारण बनती थी, कभी आलोचना का। ‘द लल्लनटॉप’ के साथ उनका संवाद इसी बेबाक व्यक्तित्व का उदाहरण है। 2024 के एक कार्यक्रम में उनके संवाद, साक्षात्कार और फिल्मी अनुभवों पर विस्तृत बातचीत हुई। लल्लनटॉप ने उनके कारगिल अनुभव, क्रांतिवीर, तिरंगा और उनके जीवन के कई पहलुओं को दर्शकों तक पहुंचाया। इसका महत्व इसलिए भी है कि नाना की भाषा औपचारिक राजनीतिक भाषा नहीं थी। वे अपनी बात आम आदमी की भाषा में रखते थे। यही उनकी लोकप्रियता का एक कारण बना।
मृत्यु के बाद भी क्यों याद रहेंगे नाना?
8 अक्टूबर 2026 को नाना पाटेकर के निधन की खबर ने भारतीय सिनेमा और उनके प्रशंसकों को गहरे शोक में डुबो दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका निधन गोवा में हृदयाघात के बाद हुआ। लेकिन किसी कलाकार की वास्तविक मृत्यु उसके शरीर की मृत्यु से नहीं होती। कलाकार अपने किरदारों, संवादों, विचारों और सामाजिक प्रभाव के माध्यम से लंबे समय तक जीवित रहता है। नाना पाटेकर के साथ भी यही होगा।
तिरंगा का शिवाजीराव वागले, क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक, प्रहार का सैनिक संसार, अब तक छप्पन का कठोर पुलिस अधिकारी, नटसम्राट का गणपतराव बेलवलकर और किसानों के बीच खड़ा वास्तविक नाना – ये सभी उनकी स्मृति के अलग-अलग रूप हैं।
उनकी सबसे बड़ी विरासत का शायद यही प्रश्न है कि क्या राष्ट्र से प्रेम केवल नारा है, या जिम्मेदारी भी? नाना का जीवन इस प्रश्न का अपना उत्तर देता है। यदि देश से प्रेम है तो सैनिक का सम्मान करना होगा। यदि देश से प्रेम है तो किसान की पीड़ा समझनी होगी। यदि देश से प्रेम है तो गरीब की भूख को महसूस करना होगा। यदि देश से प्रेम है तो अपनी कला में ईमानदारी रखनी होगी। नाना पाटेकर का राष्ट्रवाद इसी जटिल और व्यापक धरातल पर दिखाई देता है।
वह केवल ‘देशभक्ति वाले संवादों’ के अभिनेता नहीं थे। उन्होंने देशभक्ति को कभी सेना के साथ, कभी किसान के साथ, कभी सामाजिक प्रश्नों के साथ और कभी अपने बेबाक वक्तव्यों के माध्यम से व्यक्त किया। उनका जीवन हमें यह भी बताता है कि राष्ट्रवाद का अर्थ केवल सीमा पर लड़ना नहीं है। देश को मजबूत बनाने के लिए खेत में मेहनत करने वाला किसान, अस्पताल में काम करने वाला डॉक्टर, ईमानदारी से पढ़ाने वाला शिक्षक, सड़क पर जिम्मेदारी निभाने वाला पुलिसकर्मी और अपने काम को ईमानदारी से करने वाला सामान्य नागरिक – सभी राष्ट्र निर्माण में भागीदार हैं।
शायद इसी कारण नाना की राष्ट्रवादी सोच को किसी राजनीतिक नारे में सीमित करना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। नाना के लिए राष्ट्र कोई अमूर्त शब्द नहीं था। वह मिट्टी थी, जिसमें उनका बचपन था। वह सेना थी, जिसके साथ उन्होंने समय बिताया। वह किसान था, जिसके घर का चूल्हा बुझ रहा था। वह आम आदमी था, जिसकी आवाज वे अपने संवादों में उठाते थे। और वह सिनेमा था, जिसके माध्यम से उन्होंने करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाई।
उनका जीवन अंततः यही कहता हुआ दिखाई देता है कि देश से प्रेम करना आसान है, लेकिन देश के लोगों के लिए खड़ा होना कठिन। नाना पाटेकर की विरासत इसी कठिन रास्ते में है। उनका अभिनय उन्हें महान अभिनेता बनाता है, लेकिन उनका सामाजिक सरोकार उन्हें एक सार्वजनिक व्यक्तित्व बनाता है। सेना से जुड़ाव उनके राष्ट्रवाद को वास्तविक संदर्भ देता है, किसानों के लिए काम उनकी राष्ट्र की अवधारणा को व्यापक बनाता है और उनकी बेबाकी उन्हें भीड़ से अलग करती है। इसलिए नाना पाटेकर को याद करने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनके प्रसिद्ध संवाद दोहराना नहीं, बल्कि उस सवाल को याद रखना है जो उनकी पूरी सार्वजनिक यात्रा के पीछे दिखाई देता है कि ‘ हम अपने देश के लिए वास्तव में क्या कर रहे हैं? यही प्रश्न नाना को अभिनेता से आगे ले जाता है और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
