
मेहरावना एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय के निर्माण पर उठे गंभीर सवाल; ₹42 करोड़ खर्च और महज 40 प्रतिशत काम होने का दावा, अभिभावक संघ अध्यक्ष शूरवीर डोभाल ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री से की उच्चस्तरीय जांच की मांग
- नीरत उत्तराखंडी/हिमांतर वेब डेस्क, चकराता/देहरादून
जनजातीय बच्चों को बेहतर शिक्षा और आधुनिक आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई मेहरावना स्थित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय की निर्माण परियोजना सवालों के घेरे में है। लगभग ₹45.76 करोड़ की अनुमानित निविदा लागत वाली इस परियोजना का भवन चार साल बाद भी अधूरा होने का आरोप है। निर्माण की धीमी गति, सरकारी धन के उपयोग और कार्य की गुणवत्ता को लेकर अभिभावक संघ ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
विद्यालय अभिभावक संघ के अध्यक्ष शूरवीर डोभाल ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को पत्र भेजकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि निर्माण पर लगभग ₹42 करोड़ खर्च हो चुके हैं, जैसा कि शिकायत में दावा किया गया है, तो विद्यालय भवन अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ? खर्च की गई धनराशि के अनुपात में कितना निर्माण हुआ और परियोजना की निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने इस दौरान क्या कदम उठाए?
₹42 करोड़ खर्च, लेकिन निर्माण महज 40 प्रतिशत होने का दावा
अभिभावक संघ अध्यक्ष शूरवीर डोभाल ने 4 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को भेजे पत्र में आरोप लगाया है कि चार वर्ष बीतने के बावजूद विद्यालय भवन का निर्माण पूरा नहीं हो सका है। उनका दावा है कि परियोजना पर लगभग ₹42 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं, जबकि मौके पर निर्माण कार्य की प्रगति करीब 40 प्रतिशत ही है।
हालांकि, ₹42 करोड़ के वास्तविक व्यय और 40 प्रतिशत निर्माण कार्य के दावे की अभी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इन तथ्यों की पुष्टि के लिए निर्माण एजेंसी के भुगतान अभिलेख, भौतिक प्रगति रिपोर्ट और संबंधित विभाग के दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।

उपलब्ध सरकारी ई-टेंडर अभिलेख के अनुसार, मेहरावना स्थित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय की निर्माण एवं विकास परियोजना की अनुमानित निविदा लागत ₹45,76,18,927 दर्ज है। निविदा में कार्य अवधि 540 दिन बताई गई है। हालांकि, वास्तविक निर्माण शुरू होने और कार्य पूरा करने की अंतिम तारीख की पुष्टि कार्यादेश एवं अन्य आधिकारिक अभिलेखों से ही हो सकेगी। यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि ₹45.76 करोड़ की राशि अनुमानित निविदा लागत है, न कि परियोजना पर अब तक किए गए वास्तविक भुगतान का प्रमाण।
निर्माण में देरी पर NPCC की जवाबदेही का सवाल
मेहरावना विद्यालय की निर्माण परियोजना राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम लिमिटेड (NPCC) से संबंधित है। अभिभावक संघ ने निर्माण कार्य की गति और गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए परियोजना की निगरानी तथा वित्तीय प्रबंधन की जांच की मांग की है।
सवाल यह है कि निर्माण कार्य की वास्तविक शुरुआत कब हुई और उसे पूरा करने की निर्धारित समयसीमा क्या थी? यदि कार्य निर्धारित समय में पूरा नहीं हुआ, तो देरी के कारणों की समीक्षा किस स्तर पर की गई? क्या निर्माण एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगा गया? क्या समयसीमा बढ़ाई गई और यदि बढ़ाई गई, तो किन परिस्थितियों में?
इसके साथ ही यह भी जांच का विषय है कि परियोजना की निगरानी करने वाले अधिकारियों ने कितनी बार स्थलीय निरीक्षण किया और उन निरीक्षणों में निर्माण की प्रगति तथा गुणवत्ता को लेकर क्या निष्कर्ष सामने आए। इन सवालों के जवाब कार्यादेश, भुगतान विवरण, माप पुस्तिका (एमबी), गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और विभागीय निरीक्षण अभिलेखों से सामने आने चाहिए।
इस संबंध में NPCC के संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। ऐसे में निर्माण की वर्तमान स्थिति, अब तक हुए भुगतान और देरी के कारणों पर निर्माण एजेंसी का आधिकारिक पक्ष प्राप्त नहीं हो पाया है। एजेंसी का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अधूरे भवन का असर विद्यार्थियों की सुविधाओं पर
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य जनजातीय समुदाय के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित और बेहतर आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे में विद्यालय के स्थायी भवन के निर्माण में कथित देरी का मामला केवल निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों की शैक्षणिक सुविधाओं से भी जुड़ा है।
अभिभावक संघ अध्यक्ष शूरवीर डोभाल का कहना है कि भवन निर्माण पूरा नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को अपेक्षित सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने विद्यालय भवन का निर्माण शीघ्र पूरा कराकर विद्यार्थियों को स्थायी परिसर में स्थानांतरित करने की मांग की है।
विद्यालय के शैक्षणिक सत्र 2026–27 की प्रवेश संबंधी सूचना में उसका पता विद्यावती हॉस्टल, गढ़वाली कॉलोनी, भाऊवाला, देहरादून दर्ज है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मेहरावना में प्रस्तावित स्थायी परिसर विद्यार्थियों को कब तक उपलब्ध कराया जाएगा।
जिन जनजातीय विद्यार्थियों के बेहतर भविष्य के लिए करोड़ों रुपये की परियोजना शुरू की गई, उन्हें समय पर निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध कराना संबंधित विभागों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग
शूरवीर डोभाल ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को भेजे पत्र में निर्माण की वास्तविक प्रगति, खर्च की गई धनराशि और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने परियोजना को शीघ्र पूरा कराने और किसी भी स्तर पर लापरवाही अथवा अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
पत्र में जिलाधिकारी, देहरादून को भी प्रतिलिपि भेजे जाने का उल्लेख है।
अब सवाल यह है कि क्या केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय इस शिकायत का संज्ञान लेकर स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच कराएगा? क्या निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग परियोजना पर अब तक जारी धनराशि, वास्तविक भुगतान तथा भौतिक प्रगति का विवरण सार्वजनिक करेंगे?
यदि परियोजना में देरी हुई है, तो उसके वास्तविक कारण क्या हैं और देरी के लिए किस स्तर पर जवाबदेही निर्धारित की गई है, यह स्पष्ट होना आवश्यक है।
इन पांच सवालों के जवाब जरूरी
- वित्तीय स्थिति: परियोजना का कुल स्वीकृत बजट कितना है और अब तक निर्माण एजेंसी को वास्तव में कितना भुगतान किया गया है?
- निर्माण की समयसीमा: कार्यादेश कब जारी हुआ, निर्माण कब शुरू हुआ और भवन पूरा करने की मूल निर्धारित तारीख क्या थी?
- वास्तविक प्रगति: वर्तमान में निर्माण कार्य की प्रमाणित भौतिक प्रगति कितनी है और शेष कार्य पूरा होने में कितना समय लगेगा?
- गुणवत्ता की जांच: निर्माण सामग्री और कार्य की गुणवत्ता की जांच कब-कब हुई तथा निरीक्षण रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष दर्ज किए गए?
- जवाबदेही और विद्यार्थियों का भविष्य: निर्माण में देरी के लिए क्या कार्रवाई की गई और विद्यार्थियों को स्थायी विद्यालय भवन कब तक उपलब्ध कराया जाएगा?
सरकारी धन के उपयोग और जवाबदेही का मामला
मेहरावना स्थित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय के निर्माण को लेकर उठे सवाल सार्वजनिक धन के उपयोग, सरकारी परियोजनाओं की निगरानी और जनजातीय विद्यार्थियों को समय पर सुविधाएं उपलब्ध कराने से जुड़े हैं।
अभिभावक संघ की शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि परियोजना की वास्तविक स्थिति क्या है, कितना भुगतान किया गया है और निर्माण में कथित देरी के पीछे कौन-से कारण जिम्मेदार हैं।
यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही, वित्तीय अनियमितता या निर्माण गुणवत्ता में कमी प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना का स्थायी भवन कब पूरा होगा और जनजातीय विद्यार्थियों को इसका लाभ कब मिलेगा?
