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नाना पाटेकर : शरहद से सिनेमा तक

नाना पाटेकर : शरहद से सिनेमा तक

कला-रंगमंच
 डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र सहायक प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालयभारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जिन्हें केवल उनके किरदारों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनका व्यक्तित्व उनके निभाए हुए पात्रों से कहीं बड़ा होता है। वे पर्दे पर आते हैं तो लगता है कि कोई किरदार बोल नहीं रहा, बल्कि समाज की कोई दबाई हुई आवाज हमारे सामने खड़ी है। नाना पाटेकर इसी श्रेणी के अभिनेता थे। उनकी आवाज में खुरदुरापन था, संवादों में आक्रोश था, चेहरे पर जीवन के संघर्षों की रेखाएं थीं और उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी बेचैनी थी, जो केवल अभिनय की बेचैनी नहीं थी।नाना पाटेकर का जीवन भारतीय सिनेमा, रंगमंच, सेना, सामाजिक सरोकार और किसानों के प्रश्नों से होकर गुजरता है। उनका राष्ट्रवाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता से परिभाषित नहीं होता था। बल्कि उन्होंने स्वयं राजनीति से दूरी बनाए रखने की बात कही थी। एक पु...