
पुस्तक समीक्षा

जबर सिंह रावत ‘सरनोली’
माँ रेणुका मेले के शुभ अवसर पर 5 जून 2026 को ग्राम सरनौल में लोकसंस्कृति और लोकसाहित्य के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण आयोजन सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर लोकसंस्कृति शोधकर्ता एवं लेखक ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ की नवीन पुस्तक ‘रवांई के लोकगीत’ का भव्य लोकार्पण किया गया। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रवांई क्षेत्र की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत, लोकगीतों, लोक कलाकारों और परंपराओं के सामूहिक सम्मान का उत्सव बन गया।
इस कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि पुस्तक का लोकार्पण उसी विद्यालय में सम्पन्न हुआ जहाँ लेखक ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। लेखक के लिए यह अवसर भावनात्मक और स्मरणीय था, क्योंकि जिस स्थान पर कभी उन्होंने अपने सहपाठियों के साथ बैठकर भविष्य के सपने देखे थे, उसी भूमि पर उनकी वर्षों की साधना का परिणाम स्वरूप यह कृति समाज को समर्पित की गई।
समारोह में क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों, शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा लोक कलाकारों ने सहभागिता की। वरिष्ठ साहित्यकार महावीर रवांल्टा, पूर्व विधायक केदार सिंह रावत, प्राचार्य डॉ. रूकम सिंह असवाल, समय साक्ष्य प्रकाशन के प्रवीन भट्ट तथा अन्य गणमान्य अतिथियों ने पुस्तक की उपयोगिता और महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में लोकसंस्कृति के संरक्षण में योगदान देने वाले वयोवृद्ध व्यक्तियों और कलाकारों को सम्मानित भी किया गया।
पुस्तक का स्वरूप और विषय-वस्तु
228 पृष्ठों की यह पुस्तक, जिसका प्रकाशन समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून द्वारा किया गया है, रवांई क्षेत्र की मौखिक लोकपरंपरा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। पुस्तक का मूल्य 275 रुपये रखा गया है तथा इसमें कुल 12 अध्याय हैं।

पुस्तक का प्रथम अध्याय रवांई क्षेत्र के संक्षिप्त परिचय से आरम्भ होता है। इसके बाद विभिन्न लोकगीत विधाओं का क्रमबद्ध संकलन और विवेचन प्रस्तुत किया गया है। देव स्तुति गीत, मांगल गीत तथा बसंत ऋतु में गाए जाने वाले चैती गीत क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करते हैं।
पुस्तक का पाँचवाँ अध्याय ‘तांदी गीत’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें प्रेम, प्रकृति, पशुपालन, ढाकर, पंडों तथा भेड़पालक समुदाय से जुड़े गीतों का संकलन किया गया है। यह अध्याय रवांई के सामाजिक जीवन और लोकमानस का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है।
‘विविध गीत’ शीर्षक अध्याय में परिस्थितिजन्य और व्यक्तिगत भावनाओं से जुड़े गीतों को स्थान दिया गया है। वहीं ‘लोरी गीत’ अध्याय मातृत्व और वात्सल्य की लोकधारा को अभिव्यक्त करता है।
‘छोपती गीत’ पुस्तक का अत्यंत रोचक भाग है। मंदिर प्रांगणों में दो दलों द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में गाए जाने वाले ये गीत लोकबुद्धि, काव्य-कौशल और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत उदाहरण हैं।
‘लामण गीत’ को प्रसिद्ध लोकविद् डॉ. गोविन्द चातक ने शुद्ध काव्यात्मक लोकविधा माना है। पुस्तक में इस विधा का भी प्रभावशाली संकलन प्रस्तुत किया गया है।

‘बाजूबन्द गीत’ उन लोकधुनों को संरक्षित करते हैं जो कभी जंगलों में घास, लकड़ी और पशुचारे के लिए जाने वाले युवक-युवतियों के मनोरंजन का प्रमुख माध्यम हुआ करते थे। आधुनिक पीढ़ी इन गीतों से लगभग अपरिचित हो चुकी है; ऐसे में उनका दस्तावेजीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है।
‘छोड़े गीत’ जीवन-दर्शन, संघर्ष, सुख-दुःख, जन्म-मरण और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं। पुस्तक का अंतिम अध्याय लोकगाथाओं पर आधारित छोड़े गीतों को समर्पित है, जिनमें लोकनायकों, वीर पुरुषों और देवी-देवताओं के जीवन प्रसंगों का वर्णन मिलता है।
पुस्तक का महत्व
‘रवांई के लोकगीत’ केवल गीतों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक पूरे सांस्कृतिक भूगोल की स्मृतियों, परम्पराओं और लोकचेतना का दस्तावेज़ है। तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में जब लोकगीतों की परम्परा विलुप्ति के कगार पर पहुँच रही है, तब यह कृति संरक्षण और संवर्धन का महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध होती है।

लेखक ने वर्षों तक गाँव-गाँव जाकर, लोकगायकों और बुजुर्गों से संवाद स्थापित कर जो सामग्री संकलित की है, वह शोधार्थियों, साहित्यकारों, लोकसंस्कृति प्रेमियों तथा नई पीढ़ी के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। पुस्तक रवांई की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और उसे व्यापक समाज तक पहुँचाने का सफल प्रयास है।
निस्संदेह, ‘रवांई के लोकगीत’ उत्तराखण्ड की लोकसांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और आने वाले समय में यह पुस्तक लोकसाहित्य के क्षेत्र में एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित होगी।
