
विज्ञान ने संकट पहचाना, दुनिया ने हाथ मिलाया; अब लक्ष्य है- ओजोन-सुरक्षित और जलवायु-अनुकूल शीतलन
डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल
विज्ञान शिक्षक
पी एम श्री कमलाराम नौटियाल राजकीय आदर्श इंटर कॉलेज, धौंतरी (उत्तरकाशी)
(राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी भारत द्वारा उत्कृष्ट विज्ञान शिक्षक सम्मान 2022)
कभी किसी शांत सुबह हिमालय की ऊंची पहाड़ी से आकाश की ओर देखिए। दूर तक फैला नीला विस्तार, बादलों की सफेद परतें और उनके बीच से उतरती सूर्य की सुनहरी किरणें हमें प्रकृति की विराटता का अनुभव कराती हैं। हम प्रकाश को देखते हैं, सूर्य की गर्माहट महसूस करते हैं और हवा के स्पर्श को अनुभव कर सकते हैं। किंतु इसी आकाश में प्रकृति ने जीवन की रक्षा के लिए एक ऐसी ढाल बना रखी है, जो न दिखाई देती है और न हाथों से छुई जा सकती है। यही अदृश्य प्रहरी है—ओजोन परत।
धरती पर जीवन की कहानी में ओजोन की मात्रा बहुत कम है, लेकिन उसकी भूमिका असाधारण है। यह हमें यह भी सिखाती है कि प्रकृति में किसी वस्तु का महत्व उसके आकार या मात्रा से नहीं, बल्कि पारिस्थितिक व्यवस्था में उसकी भूमिका से निर्धारित होता है।
प्रतिवर्ष 16 सितम्बर को मनाया जाने वाला विश्व ओजोन दिवस इस अदृश्य सुरक्षा कवच के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराता है। वर्ष 2026 इस यात्रा में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि किगाली संशोधन को अपनाए जाने के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। वैश्विक विमर्श अब ओजोन संरक्षण के साथ-साथ सतत और जलवायु-अनुकूल शीतलन पर भी केंद्रित हो रहा है।
तीन परमाणुओं में छिपा जीवन का सुरक्षा कवच
हम जिस ऑक्सीजन से सांस लेते हैं, उसका अणु दो ऑक्सीजन परमाणुओं से मिलकर बना होता है, जिसे O₂ कहते हैं। जब तीन ऑक्सीजन परमाणु मिलते हैं, तो O₃ अर्थात ओजोन बनती है।
ओजोन का अधिकांश भाग समतापमंडल में पाया जाता है। वहां यह सूर्य से आने वाले हानिकारक पराबैंगनी विकिरण, विशेषकर UV-B, के बड़े हिस्से को अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षा प्रदान करती है। इस अर्थ में ओजोन परत को धरती का प्राकृतिक ‘सनस्क्रीन’ भी कहा जा सकता है।
प्रकृति इसकी रचना भी अद्भुत ढंग से करती है। सूर्य की उच्च ऊर्जा वाली पराबैंगनी किरणें ऑक्सीजन के अणुओं को तोड़ सकती हैं। मुक्त ऑक्सीजन परमाणु दूसरे ऑक्सीजन अणुओं से मिलकर ओजोन बनाते हैं। साथ ही ओजोन का प्राकृतिक विघटन भी होता रहता है। निर्माण और विघटन का यही संतुलन पृथ्वी के जीवन-सुरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब मानव सुविधा ने अदृश्य ढाल को घायल किया
बीसवीं सदी में रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एरोसोल और फोम उद्योग ने आधुनिक जीवन को सुविधाजनक बनाया। इनमें प्रयुक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे पदार्थ आरंभ में अत्यंत उपयोगी माने गए, लेकिन विज्ञान ने धीरे-धीरे इनके गंभीर पर्यावरणीय प्रभावों को उजागर किया।
CFCs निचले वायुमंडल में बहुत स्थिर होते हैं। समय के साथ वे समतापमंडल तक पहुंच सकते हैं, जहां पराबैंगनी विकिरण उनके अणुओं से क्लोरीन मुक्त कर सकता है। यही क्लोरीन रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से बार-बार ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकती है।
अंटार्कटिका के ऊपर दिखाई देने वाला प्रसिद्ध ‘ओजोन होल’ वास्तव में आसमान में बना कोई भौतिक छेद नहीं है, बल्कि ओजोन की सांद्रता में होने वाली अत्यधिक मौसमी कमी है। ओजोन की कुल मात्रा को सामान्यतः डॉब्सन यूनिट में व्यक्त किया जाता है।
यहीं से ओजोन की कहानी केवल रसायन विज्ञान की कहानी नहीं रहती, बल्कि मानव स्वास्थ्य, कृषि, जैव विविधता और पृथ्वी के भविष्य की कहानी बन जाती है।
यदि यह ढाल कमजोर हो जाए तो…
ओजोन में कमी का अर्थ है पृथ्वी की सतह तक अधिक हानिकारक UV-B विकिरण पहुंचने की संभावना। अत्यधिक UV-B मानव त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके प्रभाव पौधों, फसलों, सूक्ष्मजीवों और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुंच सकते हैं।
इसलिए ओजोन की रक्षा किसी दूरस्थ वायुमंडलीय परत को बचाने भर का प्रश्न नहीं है। यह खेत की फसल, जंगल की हरियाली, समुद्र के सूक्ष्म जीवन और मनुष्य के स्वास्थ्य—सभी की सुरक्षा का प्रश्न है।
हिमालय के आकाश से यह प्रश्न और बड़ा हो जाता है
हिमालय में प्रकृति जितनी सुंदर है, उतनी ही संवेदनशील भी।
यहां हिमनद हैं, नदियों के उद्गम हैं, बुग्याल हैं, उच्च हिमालयी वनस्पतियां हैं और जल-जंगल-जमीन से गहराई से जुड़े समुदाय हैं। बदलती जलवायु, तापमान में परिवर्तन और वर्षा-पद्धति में बदलाव जैसी चुनौतियां पहले ही इस क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
इसलिए हिमालय में पर्यावरण शिक्षा को अलग-अलग अध्यायों में बांटकर नहीं देखा जा सकता। ओजोन, जलवायु, हिमनद, जल स्रोत, जैव विविधता, ऊर्जा और सतत विकास—ये सभी हमारे साझा पर्यावरणीय भविष्य के परस्पर जुड़े अध्याय हैं।
1987: जब दुनिया ने विज्ञान की बात सुनी
ओजोन संकट की सबसे प्रेरक बात यह है कि मानवता ने केवल समस्या को पहचाना नहीं, बल्कि उसके समाधान के लिए मिलकर कदम भी उठाए।
16 सितम्बर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अपनाया गया। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते ने ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से नियंत्रित करने की वैश्विक व्यवस्था बनाई। इसी ऐतिहासिक पहल की स्मृति में 16 सितम्बर को ओजोन परत के संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस वैश्विक प्रयास के परिणाम आशा जगाते हैं। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, नियंत्रित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों का लगभग 99 प्रतिशत चरणबद्ध रूप से समाप्त किया जा चुका है। वर्तमान नीतियां जारी रहने पर ओजोन परत के 1980 के स्तरों के आसपास लौटने का अनुमान अधिकांश विश्व में लगभग 2040, आर्कटिक में 2045 और अंटार्कटिका में लगभग 2066 तक लगाया गया है।
यह उपलब्धि केवल पर्यावरण विज्ञान की सफलता नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब वैज्ञानिक प्रमाण, नीति, तकनीक और वैश्विक इच्छाशक्ति एक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो पृथ्वी के बड़े संकटों का समाधान भी संभव है।
2026 का नया संदेश: अब केवल ओजोन नहीं, शीतलन भी टिकाऊ हो
ओजोन-सुरक्षित विकल्पों की खोज ने एक नई चुनौती भी सामने रखी। कुछ हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) ओजोन परत को सीधे नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन उनमें से कई शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए 2016 में किगाली संशोधन अपनाया गया। इसका उद्देश्य HFCs के उपयोग को चरणबद्ध ढंग से कम करना है। वर्ष 2026 में इसके दस वर्ष पूरे होने के कारण सतत शीतलन का विषय और अधिक प्रासंगिक हो गया है।
दुनिया गर्म हो रही है तो एयर कंडीशनिंग की मांग भी बढ़ रही है। खाद्य सुरक्षा के लिए कोल्ड स्टोरेज चाहिए, अस्पतालों और टीकों के लिए विश्वसनीय कोल्ड चेन आवश्यक है। लेकिन यदि बढ़ती शीतलन आवश्यकता को अत्यधिक ऊर्जा खपत और उच्च ग्लोबल वार्मिंग क्षमता वाली गैसों के सहारे पूरा किया गया, तो एक पर्यावरणीय समस्या का समाधान दूसरी समस्या को बढ़ा सकता है।
इसलिए भविष्य का वास्तविक प्रश्न यह है कि हम ऐसी शीतलन तकनीक कैसे विकसित और अपनाएं, जो मनुष्य को राहत दे लेकिन पृथ्वी को और गर्म न करे।
यही सतत शीतलन की मूल भावना है।
ऊर्जा-दक्ष उपकरण, कम जलवायु प्रभाव वाले रेफ्रिजरेंट, बेहतर भवन डिजाइन, प्राकृतिक वेंटिलेशन, उपकरणों का नियमित रखरखाव, रेफ्रिजरेंट रिसाव की रोकथाम और स्वच्छ ऊर्जा का अधिक उपयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
प्रयोगशाला से निकलकर बच्चों के हाथों तक पहुंचे ओजोन विज्ञान
विद्यालयों के लिए विश्व ओजोन दिवस केवल भाषण, निबंध और पोस्टर प्रतियोगिता का अवसर बनकर नहीं रहना चाहिए।
कल्पना कीजिए—बच्चे STEM Lab में ओजोन निर्माण और क्षरण का मॉडल समझ रहे हों; UV-संवेदनशील सामग्री की सहायता से सूर्य विकिरण का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हों; विद्यालय के विभिन्न स्थानों का तापमान माप रहे हों; भवन में प्राकृतिक वेंटिलेशन की प्रभावशीलता जांच रहे हों; सौर ऊर्जा से चलने वाले छोटे कूलिंग मॉडल बना रहे हों और घरों में प्रयुक्त रेफ्रिजरेटर तथा एयर कंडीशनर की ऊर्जा दक्षता का सर्वेक्षण कर रहे हों।
तब पर्यावरण शिक्षा किताब के पन्नों से निकलकर अनुसंधान, प्रयोग और नवाचार का रूप ले लेगी।
हमारे बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि पृथ्वी संकट में है। उन्हें यह अवसर भी देना होगा कि वे स्वयं समस्या को समझें, वैज्ञानिक प्रश्न पूछें, प्रयोग करें और समाधान खोजें।
यही प्रक्रिया भविष्य के वैज्ञानिकों, नवाचारकर्ताओं और जिम्मेदार नागरिकों को तैयार करेगी।
विज्ञान प्रकृति का विरोधी नहीं, उसका जिम्मेदार साथी बने
आधुनिक पर्यावरण विमर्श में विज्ञान और प्रकृति को दो विरोधी ध्रुव मान लेना उचित नहीं है। समस्या विज्ञान में नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक के अविवेकपूर्ण उपयोग में है।
रेफ्रिजरेशन ने भोजन और दवाओं को सुरक्षित रखने में क्रांति की। एयर कंडीशनिंग ने अत्यधिक गर्मी में जीवन और कार्य को सुविधाजनक बनाया। अब अगला कदम इन सुविधाओं को अधिक ऊर्जा-दक्ष, पर्यावरण-अनुकूल और न्यायसंगत बनाना है।
वास्तविक वैज्ञानिक प्रगति वही है, जिसमें मनुष्य की सुविधा और पृथ्वी की सहनशीलता के बीच संतुलन हो।
आसमान हमें उम्मीद भी देता है
पर्यावरण की खबरें अक्सर संकट से शुरू होकर निराशा पर समाप्त होती हैं, लेकिन ओजोन की कहानी अलग है।
मानव गतिविधियों ने समस्या पैदा की। वैज्ञानिकों ने खतरे को पहचाना। दुनिया ने वैज्ञानिक प्रमाणों को स्वीकार किया। देशों ने समझौता किया। उद्योगों ने तकनीक बदली और दशकों बाद प्रकृति ने सुधार के संकेत दिखाने शुरू किए।
इसलिए ओजोन परत केवल पृथ्वी की सुरक्षा ढाल नहीं है; वह मानवता की सामूहिक क्षमता और वैज्ञानिक चेतना का प्रतीक भी है।
यह हमें बताती है कि पर्यावरणीय क्षति अपरिहार्य नियति नहीं है। समय रहते विज्ञान की बात सुनी जाए, प्रभावी नीतियां बनाई जाएं और समाज सहभागी बने, तो दिशा बदली जा सकती है।
आज यही सीख जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण, जैव विविधता ह्रास, जल संकट और हिमालयी पारिस्थितिकी की चुनौतियों से निपटने में हमारे काम आ सकती है।
आने वाली पीढ़ियों के नाम एक संकल्प
16 सितम्बर को जब हम विश्व ओजोन दिवस मनाएं, तो केवल यह याद न करें कि पृथ्वी से कई किलोमीटर ऊपर ओजोन की एक परत है।
हम यह भी याद रखें कि हमारे घर का रेफ्रिजरेटर, कार्यालय का एयर कंडीशनर, भवन का डिजाइन, बिजली की खपत, बच्चों की वैज्ञानिक शिक्षा और वैश्विक पर्यावरण नीति—सभी किसी न किसी रूप में उसी आकाश से जुड़े हैं।
प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं अक्सर हमें दिखाई नहीं देतीं। हवा दिखाई नहीं देती, गुरुत्वाकर्षण दिखाई नहीं देता और ओजोन की वह पतली सुरक्षा परत भी दिखाई नहीं देती; फिर भी हमारा जीवन इन्हीं अदृश्य व्यवस्थाओं पर टिका है।
पृथ्वी हमें केवल विरासत में मिली संपत्ति नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों की वह अमानत भी है, जिसे हमें उनसे उधार लिया हुआ समझना चाहिए।
आइए, विश्व ओजोन दिवस 2026 पर हम एक ऐसा संकल्प लें, जिसमें विज्ञान भी हो, संवेदना भी और समाधान भी। हम ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करें, पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को प्रोत्साहित करें, टिकाऊ शीतलन को अपनाएं और अपने विद्यार्थियों में ऐसी वैज्ञानिक चेतना जगाएं, जो उन्हें केवल पृथ्वी का निवासी नहीं, बल्कि उसका सजग संरक्षक बनाए।
क्योंकि ओजोन परत की रक्षा केवल आसमान की रक्षा नहीं है। यह उस हर सांस की रक्षा है, जो आज पृथ्वी पर चल रही है—और उस हर सांस की भी, जो आने वाली पीढ़ियां लेंगी।

