
- हिमांतर वेब डेस्क
लेह, लद्दाख: उत्तराखंड की पहाड़ियों में ट्रैकिंग और पहाड़ी रास्तों पर दौड़ने के शौकीन चिराग उप्रेती ने 13 सितंबर को प्रतिष्ठित लद्दाख मैराथन सफलतापूर्वक पूरी की। उन्होंने 4 घंटे 17 मिनट के आधिकारिक चिप टाइम के साथ फिनिश लाइन पार की।
नैनीताल में जन्मे और पले-बढ़े चिराग ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज, नैनीताल से पूरी की। उनका परिवार मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के खेती गाँव का रहने वाला है। गाँव में उनका पैतृक घर भी है, जिसकी इन दिनों मरम्मत कराई जा रही है। स्कूल के दिनों में चिराग अक्सर अपने पैतृक गाँव जाया करते थे।
वर्तमान में चिराग न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंटिस्ट हैं। उनकी रिसर्च का फोकस मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को समझने पर है। ऐसे में अपनी रनिंग जर्नी की सबसे कठिन रेसों में से एक के लिए हिमालय लौटना उनके लिए व्यक्तिगत रूप से भी खास अनुभव रहा।

ऊँचाई ने बढ़ाई चुनौती
लद्दाख मैराथन को दुनिया की चुनौतीपूर्ण हाई-एल्टीट्यूड रोड मैराथनों में गिना जाता है। 42.195 किलोमीटर की यह रेस लेह और उसके आसपास समुद्र तल से करीब 3,500 मीटर यानी लगभग 11,500 फीट की ऊँचाई पर आयोजित होती है। कम ऑक्सीजन के कारण यहाँ दौड़ना समुद्र तल पर होने वाली मैराथन की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ऊँचाई के साथ लद्दाख की शुष्क जलवायु, तापमान में उतार-चढ़ाव और कठिन रास्ता धावकों की परीक्षा लेते हैं। इसलिए शरीर का स्थानीय वातावरण के अनुकूल होना यानी ‘एक्लिमेटाइजेशन’ और रेस के दौरान सही गति बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
चिराग ने इस मैराथन के लिए करीब 20 सप्ताह तक विशेष प्रशिक्षण लिया। वह 2 सितंबर को ही लेह पहुँच गए थे, ताकि 13 सितंबर को होने वाली रेस से पहले उन्हें ऊँचाई और स्थानीय वातावरण के अनुकूल होने के लिए 11 दिन का समय मिल सके।
अपने अनुभव के बारे में चिराग ने कहा, “ट्रेनिंग पैरों को इतनी दूरी तक दौड़ने के लिए तैयार करती है, लेकिन लद्दाख एक अतिरिक्त चुनौती पेश करता है, क्योंकि शरीर को ऊँचाई के हिसाब से भी ढलना पड़ता है।”
आखिरी छह किलोमीटर बने असली परीक्षा
रेस सुबह छह बजे लेह के ठंडे मौसम में शुरू हुई। शुरुआती कुछ किलोमीटर अपेक्षाकृत आसान थे, क्योंकि शहर से बाहर निकलते समय रास्ते का एक बड़ा हिस्सा ढलान वाला था। लेकिन शुरुआत की तेज रफ्तार धावकों के लिए भ्रामक भी हो सकती है। आगे आने वाली कठिन चढ़ाई को देखते हुए ऊर्जा बचाना बेहद जरूरी था।
करीब 35 किलोमीटर से अधिक की दूरी पूरी करने के बाद रास्ता फिर लेह की ओर चढ़ने लगता है। आखिरी छह किलोमीटर का अधिकांश हिस्सा चढ़ाई वाला है और अंतिम तीन-चार किलोमीटर विशेष रूप से कठिन हो जाते हैं।

इस समय तक धावक लगभग 38-39 किलोमीटर की दूरी पूरी कर चुके होते हैं। लगातार दौड़ने की थकान और कम ऑक्सीजन के बीच सामान्य दिखने वाली चढ़ाई भी बड़ी चुनौती बन जाती है।
चिराग ने रेस को 4 घंटे 30 मिनट से कम समय में पूरा करने का लक्ष्य रखा था। कठिन ऊँचाई और अंतिम हिस्से की चढ़ाई के बावजूद उन्होंने 4 घंटे 17 मिनट में फिनिश लाइन पार कर अपना लक्ष्य हासिल किया।
सेना, ITBP और स्थानीय लोगों ने बढ़ाया हौसला
चिराग के लिए इस मैराथन की यादें केवल शारीरिक चुनौती तक सीमित नहीं रहीं। रास्ते में मिला सहयोग और उत्साह भी उनके अनुभव का खास हिस्सा रहा।
भारतीय सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और लद्दाख पुलिस के जवानों ने सहायता केंद्रों के संचालन में सहयोग किया और पूरी रेस के दौरान धावकों का उत्साह बढ़ाया। स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में धावकों का हौसला बढ़ाने के लिए रास्ते में मौजूद रहे। कई जगह बच्चे धावकों के साथ कुछ दूरी तक दौड़ते, उन्हें हाई-फाइव देते और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते दिखाई दिए।
आखिरी और सबसे मुश्किल किलोमीटरों में हौसला बढ़ाने वाले ये पल धावकों के लिए खास मायने रखते थे।
लद्दाख के शानदार नजारों के बीच दौड़
रेस का रास्ता जितना कठिन था, उतना ही खूबसूरत भी। लद्दाख के पहाड़ों, सिंधु घाटी, मठों और पारंपरिक बस्तियों के बीच से गुजरते हुए धावकों को ऐसे नजारे देखने को मिले, जो किसी सामान्य शहरी मैराथन से बिल्कुल अलग अनुभव देते हैं।
चिराग के लिए लद्दाख मैराथन पूरी करना केवल शारीरिक फिटनेस की परीक्षा नहीं थी, बल्कि तैयारी, धैर्य और दृढ़ता की भी परीक्षा थी। करीब 20 सप्ताह की ट्रेनिंग, 11 दिन का एक्लिमेटाइजेशन और चार घंटे से अधिक की दौड़ की असली परीक्षा लेह की ओर जाने वाले अंतिम चढ़ाई भरे किलोमीटरों में हुई।

भाई संकेत ने भी दिया साथ
चिराग के इस सफर में उनके भाई संकेत का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। संकेत रेस से पहले के अंतिम 11 दिनों में उनके साथ रहने के लिए हैदराबाद से लेह पहुँचे थे।
स्थानीय व्यवस्थाओं और अन्य जरूरी कामों में संकेत के सहयोग से चिराग अपना पूरा ध्यान एक्लिमेटाइजेशन और रेस की तैयारी पर केंद्रित कर पाए। भाई की मौजूदगी ने रेस से पहले के दिनों को उनके लिए आसान और यादगार बना दिया।
उत्तराखंड की हिमालयी पहाड़ियों में पले-बढ़े चिराग के लिए देश की सबसे अनोखी हाई-एल्टीट्यूड मैराथनों में से एक को पूरा करना एक तरह से पहाड़ों में वापसी भी थी—लेकिन इस बार चुनौती और परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं।
रेस खूबसूरत थी, कठिन थी और कई मौकों पर बेहद चुनौतीपूर्ण भी। लेकिन 42.195 किलोमीटर की दूरी पूरी कर फिनिश लाइन तक पहुँचना और लद्दाख मैराथन का फिनिशर कांस्य पदक हासिल करना चिराग के लिए उन तमाम मुश्किल किलोमीटरों की मेहनत को सार्थक करने वाला क्षण बन गया।
