पहाड़ में कूड़ा निस्तारण एक गंभीर समस्‍या!

भावना मासीवाल

पहाड़ की समस्याओं पर जब भी चर्चा होती है तो उसमें रोजगार और पलायन मुख्य मुद्दा बनकर आता है. यह मुद्दा तो पहाड़ की केंद्रीय समस्याओं की धूरी तो है ही. इसके साथ ही अन्य समस्याएं भी so पहाड़ के जीवन को प्रभावित कर रही है. इनमें एक समस्या है कूड़े का निस्तारण. आप भी सोचेंगे भला रोजगार और पलायन जैसे प्रमुख मुद्दों को छोड़कर कहा एक कूड़े के निस्तारण के मुद्दे पर चर्चा हो रही है. यह विषय देखने में जितना छोटा व गैर जरूरी लगता है. दरअसल उतना है नहीं. कूड़ा निस्तारण की समस्या पूरे विश्व की समस्या है.

पलायन

हमारा देश भारत स्वयं भी प्रति दिन उत्सर्जित लाखों टन कूड़े के निस्तारण की समस्या से जूझ रहा है. हमारे देश में 1.50 लाख मेट्रिक टन कूड़ा प्रतिदिन निकलता है. इसमें से भी कुछ so प्रतिशत कूड़े का ही निस्तारण हो पाता है. शेष कूड़ा महानगरों में शहर के बाहर पहाड़ के रूप में यथावत बना हुआ है.

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हमारा देश भारत स्वयं भी प्रति दिन उत्सर्जित लाखों टन कूड़े के निस्तारण की समस्या से जूझ रहा है. हमारे देश में 1.50 लाख मेट्रिक टन कूड़ा प्रतिदिन निकलता है. इसमें से भी कुछ प्रतिशत so कूड़े का ही निस्तारण हो पाता है. शेष कूड़ा महानगरों में शहर के बाहर पहाड़ के रूप में यथावत बना हुआ है. दिल्ली जैसे महानगर में कूड़े के ढ़ेर ने पहाड़ का आकार ले लिया है. लेकिन उसका पूरी तरह से निस्तारण महानगर भी नहीं कर पाया है. दिल्ली महानगर में जहाँ यह कूड़ा पहाड़ की ऊंचाई छू रहा है तो मुंबई में सागर के तल में एक नया कूड़े का संसार विकसित कर रहा है.

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शहरों, महानगरों से दूर पहाड़ों में भी इस कूड़े के कई पहाड़ देखे जा सकते हैं. यहाँ अंतर इतना ही है कि कूड़े के निस्तारण के लिए कोई व्यवथा उपलब्ध नहीं है. पहाड़ के व्यवस्थित जीवन में कूड़ा बेतरतीब हर कोने में पड़ा देखा जा सकता है. कहीं नालों में तो कहीं गदहरों में, कहीं जंगलों में तो कहीं धारा व नल के पास तो कही पहाड़ के किसी कोने में. कूड़े का यूँ बेतरतीब कहीं भी मिलना पहाड़ में अव्यवस्था का ही रूप है. यही अव्यवस्था पशु-पक्षी, जीव-जन्तु यहाँ तक की मनुष्य तक को हानि पहुँचाती है. इन दिनों पहाड़ में हूँ तो इस अव्यवस्था से जूझ भी रही हूँ.

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पहाड़ के लिए प्लास्टिक अभिशाप से कम नहीं है. क्योंकि एक ओर यह खेती को बर्बाद और बंजर कर रहा है तो दूसरी ओर प्राकृतिक स्रोतों को बंद कर रहा है. आज भी पहाड़ की आधी से अधिक आबादी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है. ऐसे में पहाड़ों में प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग उन्हें नुकसान पहुँचा रहा है.

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मनुष्य की यह स्वभाविक प्रवृति है कि जब तक वह स्वयं नहीं जूझता तब तक उसे व्यवस्था की खामियों से परिचय नहीं होता है. पहाड़ में अधिकतर गैर जरूरी कूड़ा लोगो द्वारा स्वयं ही जला दिया so जाता है. लेकिन इसमें भी सभी तरह का कूड़ा नहीं जलाया जाता है. जिसमें प्लास्टिक सबसे अग्रणी है. प्लास्टिक के निस्तारण की समस्या से तो पूरा देश जूझ रहा है. तभी हमने प्लास्टिक मुक्त भारत का नारा तक दे दिया. लेकिन यह नारा कितना कारगर हुआ है? यह आज भी आम जीवन में इसके बढ़ते प्रयोग और आसपास प्लास्टिक के बढ़ते ढ़ेरों से जाना जा सकता है.

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पहाड़ के लिए प्लास्टिक अभिशाप से कम नहीं है. क्योंकि एक ओर यह खेती को बर्बाद और बंजर कर रहा है तो दूसरी ओर प्राकृतिक स्रोतों को बंद कर रहा है. आज भी पहाड़ की आधी से अधिक so आबादी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है. ऐसे में पहाड़ों में प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग उन्हें नुकसान पहुँचा रहा है.

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‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ कि जिस संकल्पना के साथ यह नारा दिया गया था. वह पहाड़ों में बेमानी है. पहाड़ पर्यटन क्षेत्र होने के कारण भी अपने भीतर अथाह कूड़े का ढ़ेर जमा किए हुए है. so जिसे आप पहाड़ के रास्तों की ओर चढ़ते हुए राह में छोट-छोटे कूड़े के पहाड़ के रूप में देख सकते हैं. यह ढ़ेर भी पहाड़ों के महानगरों का होता है. जहाँ कूड़े के निस्तारण की यह प्रक्रिया उपलब्ध होती है अन्यथा छोटे गाँवों व कस्बों में हर जगह कूड़ा और प्लास्टिक रास्तों व जंगलों में बिखरा हुआ मिल जाएगा.

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पहाड़ में स्वास्थ्य so सेवाएं कितनी कारगर है इससे तो पूरा पहाड़ ही परिचित है. ऐसे में इस अव्यवस्था के चलते बीमारियों को आमन्त्रण देना so कहा तक उचित है? यह प्रश्न पहाड़ में आज भी बना हुआ है. ऐसे में आवश्यक है कि यदि हमें पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ों में कूड़े के निस्तारण का उचित प्रबंध करना होगा.

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पहाड़ की खूबसूरती को कूड़े के निस्तारण की समस्या दिन पर दिन बर्बाद कर रही है. मैं अपने अनुभव के आधार पर कहूँ तो पिछले पाँच महीनों रामनगर से 4-5 घंटे ऊपर सल्ट क्षेत्र के मानिला गाँव में रह रही हूँ. यह गाँव जंगलों से घिरा है. अपनी खूबसूरती में यह नैनीताल और देहरादून से कई अधिक खूबसूरत है लेकिन यहाँ जंगलों से so लेकर बाज़ार तक हर जगह कूड़ा ही कूड़ा है. कहीं पर कूड़ा एकत्र करने व फिर उसके उचित निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है. इस कारण गाँव वालों से लेकर राहगीरों और पर्यटकों तक सारा कूड़ा आसपास के गदहरों, नोहो और नालों में डाल दिया जाता है. एक दो बार कोशिश भी की कि अपना कुछ कूड़ा वापसी में शहर आते समय डस्टबीन में डाल दूँ. दो बार किया भी.

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लेकिन हर बार यह संभव नहीं हो सकता है कि आप कूड़े के निस्तारण के लिए गाँव से शहर की ओर रुख करें. गाँवों में कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था नहीं होने के कारण गदहरे, so नोले सभी कूड़ा निस्तारण  की जगह बना दिए गए हैं. जिसका प्रभाव बरसात में देखने को मिलता है. पहाड़ का यह क्षेत्र पहले ही कई वर्षों से जल संकट से जूझ रहा है और ऐसे में कूड़े का बढ़ता प्रभाव उसके प्राकृतिक स्रोतों को भी सूखा रहा है.

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पहाड़ देखने में हमें खूबसूरत और आकर्षक लगते हैं लेकिन यही पहाड़ अपने भीतर बहुत से दबावों व व्यवस्था की अनीतियों को झेल रहे हैं. जल संकट, भूमि अधिग्रहण, रोजगार, पलायन यह so सभी समस्याएँ आज भी पहाड़ में यथावत बनी हुई है. इनमें जो नई समस्या जुड़ी वह है कूड़ा निस्तारण की समस्या. वर्तमान समय में कूड़ा निस्तारण व उसका उचित प्रबन्धन न होना पहाड़ की समस्याओं में से एक बड़ी समस्या है. यह एक ओर तो पूरे जंगल, खेत, नदी व जल के प्राकृतिक स्रोतों के विकास में अवरोध पैदा करता है तो दूसरी तरफ जीव जंतुओं की मृत्यु का कारण बनता है. वर्षा में यही कूड़ा उचित प्रबंधन के अभाव में बीमारियों को आमन्त्रण देता है.

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पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कारगर so है इससे तो पूरा पहाड़ ही परिचित है. ऐसे में इस अव्यवस्था के चलते बीमारियों को आमन्त्रण देना कहा तक उचित है? यह प्रश्न पहाड़ में आज भी बना हुआ है. ऐसे में आवश्यक है कि यदि हमें पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ों में कूड़े के निस्तारण का उचित प्रबंध करना होगा.

(डॉ. भावना मासीवाल असिस्टेंट प्रोफेसर, राजकीय so स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मानिला (अल्मोड़ा) हैं)

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