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अवसाद पैदा करने वाले इस दौर में अपने बच्चों से बात कीजिये

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अवसाद पैदा करने वाले इस दौर में अपने बच्चों से बात कीजिये
  • कमलेश चंद्र जोशी

देश बहुत गंभीर समस्याओं से गुजर रहा है. कोरोना महामारी की दूसरी लहर क़हर बनकर देश पर टूट पड़ी है जिस वजह से तस्वीर और भयावह होती जा रही है. तमाम दोस्तों से बात करता हूँ तो पता चलता है किसी को नौकरी नहीं मिल रही तो किसी की नौकरी जा चुकी है या फिर सैलरी में कट लग चुका है because और किस दिन नौकरी से निकाल दिये जाएँ इसका भी पता नहीं है. जब वह जमीनी हकीकत बताते हैं तो एक सिहरन सी पैदा होने लगती है. असंगठित क्षेत्र के लघु मध्यम उद्योग व छोटी कंपनियों में से बहुतायत में ताले लग चुके हैं. जमीनी हकीकत अगर सरकारी कागजों में उतर पाती तो समझ आता कि जीडीपी रसातल पर पहुँच चुकी है. रोजगार के जो आंकड़े कागजों पर हैं वो सिर्फ दिखावटी हैं.

जीडीपी रसातल

बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों के उच्चतम शिखर पर है. सर्विस सेक्टर की बात करूँ तो तमाम प्राइवेट कंपनियों ने पिछले साल ही मार्च-अप्रैल माह में अपने कर्मचारियों से मेल में यह लिखवा लिया था कि हम because कोरोना महामारी के कारण बिना तनख्वाह के, स्थिति के सुधर जाने तक, छुट्टी ले रहे हैं. यह मेल कंपनियों द्वारा इसलिए भी लिखवाया गया ताकि कल की तारीख में कंपनी पर यह बात न आए कि उन्होंने बिना तनख्वाह के कर्मचारियों को नौकरी से कैसे निकाल दिया? ये तमाम कर्मचारी जो बिना वेतन अनिश्चितकालीन छुट्टी पर हैं नहीं जानते कि इनकी नौकरी बची भी है या नहीं.

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वैसे भी जिन्हें साल भर से बिना तनख्वाह के घर बैठा दिया गया हो उनकी नौकरी सिर्फ कागज में ही है असल में तो वह जा ही चुकी है. कुछ कंपनियों ने शीर्ष के कुछ कर्मचारियों को 50% या 30% सैलरी पर सिर्फ इसलिए रखा हुआ है ताकि कल जब थोड़ा भी स्थिति ठीक हो तो कंपनी को सँभालने और नए सिरे से काम शुरू करने वाले कुछ वफादार so और अनुभवी लोग साथ बने रहें. दिल्ली में पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाली तमाम कंपनियों ने लॉकडाउन के कुछ ही दिनों बाद अधिकतर कर्मचारियों को घर बैठने का फरमान जारी कर दिया था. पिछले एक साल में पहले कर्मचारियों की तनख्वाह कम की गई फिर काम ठप पड़ जाने की स्थिति में धीरे-धीरे कर्मचारियों को सीधा निकालने की जगह अनिश्चित काल के लिए बिना तनख्वाह के घर बैठने को कह दिया गया.

जीडीपी रसातल

पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारी सरकार की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं लेकिन पिछले एक साल में पर्यटन जैसे बड़े सेक्टर को डूबने से बचाने के because लिए सरकार ने किसी भी तरह के आर्थिक पैकेज की घोषणा नहीं की है.

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पिछले ही साल दिल्ली की एक बड़ी पर्यटन कंपनी ने 50% सैलरी पर काम कर रहे अपने बचे हुए चुनिंदा कर्मचारियों को आदेश दिया कि वह स्वयं से अपने एक महीने की सैलरी कंपनी के हित में सरेंडर करें और बाकायदा एक मेल भी लिखें कि कंपनी के बिगड़ते आर्थिक हालात को देखते हुए वह अपनी सैलरी कंपनी के हित में because सरेंडर कर रहे हैं. आज की तारीख में सूरत-ए-हाल यह है कि वह कंपनी अपने बचे हुए कर्मचारियों को ‘लीव विदआउट पे’ के साथ अनिश्चितकालीन छुट्टी पर भेजने की तैयारी कर रही है. पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारी सरकार की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं लेकिन पिछले एक साल में पर्यटन जैसे बड़े सेक्टर को डूबने से बचाने के लिए सरकार ने किसी भी तरह के आर्थिक पैकेज की घोषणा नहीं की है.

जीडीपी रसातल

अपने बच्चों, रिश्तेदारों, दोस्तों व आस-पड़ोसियों से बात कीजियेगा. वो अंदर ही अंदर टूटते जा रहे हैं. उन्हें आपके मॉरल सपोर्ट की जरूरत है. उन्हें हौसला दीजिये की इस स्थिति में because हिम्मत नहीं हारनी है. उनमें लड़ने का एक जज्बा पैदा कीजिये. अपनी इच्छाओं का बोझ अपने बच्चों पर डालने से बचिये. उन्हें अधिक से अधिक समय दीजिये और उनके मन की बात को सुनिये.

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पर्यटन के क्षेत्र में टूर गाइडिंग का काम करने वाले हों या फिर ट्रान्सपोर्ट में ड्राइविंग की नौकरी करने वाले पिछले एक साल से खाली बैठे हैं. होटलों व रेस्टोरेन्ट में काम करने वाले कर्मचारियों को भी बहुतायत नौकरी से निकाला जा चुका है या फिर अनिश्चितकालीन छुट्टी पर भेज दिया गया है. उत्तराखंड वापस आए अधिकतर युवाओं because में वहीं लोग शामिल हैं जो होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर के दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में होटलों व रेस्टोरेंट में नौकरी करते थे. कोरोना की स्थिति दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है और इसके साथ ही युवाओं की बेरोजगारी का आँकड़ा भी बढ़ता जा रहा है. जमीनी हकीकत बहुत ही भयावह है जो सरकारी फाइलों में नजर नहीं आती. इस हकीकत को बयॉं करते हुए कभी अदम गोंडवी ने लिखा था:

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“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है”

बढ़ती बेरोजगारी के साथ युवाओं में टेंशन व अवसाद भी बढ़ने लगा है. जिनको नौकरी नहीं मिल रही वो तो परेशान हैं ही लेकिन जिनकी नौकरी चली गई है या नौकरी पर तलवार लटकी because हुई है वो और अधिक परेशान हैं. कोई ईएमआई के बोझ तले दबा हुआ है तो कोई बैंक का लोन न चुका पाने के कारण परेशान है. अपने दैनिक खर्चे चलाने के लिए लोगों को भविष्य के लिए संजोया गया अपना पीएफ निकालना पड़ रहा है. 3-4 साल से लगातार सरकारी नौकरी की तलाश में की जा रही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र वर्षों से वैकेंसी निकलने का इंतजार कर रहे हैं और जिन्होंने परीक्षा दी भी है तो वो अपने रिजल्ट का इंतजार कर रहे हैं. जिनका रिजल्ट आ चुका है तो वह जॉइनिंग लेटर की बाट जोह रहे हैं.

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सभी सांकेतिक फोटो पिक्‍सल.कॉम से साभार

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग का हाल तो इतना बुरा है कि 2016 के बाद से राज्य में पीसीएस की परीक्षा ही नहीं हुई है. एक पीआईएल की सुनवाई में हाईकोर्ट ने इसके बावत because राज्य सरकार से जवाब भी तलब किया है. हाल ही में छात्रों द्वारा चलाए गए हैशटैग व डिसलाइक मूवमेंट ने जरूर केंद्र सरकार की नींद हराम की थी लेकिन रोज़गार के मुद्दे पर सरकार ने गेंद बेरोजगारों के पाले में ही डाल दी है और स्वरोज़गार का झुनझुना पकड़ा दिया है. ऊपर से जो करोड़ों सैलरी क्लास लोग नौकरी खो चुके हैं उनके लिए सरकार की तरफ से अब तक कोई पहल नहीं की गई है ना ही देश की मुख्य धारा का मीडिया इस तरह के मुद्दों में दिलचस्पी ले रहा है जिस वजह से युवाओं में रोष व अवसाद बढ़ता जा रहा है.

जीडीपी रसातल

इस सब से ऊपर महामारी because के इस संकट के दौरान अपने बच्चों से खूब बात कीजिये उन्हें प्यार दीजिये और आपकी जिंदगी में उनकी अहमियत समझाइये ताकि बच्चे कोई भी गलत कदम उठाने से पहले सौ दफा आपके और परिवार के बारे में सोचें और ज़िंदगी जीने की अहमियत को समझें.

जीडीपी रसातल

सियासत का प्रोपेगैंडा चला रहे पिट्ठू न्यूज चैनलों से फुर्सत मिल जाए तो नौकरी की तलाश कर रहे या नौकरी खो चुके अपने बच्चों, रिश्तेदारों, दोस्तों व आस-पड़ोसियों से बात कीजियेगा. because वो अंदर ही अंदर टूटते जा रहे हैं. उन्हें आपके मॉरल सपोर्ट की जरूरत है. उन्हें हौसला दीजिये की इस स्थिति में हिम्मत नहीं हारनी है. उनमें लड़ने का एक जज्बा पैदा कीजिये. अपनी इच्छाओं का बोझ अपने बच्चों पर डालने से बचिये. उन्हें अधिक से अधिक समय दीजिये और उनके मन की बात को सुनिये.

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हादसे हो जाने के बाद सिर्फ पछतावा और बातें रह जाती हैं. इस तरह की स्थिति पैदा न हो इस बात का ख़्याल रखिये. अपने बच्चों के लिए आवाज उठाइये. उनके द्वारा नौकरी माँगने के because लिए उठाई जा रही आवाज का हिस्सा बनकर सोई हुई सरकारों को जगाने की कोशिश कीजिये. इस सब से ऊपर महामारी के इस संकट के दौरान अपने बच्चों से खूब बात कीजिये उन्हें प्यार दीजिये और आपकी जिंदगी में उनकी अहमियत समझाइये ताकि बच्चे कोई भी गलत कदम उठाने से पहले सौ दफा आपके और परिवार के बारे में सोचें और ज़िंदगी जीने की अहमियत को समझें.

(लेखक एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में शोधार्थी है)

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