Tag: ललित फुलारा

विश्व पुस्तक मेला: आंखों देखी, हकीकत और अफसाना… 

विश्व पुस्तक मेला: आंखों देखी, हकीकत और अफसाना… 

दिल्ली-एनसीआर
ललित फुलारा इस बार विश्व पुस्तक मेले में सबसे अधिक धार्मिक साहित्य बिका है, चाहे कोई प्रकाशक कुछ भी दावा कर ले. हिन्दी का बड़े से बड़ा प्रकाशक, उतनी भीड़ नहीं जुटा पाया, जितना बिना प्रचार के गीता प्रेस गोरखपुर की स्टॉल पर जुटी रही. नई हिन्दी के नाम पर 'हिंद युग्म' ने सेलिब्रिटी लेखकों को बुलाकर युवाओं को लुभाने की अच्छी कोशिश की, पर यह बात सही है कि इस प्रकाशक के पास नॉन-सीरियस  पाठकों की ही भीड़ रही, चाहे भौकाल कुछ भी हो. प्रबुद्ध लेखकों के कदम उधर एक बार भी नहीं पड़े. हिन्दी के नाम पर अभिनेता मानव कौल को घंटों बैठाकर युवाओं के बीच कुछ प्रतियां तो बेची जा सकती हैं, पर हिन्दी के परिपक्व पाठकों के बीच वो विश्वसनीयता हासिल नहीं की जा सकती जो राजकमल, वाणी, पेंगुइन, प्रभात, यश, सेतु एवं कुछ अन्य प्रकाशकों के पास है. बुक फेयर में कुछ ऐसे लेखकों के पास कॉलेज के विद्यार्थियों की भीड़ रही, जि...
घासी, रवीश कुमार, और लिट्टी-चौखा

घासी, रवीश कुमार, और लिट्टी-चौखा

साहित्यिक-हलचल
ललित फुलारा एक बार मैं घासी के साथ रिक्शे पर बैठकर जा रहा था. हम दोनों एक मुद्दे को लपकते और दूसरे को छोड़ते हुए बातचीत में मग्न थे. तभी पता नहीं उसे क्या हुआ? नाक की तरफ आती हुई becauseअपनी भेंगी आंख से मेरी ओर देखते हुए बोला 'गुरुजी कॉलेज भी खत्म होने वाला है.. जेब पाई-पाई को मोहताज है.. खर्च बढ़ता जा रहा है.. घर वालों की रेल बनी हुई है.. नौकरी की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही. भविष्य का क्या होगा पता नहीं!' घासी चेले के भविष्य की जरा-सी भी चिंता नहीं है आपको. जब देखों चर्चाओं का रस लेते रहते हो.' उसके मुंह से यह बात सुनकर मुझे बेहद शर्मिंदगी हुई. रिक्शे में एक butऔर व्यक्ति बैठे थे. जब हम तीनों एक साथ उतरे उन्होंने घासी से कुछ कहना चाहा पर उसने उनको अनदेखा कर दिया. मेरे हाथ से बटुआ लिया.. तीस रुपये निकालकर रिक्शे वाले को थमाए और आगे बढ़ गया. घासी उसकी बात एकदम सही...