Tag: बालसाहित्य

हरिद्वार में जुटे देश के 12 राज्यों के 112 साहित्यकार

हरिद्वार में जुटे देश के 12 राज्यों के 112 साहित्यकार

अल्‍मोड़ा
हरिद्वार में राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी संपन्न, बालसाहित्य के विभिन्न पक्षों पर हुई चर्चा अल्मोड़ा. बच्चों को उपदेश देने के बजाय हम बड़े लोगों को उनके सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए. ये बात कहीं लालढांग, हरिद्वार में बालप्रहरी, बालसाहित्य संस्थान अल्मोड़ा तथा नेताजी सुभाषचंद्र बोस आवासीय छात्रावास लालढांग द्वारा 8 जून से आयोजित राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. हेमचंद्र पांडे,कुलपति हेमवतीनंदन बहुगुणा चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय देहरादून ने . उन्होंने कहा कि बच्चे तभी हमारा अनुकरण करेंगे. जब हम उपदेश के बजाय स्वयं अपने आचरण में उन बातों को  लाएंगे. 10 जून को संपन्न समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ बालसाहित्यकार सिंघानिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.रामनिवास मानव ने कहा कि बच्चों के लिए लिखते समय हमें बच्चों के मनोविज्ञान को समझते...
पशु पक्षियां और परी कथा से लेकर विज्ञान की कहानियों का सफर 

पशु पक्षियां और परी कथा से लेकर विज्ञान की कहानियों का सफर 

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी बालसाहित्य का इतिहास उदय किरौला संपादक, बालप्रहरी   2500 वर्ष पूर्व राजा अमर कीर्ति ने पंडित विष्णुदत्त शर्मा नामक विद्वान को अपने बेटों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी. उसके चार पुत्र थे. उनका मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था. पंडित विष्णुदत्त शर्मा ने जीव-जंतुओं को अपनी कहानी का पात्र बनाकर चारों राजकुमारों को नैतिक एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया. ये कहानियां उस दौर में मौखिक सुनाई गई. बाद में ‘हितोपदेश’ नाम से ये कहानियां संस्कृत साहित्य में प्रकाशित हुई. वर्तमान में पंचतंत्र की कहानी के नाम से ये कहानियां हिंदी साहित्य में प्रचलन में हैं. पंचतंत्र की कहानियां के अतिरिक्त ईसप की कहानियां भी बालसाहित्य की प्रसिद्ध कहानियां मानी जाती हैं. ईसप यूनान का रहने वाला एक गुलाम था. वह पशु-पक्षियों पर आधारित कहानियां सुनाता था. यूनान के विद्वान वेव्रियर्स  ने ईसप की कहानियां का...
’बालसाहित्य और सामाजिक सरोकार’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

’बालसाहित्य और सामाजिक सरोकार’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

देहरादून
दिनेश रावत हरिद्वार. अल्मोड़ा से प्रकाशित बच्चों की पत्रिका बालप्रहरी, बाल साहित्य संस्थान अल्मोड़ा द्वारा राजकीय बालिका इंटर कालेज ज्वालापुर, हरिद्वार में ‘बालसाहित्य और सामाजिक सरोकार’ विषय पर जन सहयोग से आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के डॉ. प्रकाश पंत ने कहा कि एक दौर में बच्चे दादा-दादी,व नाना-नानी की कहानियां सुनकर खुश होते थे. ये कहानियां मनोरंजन के साथ ही बच्चों में संस्कार भी जाग्रत करती थीं. संयुक्त परिवारों के विघटन के बाद आज बच्चों को माता- पिता व दादा-दादी से प्राकृतिक प्यार नहीं मिल रहा है. मोबाइल फोन की बढ़ती संस्कृति से बच्चे अब वीडियो गेम में मार-काट व हिंसक खेल सीख रहे हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए ऐसा साहित्य लिखा जाना चाहिए जो उन्हें मानवीय मूल्यों व सामाजिक सरोकारों से जोड़े. दून विश्वविद्यालय देहरादून के डॉ. हरीशच...