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पहाड़ का वह इंत्यान 

पहाड़ का वह इंत्यान 

संस्मरण
हम याद करते हैं पहाड़ को… या हमारे भीतर बसा पहाड़ हमें पुकारता है बार-बार? नराई दोनों को लगती है न! तो मुझे भी जब तब ‘समझता’ है पहाड़ … बाटुइ लगाता है…. और फिर अनेक असम्बद्ध से दृश्य-बिम्ब उभरने लगते हैं आँखों में… उन्हीं बिम्बों में बचपन को खोजती मैं फिर-फिर पहुँच जाती हूँ अपने पहाड़… रेखा उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. प्रस्तुत है रेखा उप्रेती द्वारा लिखित ‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़ की 9वीं सीरीज… ‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—9 रेखा उप्रेती परीक्षाएँ तो हमने भी बहुत दीं, पर तब न नंबरों का पारा ऐसे चढ़ता था, न माँ-बाप हमें सूली पर चढ़ाकर रखते थे. हमारे बाबूजी ने एक कंडीशन ज़रूर रखी हुई थी कि जो फेल होगा उसे आगे नहीं पढ़ाएँगे. इस विषय में बाबूजी कितने गंभीर थे मालूम नहीं क्योंकि किसी भाई-बहन ने कभी फ़ेल होने की...