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संस्मरण

गोधनी ईजा छाँ कसि फाने: घूर..घवां..

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—35 प्रकाश उप्रेती यह हमारे जीवन का वो किस्सा है, जो हर तीसरे और चौथे दिन घटता ही था. इसकी स्मृतियाँ कभी धुँधली नहीं होती बल्कि चित्र बन आँखों में तैरने लगती हैं. वो स्मृतियाँ हैं -‘ईजा’ (माँ) के ‘छाँ  फ़ानने’ की. मतलब कि छाँछ बनाने की.