Tag: कैनवास

दादी के कैनवास से शुरू हुई पेटिंग की शुरुआत…

दादी के कैनवास से शुरू हुई पेटिंग की शुरुआत…

उत्तरकाशी
आशिता डोभाल उत्तराखंड देवभूमि ऋषिमुनियों की तपस्थली होने के साथ साथ मां गंगा-यमुना का उद्गम स्थल ही नही बल्कि कुछ ऐसे साधकों की जन्मभूमि और कर्मभूमि भी है जो आज इक्कसवीं सदी में भी अपनी थाती माटी प्रेम से ओत प्रोत होकर सिर्फ यहां को संस्कृति और कला को देश दुनिया में पहचान दिला रहे हैं, उन साधकों में एक नाम है मुकुल बडोनी, जो मूल रूप से कांदला बड़ेथी चिन्यालीसौड़ के एक साधारण परिवार में जन्मे हैं, जिनके पिता एक निजी स्कूल में प्रधानाचार्य हैं और माताजी कुशल गृहणी. विद्यार्थी जीवन में अव्वल रहने वाला मुकुल हमेशा अध्यापकों के चहेते विद्यार्थियों में रहता था. स्नातकोत्तर चित्रकला से करने के बाद बीएड किया व तत्पश्चात पिट्स बीएड कॉलेज उत्तरकाशी में चित्रकला प्रशिक्षक के रूप में तैनात हैं. मुकुल बताते हैं कि अपनी थाती और माटी से जो उन्हे लगाव हुआ उसमे उनके परिवार का विशेष सहयोग रहा. घर ...
कला के प्रति संवेदनशीलता ही मनुष्यता को बचाएगी: जगमोहन बंगाणी

कला के प्रति संवेदनशीलता ही मनुष्यता को बचाएगी: जगमोहन बंगाणी

कला-रंगमंच, देहरादून
मनोहर चमोली ‘मनु’ जगमोहन बंगाणी की कूची से बनी पेंटिंग्स भारत से बाहर स्पेन, कोरिया, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों में उपस्थित हैं. कला के पारखी समूची दुनिया में हैं और वे अपने घरों-कार्यालयों में रचनात्मकता को भरपूर स्थान देते हैं. बंगाणी मानते हैं कि कला because आपके अपने अनुभव से आत्म-साक्षात्कार कराती है. वह स्वयं को जानने का एक असरदार साधन होती है. कला मन के भीतर चल रहे विचारों का प्रतिबिंब होती है. आप उसे बिना कहे हजारों शब्द दे सकते हैं. ज्योतिष कला के क्षेत्र में बंगाणी एक ऐसे चित्रकार हैं जो अभिनव प्रयोग के लिए जाने जाते हैं. लीक से हटकर अलहदा पेंटिग के लिए वह जाने जाते हैं. भारत के उन चुनिंदा चित्रकारों में वह एक हैं जो नए प्रयोग और दृष्टि के लिए प्रसिद्ध हैं. बंगाणी अब दिल्ली में रहते हैं. अलबत्ता उनकी जड़ें उत्तराखण्ड के मोण्डा, बंगाण से जुड़ी हुई हैं. हिमाचल because की संस्...
अंतरावलोकन

अंतरावलोकन

संस्मरण
संस्मरण : स्कूल की यादें सुनीता अग्रवाल आप चाहे उम्र के जिस पड़ाव पर खड़े हो इनसे आपका संवाद किसी न किसी रूप में चलता रहता है. आज अपने मन की भीतरी तहों तक जाकर अपने उन  संवादों को शब्द देने की कोशिश कर रही हूं जिनकी यादें आवाज़ें बनकर बड़ी ही स्पष्टता से साधिकार मेरे मनमस्तिष्क में चहल कदमी करती रही है. ईमानदारी किसी भी बात को कहने की पहली शर्त होती है अब उसका जो भी अर्थ निकले वो पढ़ने वाले की संवेदना पर निर्भर करता है. स्कूल के उस सुरम्य प्रांगण में प्रवेश करते हुए बड़ी ही सहजता से अपना बोला हुआ एक झूठ याद आ रहा है जिसकी टीस मुझे काफी वक़्त तक सालती रही थी आज उसी अहसास को आप सबसे सांझा कर रही हूँ. किस्सा है क्लास 9वीं के लाइब्रेरी रूम का.... जहां हमको छुट्टी के बाद फिजिकल एजुकेशन की एक्स्ट्रा क्लास के लिए रुकना था. उस वक़्त फिजिकल एजुकेशन  की एक्स्ट्रा क्लास को लेकर मेरे साथ साथ कई और ...