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हिंदी पत्रकारिता का काल, कंकाल और महाकाल

हिंदी पत्रकारिता का काल, कंकाल और महाकाल

समसामयिक
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष प्रकाश उप्रेती हिन्दी पत्रकारिता का सफर कई उतार-चढाव से होकर गुजरा है. उसका कोई स्वर्ण काल जैसा नहीं रहा है और होना भी नहीं चाहिए लेकिन पत्रकारिता का भक्तिकाल शाश्वत सत्य है. वह लगभग इन 200 वर्षों की यात्रा में नजर आता है.मासिक, साप्ताहिक और दैनिक से लेकर 24x7 तक सफर कई तरह की विषम परिस्थितियों से गुजरा है. because बंगाल गज़ट से उदंत मार्तण्ड, सरस्वती, आज,  नई दुनिया, हिंदुस्तान से लेकर जनसत्ता तक प्रिंट मीडिया का सफर रहा तो वहीं दूरदर्शन से लेकर आजतक और फिर 24x7 तक इलोक्ट्रोनिक मीडिया ने अपनी यात्रा तय की. इस यात्रा के दौरान पत्रकारिता ने एक तरफ जहाँ ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होकर जनपक्षधरता दिखाई तो वहीं  मीडिया ने आजादी के आंदोलन में  भी महत्वपूर्ण  भूमिका निभाई. लेकिन आजाद भारत में सरकार ने आपातकाल घोषणा के साथ ही पत्रकारिता का गला भी घोंट डाला. स...