Tag: इस्कूल

खाँकर खाने चलें…!!

खाँकर खाने चलें…!!

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—11 रेखा उप्रेती शुरू जाड़ों के दिन थे वे. बर्फ अभी दूर-दूर पहाड़ियों में भी गिरी नहीं थी, पर हवा में बहती सिहरन हमें छू कर बता गयी थी कि खाँकर जम गया होगा… इस्कूल की आधी छुट्टी में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाले सीनियर्स ने प्रस्ताव रखा “हिटो, खाँकर खाने चलते हैं…” तो आठ-दस बच्चों की टोली चल पड़ी खाँकर की तलाश में… इस्कूल हमारा पहाड़ के सबसे ऊँचे शिखर पर था और खाँकर मिलता था एकदम नीचे तलहटी पर बहते गधेरे में… वह भी देवदार के घने झुरमुट की उस छाँव के तले, जहाँ सूरज की किरणों का प्रवेश जाड़ों में तो निषिद्ध ही होता… अपनी पहाड़ी से कूदते-फाँदते नीचे उतर आए हम….उसके लिए हमें बनी-बनाई पगडंडियों की भी ज़रुरत नहीं थी. सीढ़ीदार खेतों से ‘फाव मारकर’ हम धड़धड़ाते हुए उतर आते थे. गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी पहले ही छोड़ दी, कोई देख ले तो खाँकर का ख़्वाब धरा रह जाए…… तलहटी पहुँचक...
सूखे नहॉ बिन जीवन सूखा

सूखे नहॉ बिन जीवन सूखा

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—12 प्रकाश उप्रेती हम इसे 'नहॉ' बोलते हैं. गाँव में आई नई- नवेली दुल्हन को भी सबसे पहले नहॉ ही दिखाया जाता था. शादी में भी लड़की को नहॉ से पानी लाने के लिए एक गगरी जरूर मिलती थी. अपना नहॉ पत्थर और मिट्टी से बना होता था. एक तरह से जमीन के अंदर से निकलने वाले पानी के स्टोरेज का अड्डा था. इसमें अंदर-अंदर पानी आता रहता था. हम इसको 'शिर फूटना' भी कहते थे. मतलब जमीन के अंदर से पानी का बाहर निकलना. नहॉ को थोड़ा गहरा और नीचे से साफ कर दिया जाता था ताकि पानी इकट्ठा हो सके और मिट्टी भी हट जाए. कुछ गाँव में नहॉ के अंदर चारों ओर सीढ़ीनुमा आकार दे दिया जाता था. यह सब गाँव की आबादी और खपत पर निर्भर करता था. हमारा नहॉ घर से तकरीबन एक किलोमीटर नीचे 'गधेरे' में है. सुबह- शाम नहॉ से पानी लाना बच्चों का नित कर्म था. बारिश हो या तूफान नहॉ से पानी लाना ही होता था. इस...