November 27, 2020
उत्तराखंड समाज/संस्कृति हिमालयी राज्य

‘रवाँई यात्रा- भाग -1’

प्रकृति, पहाड़, घाटी, यमुना नदी के मनोरम दृश्यों को निहारते हुए यमुना पुल पार कर माछ भात खाने रुके, यहां पर एक बंगाली परिवार है जिसका माछ भात का स्वाद आज उस दिशा में सफर करने वाले यात्रियों की पहली पसंद बना हुआ है

  • भार्गव चंदोला

28, 29, 30 दिसंबर, 2019 को उत्तरकाशी जनपद की रवांई घाटी के नौगांव में तृतीय रवाँई लोक महोत्सव का आयोजन हुआ। पिछले वर्ष इस महोत्सव के साक्षी रहने के कारण इस वर्ष भी महोत्सव में बने रहने के लिए मैं काफी उत्सुक था। आयोजक मंडल की तरफ से आमंत्रण तो था ही मगर जाने वाले साथी कौन—कौन होंगे निश्चित न हो पाया था, अंततः पत्रकार साथी Dinesh Kandwal, Manoj Istwal जी के संग 28 की सुबह जाने का तय हुआ, रात को ही साथी दिनेश कंडवाल जी ने उनकी सास के अस्वस्थ होने के चलते जाने में असमर्थता जता दी। अब लगभग जाना रद्द था मगर मैं मन बना चुका था। सुबह—सुबह पत्रकार साथी मनोज इष्टवाल जी से बात हुई और मैंने तैयार रहने को कहा, ठीक 9 बजे मैंने उन्हें उनके आवास माजरीमाफी से साथ लिया और अपनी यात्रा आगे बढ़ गई। गाड़ी से ही चलते हुए मनोज भाई ने अपनी परिचित महिला साथी Nimmi Kukreti Rashtrawadi की लोकेशन जानी तो वो रिस्पना पुल पर इंतजार कर रहीं थी उनको साथ लेने के बाद अब हम तीन साथी हो गए थे दो सीट हमारे पास अब भी खाली थी तो मनोज भाई ने अपनी दो और महिला साथी Indu NegiKusum Kandwal जी को तैयार रहने को फ़ोन किया। इसके दो मकसद थे एक तो तेल पानी का व्यय बंट जायेगा, दूसरा यात्रा को उबाऊमुक्त रखना।

मनोज भाई व निम्मी के पास ज्यादा तर्क नहीं थे सिवाय कांग्रेस वामपंथियों व मुसलमानों को कोसने के। अचानक वो सज्जन उठे और नेहरू को गर्याने लगे नेहरू ही नहीं, महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और बोलते—बोलते उत्तेजित होने लगे मुझे लगा उन महोदय का इतना उत्तेजित होना ठीक नहीं है।

वैचारिक रूप से दक्षिणपंथी होने के चलते एक और दक्षिणपंथी निम्मी के बैठने के बाद मनोज भाई अति प्रशन्न हुए, निम्मी ने बैठते ही हिंदु-मुसलमान टॉपिक छेड़ दिया अब मुझे अहसास होने लगा सफ़र कितना भारी पढ़ने वाला है, हम घंटाघर चकरौता रोड़ होते हुए बल्लुपुर कुसुम कंडवाल के घर पहुंचे जो अब तक तैयारी ही कर रहीं थी। उनके घर के आंगन में हम धूप में बैठकर देश के हालात, नोटबंदी, जीएसटी, सीएए, एनपीआर, एनआरसी, महंगाई, बेरोजगार, महिला उत्पीड़न आदि पर वार्ता करने लगे, वहीं एक पुरुष हमारे वार्तालाप को सुनकर हमारे पास आ गए और मुझे मुखातिब होकर बोले हां बोलते रहिये मैं आप लोगों की वार्ता सुन रहा हूं हमने अपनी बात आगे शुरू कर दी। मनोज भाई व निम्मी के पास ज्यादा तर्क नहीं थे सिवाय कांग्रेस वामपंथियों व मुसलमानों को कोसने के। अचानक वो सज्जन उठे और नेहरू को गर्याने लगे नेहरू ही नहीं, महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और बोलते—बोलते उत्तेजित होने लगे मुझे लगा उन महोदय का इतना उत्तेजित होना ठीक नहीं है। पता लगा हृदयघात हो गया, तो यात्रा भी खटाई में पड़ जाएगी। मैंने चर्चा को विराम दिया मगर वो न रुके मानों वो नेहरू गांधी के अंगरक्षक रहे हों जिन्होंने उनकी भली बुरी अपनी आंखों से देखी हो।

यमुना वैली पब्लिक स्कूल के बच्चों ने पाॅलीथिन से मुक्ति पर आधारित नाटक का मंचन किया। आयोजनकर्ताओं का उद्देश्य है कि वे रवांई लोक महोत्सव में छेत्र की संस्कृति को संरक्षित करवा सकें, आधुनिक जीवनशैली के साथ पारंपरिक जीवनशैली के तार जोड़ सकें।

अक्सर अंधभक्त नेहरू गांधी इंदिरा के चरित्र को लेकर ऐसे ही दावे करते हैं जैसे वो कर रहे थे, उनकी उत्तेजना का आभास घर के अंदर तक पहुंच चुकी थी अचानक कुसुम जी बाहर आईं और उन्होंने आवाज लगाई राजेश अब मानों समुद्र में उठ रहे ज्वार भाटा अचानक बिजली जाने की तरह सुन्न हो गए। उनकी फिर आवाज आई राजेश आप वहां क्या कर रहे हैं, इधर आ जाइये। राजेश जी ने बेहद सौम्य होकर कहा कुछ नहीं बस ऐसे ही और दूसरी तरफ चले गए। आर्मी से सेवानिवृत्त राजेश जी कुसुम जी के जीवनसाथी हैं ये मुझे तब तक आभाष हो चुका था।
मैं व मनोज भाई गेट खोलकर बाहर सड़क की तरफ आ गए समय बीता जा रहा था इंदु जी व कुसुम जी अब तक 12 बजा चुके थे हमारे तीन घंटे वहीं बर्बाद हो गए, ठीक 12 बजे हमने अपनी यात्रा आगे शुरू की। मनोज भाई के सिवा निम्मी, इंदु व कुसुम तीनों मेरे लिए अपरिचित थी, मैं चारों के वार्तालाप को सुनकर चुपचाप गाड़ी ड्राइव करते हुए आगे चलता रहा।

यमुना वैली पब्लिक स्कूल के बच्चों ने पाॅलीथिन से मुक्ति पर आधारित नाटक का मंचन किया। आयोजनकर्ताओं का उद्देश्य है कि वे रवांई लोक महोत्सव में छेत्र की संस्कृति को संरक्षित करवा सकें, आधुनिक जीवनशैली के साथ पारंपरिक जीवनशैली के तार जोड़ सकें।

विकासनगर में पैट्रॉल पंप पर मैंने गाड़ी रोकी व तेल भरवाने के बाद आगे सफ़र जारी रखा। अब तक मुझे अहसास हो गया था गाड़ी में मेरे साथ दो भाजपाई व दो कांग्रेसी समर्थक हैं अब ड्राइव करते हुए वार्तालाप में मैं भी शामिल होने लगा तीनों महिला साथी मनोज भाई के साथ पूर्व में भी कई यात्राएं कर चुके हैं इसलिए वो मनोज भाई के साथ खूब मनोरंजक खिंचाई करते रहे। मनोज भाई मेरी खिंचाई व मैं मनोज भाई की खूब खिंचाई, हंसी मजाक करते हुए, प्रकृति, पहाड़, घाटी, यमुना नदी के मनोरम दृश्यों को निहारते हुए यमुना पुल पार कर माछ भात खाने रुके, यहां पर एक बंगाली परिवार है जिसका माछ भात का स्वाद आज उस दिशा में सफर करने वाले यात्रियों की पहली पसंद बना हुआ है माछ भात का स्वाद लेने के बाद हमने अपना सफर यमुना ब्रिज से आगे शुरू किया। रास्ते भर में चर्चा करते हुए हम ठीक 4 बजे नौगंव बाजार में पहुंचे, गाड़ी पार्क करने के बाद सड़क के ऊपर हम रवांई महोत्सव स्थल पर पहुंचे, जहां आयोजक टीम के साथी Shashi Mohan Ranwalta, Prem Pancholi, Pradeep Rawat, Naresh Nautiyal, Ashi Dobhal Semwal आदि साथियों ने गर्मजोशी के साथ सभी साथियों का स्वागत किया। आज का कार्यक्रम लगभग समाप्ति की ओर था, पिछले वर्ष की तुलना में इस बार टैंट आदि काफ़ी व्यवस्थित था। ये सब टीम महोत्सव की मेहनत व लगन का परिणाम था, अपने तीन साल के सफर में रवांई लोक महोत्सव ने अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। ये वहां मौजूद दर्शकों की उपस्थिति से स्पष्ट समझा जा सकता था, आज रवांई महोत्सव राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना चुका है।

दुनियां जहांन में घूमने के बाद भी मनोज भाई आज भी कुछ मामलों में बेहद संकीर्ण नजर आते हैं उन्होंने उनके यहां चाय पानी तक ये कहते हुए नहीं पिया कि वो अशुद्ध हो रखे हैं लिहाज़ा उनके लिए शशि के घर पर अलग से भोजन बनवाना पड़ा

आज का दिन स्कूली बच्चों के नाम रहा जहां स्कूली बच्चे ने रवांई की लोक संस्कृति को बचाये रखने में अपने हिस्से की भागीदारी की। बच्चों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां दी। जागृति पब्लिक स्कूल के बच्चों ने रवांई लोक संस्कृति को जीवंत करने वाली प्रस्तुति दी। स्कूल की नन्हीं नन्हीं बालिकाओं ने रवांई के पारंपरिक परिधानों में अपनी प्रस्तुतियां दी। यमुना वैली पब्लिक स्कूल के बच्चों ने पाॅलीथिन से मुक्ति पर आधारित नाटक का मंचन किया। आयोजनकर्ताओं का उद्देश्य है कि वे रवांई लोक महोत्सव में छेत्र की संस्कृति को संरक्षित करवा सकें, आधुनिक जीवनशैली के साथ पारंपरिक जीवनशैली के तार जोड़ सकें। रवांई के उभरते लोकगायकों कलाकारों कवियों नाट्य मंडलियों नृत्य को पहचान दिलवा सकें, जिसमें आयोजनकर्ताओं को सफलता मिलते हुए देखा जा सकता है।

आज के कार्यक्रम के समापन के बाद सभी साथियों संग मुलाकात के बाद हम सभी शशिमोहन रवांल्टा के निवास में उनकी जीवनसाथी सीमा रावत के हाथों की चाय पीने पहुंचे। उनके घर के आंगन में पहुंचे तो नदी पार सामने जंगल धूं—धूं कर जलता दिखाई दिया। मैंने वहीं से उसका वीडियो बनाया व उत्तरकाशी डीएम आशीष चौहान जी को व्हाट्सअप करते हुए मीडिया व सोशियल मीडिया के माध्यम से आग पर काबू करने का आग्रह किया!

शशि व उनकी भाभी विजया लक्ष्मी रावत जी ने जितने स्नेह के साथ सारी व्यवस्था बनवाई वो भूले नहीं भूली जा सकती हैं। लकड़ी के चूल्हे में खाना बनाते हुए रसोई की यादें संग्रह करते हुए हमने रात के भोजन का लुफ़्त लिया।

चाय बिस्कुट का स्वाद लेने के बाद हम शशि के साथ 10 किलोमीटर दूर भटिया गांव उनके बड़े भाई व वरिष्ठ पत्रकार Vijendra Rawat जी के घर संवेदना प्रकट करने पहुंचे। चंद रोज पहले ही उनकी जीवनसंगिनी ने लंबी बीमारी के बाद अंतिम सांस ली थी, दुःखद घड़ी में उनके घर पर सारा परिवार एकजुट था जो उन्हें उस पीड़ा से बाहर निकाल रहा था। उन सबके आग्रह के बाद रात्रि विश्राम के लिए हम वहीं भाटिया गांव में शशि के घर पर ठहर गए। दुनियां जहांन में घूमने के बाद भी मनोज भाई आज भी कुछ मामलों में बेहद संकीर्ण नजर आते हैं उन्होंने उनके यहां चाय पानी तक ये कहते हुए नहीं पिया कि वो अशुद्ध हो रखे हैं लिहाज़ा उनके लिए शशि के घर पर अलग से भोजन बनवाना पड़ा बाकि तीनों महिला साथी व मुझे इससे कोई परहेज नहीं था लिहाज़ा हमने हर क्षण को सहजता के साथ आत्मसार किया। शशि व उनकी भाभी विजया लक्ष्मी रावत जी ने जितने स्नेह के साथ सारी व्यवस्था बनवाई वो भूले नहीं भूली जा सकती हैं। लकड़ी के चूल्हे में खाना बनाते हुए रसोई की यादें संग्रह करते हुए हमने रात के भोजन का लुफ़्त लिया।

बिस्तर में हाथ लगाया तो मानों बर्फ की सिल्ली पर हाथ लगा दिया हो, जैसे—तैसे बिस्तर में घुसे कुछ देर नींद आई ही थी कि अचानक मैं रजाई के साथ ज़मीन पर गिर पड़ा चोट नहीं लगी, क्योंकि पहले रजाई गिरी और रजाई के ऊपर मैं।

ठिठूरती सर्दी व सुनसान रात में भोजन के उपरांत शशि ने हम सबको एक कमरे में एकत्र किया जहां शशि, इंदु, निम्मी, कुसुम, मनोज जी व मैं सोने से पूर्व छोटे बच्चों की भांति अंताक्षरी खेलकर समय व्यतीत करने लगे। अब तक रात के 10 बज चुके थे, अंताक्षरी खेलते हुए कब रात के 1 बज गए आभास ही नहीं हुआ। आँखों में नींद भरने लगी तो इंदु, कुसुम, व निम्मी से विदाई लेते हुए शशि, मैं व मनोज दूसरे कमरे में सोने चले गए। बिस्तर में हाथ लगाया तो मानों बर्फ की सिल्ली पर हाथ लगा दिया हो, जैसे—तैसे बिस्तर में घुसे कुछ देर नींद आई ही थी कि अचानक मैं रजाई के साथ ज़मीन पर गिर पड़ा चोट नहीं लगी, क्योंकि पहले रजाई गिरी और रजाई के ऊपर मैं। पर दो मंजिले पर लकड़ी का पाल मानों बम गिर गया हो। झटपट उठा व वापस सो गया। बगल वाले बैड पर मनोज भाई की तरफ देखा वो घोड़े बेच के सो रहे थे मैंने राहत की सांस ली कि चलो मजाक बनने से बच गया और बेफिक्र होके सो गया अगली सुबह आंख खुली तो….

क्रमशः….

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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