संस्मरण

कालसी गेट की रामलीला और मैं…

स्मृतियों के उस पार

सुनीता भट्ट पैन्यूली

अक्टूबर यानी पत्तियां रंग बदल रही हैं,  पौधे ज़मीन पर बदरंग होकर  स्वत:स्फूर्त बीज फेंक रहे हैं ज़मीन पर, जानवर सर्दियों से बचाव की तैयारी में चिंतन में आकंठ डूबे हुए हैं. यानी पूरी प्रकृति एक बदलाव की प्रक्रिया की ओर अग्रसर है.

अक्तूबर आ गया है  सुबह सर्द मौसम की सरसराहट पूरे शरीर की धमनियों में दौड़ने लगी है और इसी सरसराहट के साथ नवरात्रि की धूम में  सुबह हवाओं में बहुमिश्रित अगरबत्तियों की खुशबू है.कहीं मंदिरों में घंटियों की टुनटुनाहट है.

देर रात्रि में दूर शहर में कहीं  माइक पर धीमी होती आवाज़ में  रामलीला के डायलोग जैसे ही मेरे कर्णों को भेदते हैं, मेरी स्मृतियों के कपाट इस चिरपरिचित आवाज़ को सुनकर हर साल की तरह इस बार भी खुल गये हैं जिसके घुप्प अंधेरे को भेदकर बहुत पीछे जाने पर मेरे भीतर बचपन की रंग-बिरंगी अकूत झांकियां सजी हुई  हैं.

कालसी की हमारी वन विभाग की कालोनी है. कालोनी के ऊपर की तरफ रोड से दो, तीन मील पैदल चलने पर  मेरा स्कूल और नीचे दो तीन मील ही पैदल चलने पर आर्मी एरिया का गेट है, उसके बाद एक छोटा सा बाज़ार आता है जिसके शुरु होने है पहले ही आर्मी के गेट के कारण ही इसे गेट बाज़ार नाम दिया है. सुना है कि भारत ने कोई तिब्बतियों की आर्मी यहां गुप-चुप तरीके से दुनिया से छुपाकर रखी है वक़्त आने पर भारत इसका इस्तेमाल करेगा ऐसा हमने सुना है. इन तिब्बतियों को देखकर हम बच्चे बहुत डरते हैं.

मेरे बचपन ने परंपरा व प्रगतिशील सोच के उस दौर को बहुत क़रीब से देखा है जहां गेट बाज़ार के दांयी तरफ़ एक रोड सरकारी अस्पताल,स्टेट बैंक की ओर जाती है. वहीं एक बड़ा सा मैदान है जहां रामलीला आयोजित होती है,दूसरी तरफ़ चकरौता जाने के लिए आर्मी द्वारा गेट सिस्टम से गाड़ियां छोड़ी जाती हैं.

स्मृतियां दर असल स्वभाविक रुप से  बहुत नर्म होती हैं इनसे हार-मनोहार नहीं करनी होती, अपने आसपास रंचमात्र अवशेष मिले नहीं कि सचित्र लौट आती हैं मष्तिष्क में. ख़ासकर वह अल्हड़,नादान  मायके की स्मृतियां जिनका वापस लौटना मायके की देहरी पर दस्तक देने जैसा ही है.

ये अक्टूबर भी ना? इसने मुझे वहीं पहुंचा दिया है बचपन की स्मृतियों में हमारा रोज़ का नियम है जल्दी उठना अपनी पढ़ाई करना. अक्टूबर लग गया है इसलिए स्कूल सुबह साढे-सात का ना होकर दस बजे का हो गया है. दस दिन बाद दशहरा है. सुना है कि कालसी गेट में रामलीला  शुरू हो गयी है. हम भाई-बहन जुगत लड़ाने में लगे हैं कि पिताजी से रामलीला देखने जाने के लिए परमिशन कैसे ली जाये? क्योंकि उन्हें तो हमारा रामलीला देखने के लिए जाना बिल्कुल भी पसंद नहीं है. ऐसा नहीं कि उन्हें पौराणिक मान्यताओं या  हमारे धर्म पर कोई आस्था नहीं? सिर्फ़ इसलिए कि हमारी सुरक्षा  व हमारे व्यक्तिगत विकास के लिए वह एक अच्छे पिता की तरह  हमेशा चिंतित रहते हैं. राम-लीला ठहरी रात ग्यारह-बारह बजे तक चलने वाली तिस पर माता-पिता जी दोनों ही नीरस रामलीला देखने के मसले पर.

लेकिन हम भाई-बहनों को तो पूरी आतुरी राम-लीला जाने की.राम, सीता लक्ष्मण, हनुमान, रावण, बंदरों की सेना, राक्षसों की सेना देखने की जिज्ञासा.

स्कूल जाकर भी वही रामलीला की बच्चों द्वारा आपस में चर्चा “पता है इस बार के सीता और राम तो बहुत सुंदर हैं और रावण… रावण तो क्या बुलंद आवाज़ है उसको सहारनपुर से बुलाया गया है “यह सुनकर तो फिर क्या? हमारी रामलीला देखने की  जिज्ञासा प्रबल  होने लगी है.अब कुछ ना कुछ तो व्यवस्था बिठानी ही पड़ेगी रामलीला देखने के लिए .

कालोनी में एक मामीजी हैं जो रामलीला देखने की बहुत शौकीन हैं लेकिन लेकिन घर का प्रबंधन और अपने मनोरंजन के मध्य बेहतरीन सुशासन बनाकर, समय से बच्चों को पढ़ाकर वह लगभग रोज़ रामलीला देखने  जाती हैं.

हर रोज़ तो हमारे लिए रामलीला देखने जाना  कतई संभव नहीं है यह हमें बहुत अच्छी तरह मालूम है किंतु सीता-स्वयंबर और सीता -हरण देखने की ना जाने  क्यों इच्छा बलवती बनी ही रही है हमेशा? उन मामीजी को हम पिताजी के आफ़िस से आने से पहले ही कहकर आ गये हैं रामलीला  जाने की सिफ़ारिश करने के लिए.

अब शाम होते ही हम  सामान्य दिनों की अपेक्षा और पहले ही पढ़ने बैठ गये हैं अच्छे बच्चों की तरह  पिताजी ने आफ़िस से आकर हमें पढ़ते हुए देख लिया है और खुश हो गये हैं. उनके इस ख़ुशी की लयात्मकता में मामीजी ने हमारे रामलीला जाने के लिए पिताजी से परमिशन मांग ली है. पिताजी मुलहाजे के कारण मना नहीं कर पाये हैं और हमारा रामलीला देखने जाने का हिसाब-किताब इस तरह पक्का बन गया है किंतु इस शर्त के साथ मामीजी हमें घर तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी लेंगी और हमें अपने साथ हल्की मुलायम सी कंबल और टार्च रखनी होगी कोई पैसे नहीं मिलेंगे कुछ खरीदने के लिए.

पिताजी ने रामलीला एक ही दिन भेजने के लिए निश्चित किया है किंतु हममें वही बाल-सुलभ ज़िद्दीपन फिर दोबारा  वही  जुगाड़ भिड़ाकर हम दो दिन तो रामलीला देख ही लेंगे  अपने पसंदीदा दिन सीता स्वयंबर और सीताहरण, ऐसा पूरा भरोसा है हमें. जल्दी से अपनी किताबें बंद कर,खाना खाकर हम मामीजी के साथ  रामलीला देखने  गेट बाज़ार की ओर हम उद्दत हो गये हैं.

साढ़े आठ बजे का समय सड़क पर रत्ती भर चलने की जगह नहीं किंतु हड़बड़ाहट में चलने  व बातचीत का शोर. सभी को रामलीला मैदान में पहुंचकर जगह घेरने की जल्दी..! किंतु समय का वह सुनहरा दौर ना ही किसी के जेब कटने का खतरा और ना ही किसी से अश्लीलता व दुर्व्यवहार का खतरा और सभी सीधे-सीधे पैदल चलने वाले पहाड़ी लोग.फसल कट जाने के उपरांत  फ़ुर्सत का उद्योग जिनके लिए रामलीला देखने जाना ही है. इनकी जेबों के ठसाठस भरी रहने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रामलीला पंडाल  के बाहर  जितनी भी दुकानें लगी हुई होती हैं सभी दुकानों से इन्हें कुछ ना कुछ खरीदना ही है.

नीचे गेट बाज़ार पहुंच कर दांयी ओर सरकारी हास्पिटल की ओर मुड़ते ही रामलीला मैदान की ओर रोड थोड़ी संकरी थी तिस पर रामलीला देखने जाने वालों का तांता कोई गाना गाते जा रहा है कोई सीटी बजाते हुए..

जैसे ही रामलीला के पंडाल की थोड़ी दूरी पर हम पहुंचे हैं, हमें लालटेन की रोशनीयों में गर्म होती मूंगफलियों की ठेलियों की क्रमवार पंक्तियां  दिखाई दे जाती हैंऔर हमारा मन मचल जाता  है मूंगफलियां खरीदने को.  वो क्या है ना कि मूंगफलियों के आने की पहली-पहली दस्तक है इसलिए इसके भूने जाने की ख़ूशबू जो हवाओं में तिर रही है हमें आतुर कर देती है अपनी तरफ़ आने को.

ऐसा नहीं है कि पिताजी ने हमें पैसे नहीं दिए तो मूंगफली खरीदने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं. दरअसल मां ने जाते हुए चुपचाप पैसे पकड़ा दिये हैं और हम मूंगफली खरीद सकते हैं. लेकिन अभी नहीं.! अभी पहले हमें भी तो पंडाल में अपने लिए जगह घेरनी है सबसे आगे बैठने के लिए, वरना पीछे बैठने से हम बच्चों को कहां कुछ दिखाई देगा? किंतु भाग्य है हमारा हमें कभी आगे जगह मिल जाती है घेरने के लिए, कभी पीछे जगह मिलती है हां यह बात दीगर है की खिसक-खिसककर हम आगे पहुंच जाते हैं कोई मूंगफली लेने के लिए उठा नहीं कि उसकी जगह हम घेर लेते हैं. हद तो तब होती है जब हम खिसक-खिसकर स्टेज के बिल्कुल समीप पहुंच जाते हैं और अपनी आंखों से क़रीब से रामलीला के पात्रों को देखते और सुनते हैं और वानर और राक्षस सेना से छेड़ भी लेते हैं.

स्टेज के इतने पास सरककर बैठने का ही हासिल है कि रामलीला के पात्रों के कुछ डायलोग मुझे अभी तक भुलाये नहीं भूलते.

मुझे पता नहीं ये सही भी हैं या नहीं, आप सभी भी पढिये.

रावण-

पृथ्वी मेरी बेटी है आकाश मेरा बंदा
इन्हीं दोनों के नाम से नाम मेरा है दशकन्धर हा..हा..हा

हनुमान-रघुबर जी के दर्शन करने आया हूं मैं

राम सीता की खोज में जाते हुए- हे खग-मृग तुमने क्या देखी सीता

सीता राम के गले में माला डालते हुए- फूल माला पहनो प्रभू दासी खड़ी जानकी

दशरथ अंतिम समय में-हा राम..हा राम

हिंदी के कुछ शब्द जैसे आखेट, मुद्रिका, रघुवर, कमेटी, मंच, हरण, खग-मृग, स्वयंबर, चंदा, जूलूस, स्वर्ण मृग आदि शब्दावली का ज्ञान सर्वप्रथम मुझे रामलीला देखकर ही ज्ञात हुए.

सीन-केवट द्वारा राम के पैर धुलवाना,सबरी के द्वारा से जूठे करना अभी तक स्मृतियों में बद्धमूल हैं.

जब  हम जगह घेर कर तसल्ली कर लेते हैं तब बारी आती  है मूंगफली खरीदने की और हम सभी में से एक जगह घेरकर रखता है एक मूंगफली खरीदने जाता है. इस तरह रामलीला भी चलती रहती और भीड़ में दर्शकों का कभी बैठना, कभी उठना,कभी उचकना लगा रहता है. लेकिन बीच-बीच में कुछ वालेंटियर्स भी हैं जिनकी छाती पर एक बिल्ला लगा हुआ है जिनके हाथ में एक मोटा डंडा है जिनका काम रामलीला में अनुशासन बनाये रखना है कभी-कभी हम उनकी डांट के डर से बीच में नहीं भी उठते हैं और मूंगफली लेने नहीं जाते हैं.

रामलीला के बीच में रोज़ की तरह  क़रीब आधे घंटे का   बोरियत भरा कार्यक्रम भी चल रहा है कि किस ने कितना चंदा,या दान दिया है रामलीला कमेटी को?हमें उससे क्या? हम इस बीच अपने लिए मौका देखकर मूंगफली खरीद कर ले आये हैं.

बीच में सीन तैयार होने में समय लग रहा है तो इस दरमियान हास-परिहास और अन्य संगीत,नृत्य कलाओं का भी हमें आनंद उठाने को मिल जाता है.

बचपन में पुराणों और मिथक की तो समझ  नहीं थी  लेकिन यूं ही गाहे-बगाहे रामायण के सभी किरदारों से और  उनकी बुरी और अच्छी  चारित्रिक विशेषताओं से  स्वत: ही परिचय होने लगा.

रोज़ रामलीला देखने की तो हमें परमिशन नहीं है किंतु स्वयं की चित्तवृत्ति को शांत करने हेतु हमने यह समाधान निकाल लिया है कि रामलीला ना सही उसकी तैयारियों को तो क़रीब से देखा जाये.हम बाहर खेलने के बहाने चार पांच -बजे के क़रीब गेट बाज़ार होते हुए रामलीला के मैदान में पहुंच जाते हैं वहां रामलीला शुरू होने से पहले स्टेज के पीछे रामलीला में किरदार निभाने वालों के मध्य सरग़ोशी हो रही है.

सभी विरोधाभास सेनायें और किरदार यानी राम की सेना और रावण की सेना के बीच परस्पर यहां कोई बैर नहीं है सभी एक दूसरे की मदद करने में जुटे हैं.कोई आपस में मुकुट ठीक कर रहा है ,कोई बिना विग के बैठा है, कोई अपना डायलोग याद कर रहा है कोई सीता की साड़ी बांध रहा है.राम और रावण बड़े प्रेम से एक-दूसरे के साथ वार्तालाप कर रहे हैं. यानी कि हमें पता चल जाता  है कि आज रात क्या-क्या सीन दिखाये जायेंगे और हम दौड़कर घर जाकर कालोनी के बच्चों को बता देते हैं कि आज रात राम लीला में कौन सी गतिविधियां होंगी?

रामलीला देखने का हासिल उस बचपन में यह भी रहा हमें कि नाट्य -मंचन किस तरह होता है? किस तरह रामायण के किरदार यदि  बाहर की तरफ से मंच की ओर आ रहे हैं तो बिना दर्शकों को पीठ दिखाए खड़े होते हैं? किस तरह शालीनता से चलते हैं? बोलते हैं? उस समय रामलीला में जो मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट करता है वह है नेपथ्य से होकर मंच तक किरदारों द्वारा दर्शकों तक संवादों की संप्रेषणता. कहीं हम दर्शकों को महसूस नहीं हो रहा है  कि संवाद मंच के पीछे से बोले जा रहे हैं हां सारे किरदार अपने पीछे के पर्दे से बिल्कुल लगे हुए खड़े होते हैं.

रामलीला में अगर नाम सही से याद कर रही हूं तो? कृपाराम जोशी हैं कोई राम का किरदार बहुत मन से निभाते हैं उनको राम के चरित्र से बाहर भी जब वह होते हैं उन्हें मैंने देखा है.सच के ही राम चेहरे पर एक ओज ,शालीन,व्यवहारिक मधुर भाषी और ये सब चारित्रिक विशेषताएं होने के कारण जब वह राम के किरदार में आते हैं स्वत:ही एक आभामंडल उनके चारों ओर उद्भासित होने लगता है.

यह भी मैंने बचपन में ही  सुना है कि हर किसी को रामलीला का किरदार निभाने को नहीं दिया जाता है पहले उनके व्यवहार,चारित्रिक विशेषताओं की पड़ताल होती है कहीं कोई व्यसन व विवाद तो नहीं उनके जीवन में?

दो दिन जैसे-तैसे हमने जो सीता-राम का स्वयंबर और सीता हरण देखा है उसमें रावण का भव्य दरबार उसमें पेश होने वाली नर्तकी उसका स्वर्ण उड़न-खटोला, सीता का राम को वरमाला पहनाना उनकी सखियों की हंसी ठिठोली, लक्ष्मण का नटखट-पन की स्मृतियों ने मेरे  मष्तिष्क में एक अमिट छाप छोड़ी है जिसका परिणाम यह है कि जब भी रामलीला का पदार्पण होता है अक्टूबर के महीने में हृदय कुंलाचे भरने लगता है रामलीला देखने के लिए. किंतु समय विपरीत बहाव की ओर है रामलीला में जब से अश्लीलता परोसी जाने लगी है रामलीला देखने जाना मैंने बंद ही कर दिया.

दो दिन पहले पच्चीस साल बाद रामलीला देखने के लिए मन ने फिर उड़ान भरी है और मैं पतिदेव के साथ बच्चों को रामलीला देखने के लिए ले गयी. दरअसल मेरी अभीष्ट बच्चों को रामलीला दिखाने की इसलिए भी रही कि उनमें भी रामलीला के प्रसंगों द्वारा प्रयोगात्मक रूप से उनमें हमारे पुराणों का महत्त्व व एक स्वच्छ और  विकसित चारित्रिक, व्यक्तिक विशेषताओं की मजबूत नींव पड़ सके.

फिर बचपन की ओर सीताहरण के बाद हम सभी दर्शकगण सीता के रावण द्वारा हरण करने पर ग़मगीन हैं. पर्दा गिरता है रामलीला के सभी किरदार जिन्होंने आज  प्रस्तुति दी है मंच पर एकत्रित हो गये हैं राम की  इस स्तुति के साथ

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारूणम.
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंजपद कन्जारुणम..

रामलीला देखकर हम वापस अपने घर की ओर उन मामीजी के साथ-साथ में धनुष-बाण, तलवार लिये. दशहरे की छुट्टियों में क्योंकि हमें भी तो  सारा दिन रामलीला खेलनी है कालोनी में बच्चों के साथ वापसी में सड़क वही लोगों से खचाखच भरी हुई, वही भीड़ का रैला लेकिन इस समय रामलीला में जगह घेरने की नहीं, घर पहुंचने की जल्दी.

(लेखिका साहित्यकार हैं एवं विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं.)

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