January 28, 2021
शिक्षा

स्कूली शिक्षा की वैकल्पिक राहें

गांधी जी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया था…

  • प्रो. गिरीश्वर मिश्र

स्कूली शिक्षा सभ्य बनाने के लिए एक अनिवार्य व्यवस्था बन चुकी है. शिक्षा का अधिकार संविधान का अंश बन चुका है. भारत में स्कूलों पर प्रवेश के लिए बड़ा दबाव है और अभी करोड़ों बच्चे because स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और जो स्कूल जा रहे हैं उनमें से काफी बड़ी संख्या में बीच में ही स्कूल की पढाई छोड़ दे रहे हैं. यानी शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है. दूसरी तरफ स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को ले कर भी सवाल खड़े होते रहे हैं. सभी बच्चों को उनकी रुचि, क्षमता और स्थानीय सांस्कृतिक प्रासंगिकता आदि को दर किनार रख सभी को एक ही ढाँचे में एक ही तरह के सांचे में ढाल कर शिक्षा की व्यवस्था की जाती है.

स्कूली शिक्षा

गांधी जी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया था परन्तु 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी प्रतियोगिता और उपभोक्तावाद के आगोश में हमso उसी शिक्षा पद्धति को चलाते रहे. इससे सामाजिक असमानता भी बढी और मूल्यों की दृष्टि से भी हम कमजोर पड़ते गए. इसके समानांतर महगे निजी स्कूलों की भी भरमार हो गई.

स्कूली शिक्षा

सरकार की औपचारिक शिक्षा प्रणाली फैक्ट्री में थोक के हिसाब से माल तैयार करने के तर्ज पर एक ही तरह के मानक की पक्षधर है. मनुष्य मात्र में जन्म से ही दिखने वाली व्यक्तिगत भिन्नता के तथ्य की अनदेखी करते हुए और मानवीय प्रतिभा की सृजनात्मकता और स्वतन्त्र चिंतन की नैसर्गिक विशेषताओं को भुला कर सबके लिए एक ही पैमाने but का उपयोग व्यवस्था की दृष्टि से सुभीता तो जरूर देता है पर सहज मानसिक विकास में बाधक होता है. कुल मिला कर मुख्य धारा के स्कूलों को ले कर काफी असंतोष देखने को मिलता है. शिक्षा में जिस खुलेपन और विविधता की जरूरत होती है उसके लिए विद्यालय की संस्था को अधिक संवेदनशील और आग्रहमुक्त होने की जरूरत है. वैसे भी विश्व की अनेक प्रतिभावान विभूतियों ने स्कूल की संस्था की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न उठया  है.

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सभी सांकेति फोटो गूगल से साभार

स्कूलों की संस्था की उपयोगिता के विवाद में न भी पड़ें तो स्कूलों में विविधता इसलिए भी जरूरी है कि स्कूली आयु के बच्चे न केवल सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अनेक तरह की पृष्ठभूमियों से आते because हैं बल्कि उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, स्कूल के लिए तत्परता और शारीरिक-मानसिक क्षमता (जैसा दिव्यांग बच्चों में मिलता है) और जटिल सामाजिक पारिवारिक परिवेश में भी अंतर पाए जाते हैं. कुंठा के चलते स्कूल छोड़ कर चले जाने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है. देश अभी भी पूर्णत: साक्षर नहीं हो सका है. ऐसे में वैकल्पिक स्कूलों की व्यवस्था का महत्त्व बढ़ जाता है.

स्कूली शिक्षा

आधुनिक भारत में  प्रचलित स्कूली व्यवस्था एक और अपने औपनिवेशिक अत्तित से बंधी है तो दूसरी और अब उस पर वैश्विकता का भूत सवार है. इन सबके बीच यथा स्थति बनी हुई है – न ययौ न तस्थौ. इन को अपर्याप्त मानते हुए वैकल्पिक  स्कूल  को ले कर कई प्रयास होते रहे हैं. पाठशाला, गुरुकुल और मदरसे तो जमाने से चले आ रहे थे. so अंग्रेजों के जमाने में नया ढांचा चला जो अब मुख्य धारा बना हुआ है. गांधी जी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया था परन्तु 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी प्रतियोगिता और उपभोक्तावाद के आगोश में हम उसी शिक्षा पद्धति को चलाते रहे. इससे सामाजिक असमानता भी बढी और मूल्यों की दृष्टि से भी हम कमजोर पड़ते गए. इसके समानांतर महगे निजी स्कूलों की भी भरमार हो गई.

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वैकल्पिक दृष्टि से स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद ने प्रयास शुरू किया था. महात्मा गांधी, गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर, श्री अरविन्द, गीजू भाई बधेका, जिद्दू कृष्ण मूर्ति के शैक्षिक प्रयासों नए but तरह के स्कूल के प्रयोग शुरू हुए. चिन्मय मिशन, साधू वासवानी ट्रस्ट, दयालबाग शैक्षिक संस्थान आदि भी इस दिशा में कार्यरत हैं. ऐसे ही मांटेसरी पद्धति के विद्यालय भी चल रहे हैं. सत्तर के दशक में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम, बेगलोर का विकासना, राजस्थान में दिगंतर, उत्तराखंड में सिद्ध स्कूल, मध्य प्रदेश में आधार शिला शिक्षण केंद्र तमिलनाडु में विद्योदय स्कूल, बिहार में चरवाहा विद्यालय जैसे प्रयासों के साथ ही पूरे देश में इस तरह के प्रयास हो रहे हैं. राष्ट्रीय मुक्त शिक्षा संस्थान भी इस दिशा में कई नवाचारी प्रयास कर रहा है.

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हम विकल्प के स्कूल के रूप में जिन संस्थाओं को पाते हैं वे प्राय: उन सीमाओं को लांघने की कोशिशें हैं जिनसे उबरने के लिए मुख्य धारा की संस्थाएं जूझ रही हैं. वैकल्पिक because स्कूल शिक्षा के उन्नयन की राह दिखाते हैं. इनमें बच्चे स्वयं अपनी प्रतिभा और रूचि को तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं. इस काम में अध्यापक, माता-पिता, हित मित्र सहायक का काम करते हैं.

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इन वैकल्पिक स्कूलों के विचारों और अभ्यासों को आत्म सात कर के मुख्य धारा की शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकेगा. भारत में नवाचारों के लिए प्रतिरोध आम बात है. माता-पिता, अभिभावक, नीति निर्माता, अध्यापक सभी चाहते हैं की सुधार हो परन्तु यह सरल नहीं होता है. हम विकल्प के स्कूल के रूप में जिन संस्थाओं but को पाते हैं वे प्राय: उन सीमाओं को लांघने की कोशिशें हैं जिनसे उबरने के लिए मुख्य धारा की संस्थाएं जूझ रही हैं. वैकल्पिक स्कूल शिक्षा के उन्नयन की राह दिखाते हैं. इनमें बच्चे स्वयं अपनी प्रतिभा और रूचि को तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं. इस काम में अध्यापक, माता-पिता, हित मित्र सहायक का काम करते हैं. सीखना अपने आस-पास के पूरे परिवेश के बीच और परिवेश के माध्यम से  होता है.

स्कूली शिक्षा

ज्ञान, कौशल और मूल्यों की बच्चे की अपनी चाह को आदर देते हुए वैकल्पिक स्कूल परीक्षा, प्रतिष्ठा और पद की लालसा के बदले सीखने की सामर्थ्य पर बल देते हैं. इनमें बच्चा या विद्यार्थी ही केंद्र because में होता है और सीखने गति और परिधि को तय करता है. सीखने और सिखाने की कोई एक मानक शैली न हो कर उसकी कई राहें खुली होती हैं. इन स्कूलों में ज्ञान के विषयों की सीमाएं आपस में मिलती हैं और उनके आपसी रिश्तों की पड़ताल की जाती है. सीखते हुए और खेल कूद, संगीत और कल्पनाशीलता के लिए अवसर मिलने से बच्चे की संवेदना का भी विस्तार होता है.

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जीवन को समृद्ध करने वाले आध्यात्मिक, सामाजिक  तथा नैतिक मूल्यों के साथ दायित्वों को जीवन में उतारने की कोशिश इन स्कूलों की ख़ास विशेषता होती है. लोकतांत्रिक और लचीले प्रशासन because के बीच संचालित होने वाले इन स्कूलों में बच्चों को व्यावसायिक शिक्षा और उनके हुनर विकसित करने की भी व्यवस्था होती है. वैकल्पिक स्कूल बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं और उनमें ऐसा बहुत कुछ है जो मुख्य धारा के लिए प्रासंगिक और उपयोगी है.

स्कूली शिक्षा

देश के लिए विकसित हो रही नई शिक्षा because नीति में भी विकल्पक स्कूली शिक्षा को समर्थ बनाने की बात कही गई है. so जरूरी है कि इस तरह के वैकल्पिक स्कूल से उन तत्वों को ग्रहण किया जाय जिनसे शिक्षा की मुख्य धारा को उस कैद से आजाद किया जाय जिनके चलते सीखने की जगह परीक्षा और कौशल की जगह प्राप्तांक को तरजीह मिलाती है.

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(लेखक शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपतिमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा हैं.)

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