प्रशासनिक हिन्दी शब्दावली के शब्द शिल्पी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल

हिन्‍दी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

14 सितम्बर का दिन समूचे देश में ‘हिन्‍दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. आजादी मिलने के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिन्‍दी को राजभाषा बनाने का फैसला लिया गया था. तब से हर साल 14 सितंबर को हिन्‍दी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन सरकारी विभागों में राजभाषा हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार के प्रति संकल्प को दुहराते हुए सरकारी प्रतिष्ठानों द्वारा बहुत धूमधाम से ‘हिन्‍दी दिवस’ समारोह का आयोजन किया जाता है. इस समारोह का भविष्य के लिए संकल्प का जितना महत्त्व है and उतना ही इसका यह भी महत्त्व है कि हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार और सरकारी काम-काज में हिन्‍दी के अधिकाधिक प्रोत्साहन देने और इसे व्यवहार में उपयोगी बनाने के लिए विद्वानों द्वारा अब तक किए गए प्रयासों का सिंहावलोकन भी किया जाए.

सरकारी

इसी परिप्रेक्ष्य में हम आज हिन्‍दी को लोकप्रिय बनाने और इसे राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले किसी एक खास विद्वान की बात करते हैं तो उनमें सर्वोपरि एक ही नाम उभर कर आता है दिल्ली प्रशासन में हिन्‍दी  अकादमी के पूर्वसचिव एवं दिल्ली सरकार में पूर्व राजभाषा सचिव जैसे पदों को अलंकृत करने वाले और आजीवन हिन्‍दी की सेवा को समर्पित स्व डॉ. नारायण दत्त पालीवाल जी का नाम. डॉ. नारायण दत्त पालीवाल जी का नाम लगभग चार पांच दशकों तक राष्ट्रपति भवन से लेकर,भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों तक, so दिल्ली सरकार के कार्यालयों से लेकर स्वायत्त हिन्‍दी सेवी संस्थानों तक हिन्‍दी जगत में इसलिए छाया रहा क्योंकि इस विद्वान ने हिन्‍दी की प्रशासनिक शब्दावली को एक नई पहचान से जोड़ा है.

डॉ. नारायण दत्त पालीवाल

शिक्षा

आज जब नई शिक्षा नीति के तहत हिन्‍दी और आधुनिक भारतीय भाषाओं को विशेष प्रोत्साहन देने की बात आती है तो डॉ. पालीवाल के योगदान की चर्चा करना बहुत प्रासंगिक हो जाता है.

नारायण

डॉ. नारायण दत्त पालीवाल ने पर्वतीय लोक संस्कृति और लोकसाहित्य खासकर कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति को विश्व पटल के समक्ष रखने हेतु भी अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया. उत्तराखंड का जनमानस जब पृथक् राज्य के आन्दोलन के दौर से गुजर रहा था तो उन कठिन परिस्थितियों के दौर में भी डॉ पालीवाल ने ‘उत्तराखण्ड राज्य: दशा और दिशा’ शीर्षक से प्रेरणादायी लघु पुस्तिका लिखकर जो जनता का आह्वान और मार्गदर्शन किया उनका वह सारस्वत प्रयास भी but उत्तराखंड राज्य की प्राप्ति हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुआ था. डॉ. पालीवाल की इस पुस्तिका में उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के बारे में विरोधियो द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का सप्रमाण खण्डन किया गया था. इस पुस्तिका की दस हजार से भी ज्यादा प्रतियां तब छापी गई थी और उत्तराखंड आंदोलन हेतु आयोजित जनसभाओं में इसकी प्रतियां निःशुल्क बांटी जाती थी.

दत्त

हिन्‍दी भाषा के क्षेत्र में डॉ. पालीवाल जी की एक विशेष पहचान प्रशासनिक हिन्‍दी शब्दावली के शिल्पकार के रूप में रही है. डॉ. पालीवाल द्वारा लिखी गई पुस्तकों का यदि विषय वस्तु की दृष्टि से butविश्लेषण करें तो उसके दो वर्ग स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. प्रथम वर्ग में वे रचनाएं आती हैं जिनका सम्बन्ध राजभाषा हिन्दी से है तो दूसरे वर्ग में ऐसी पुस्तकें हैं जो लोक-भाषा कुमाऊँनी को लक्ष्य करके लिखी गई हैं. डॉ.पालीवाल ने अपने जीवनकाल में कुल इक्कीस ग्रन्थों की रचना की जिनमें बारह ग्रन्थ राजभाषा हिन्दी से सम्बन्धित थे तथा आठ ग्रन्थ कुमाऊँनी भाषा और संस्कृति के बारे में लिखे गए.

शिक्षा

रामजस कालेज की ‘संस्कृत साहित्य परिषत्’ द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में डॉ.पालीवाल ने कहा था ‘अरबी, फारसी, उर्दु तथा अंग्रेजी becauseभारतीय शासन व्यवस्था पर तत्कालीन प्रशासकों द्वारा थोपी गई भाषाएं हैं तथा इनका इतिहास कुछ सैकड़ों वर्षों का ही है किन्तु संस्कृत भाषा इस देश की जन्मजात प्रशासकीय भाषा है.

पालीवाल

मुझे याद है कि मेरे आग्रह पर डॉ. नारायण दत्त पालीवाल जी ने रामजस कालेज के संस्कृत विभाग की स्वर्ण जयंती के अवसर पर “हिन्‍दी की प्रशासनिक शब्दावली के निर्माण में संस्कृत की भूमिका” शीर्षक से जो बहुमूल्य व्याख्यान दिया वह राजभाषा हिन्‍दी की प्रशासनिक शब्दावली के संदर्भ में भी अति महत्त्वपूर्ण व्याख्यान था so और बाद में मेरे द्वारा संपादित प. गंगाराम स्मृति ग्रन्थ “एंसीएन्ट कल्चर एंड लिटरेचर” में यह शोधलेख प्रकाशित भी हुआ है. रामजस कालेज की ‘संस्कृत साहित्य परिषत्’ द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में डॉ.पालीवाल ने कहा था ‘अरबी, फारसी, उर्दु तथा अंग्रेजी भारतीय शासन व्यवस्था पर तत्कालीन प्रशासकों द्वारा थोपी गई भाषाएं हैं तथा इनका इतिहास कुछ सैकड़ों वर्षों का ही है किन्तु संस्कृत भाषा इस देश की जन्मजात प्रशासकीय भाषा है.

पालीवाल

गुप्त राजाओं के समय तक शासन व्यवस्था का सारा कामकाज संस्कृत भाषा में ही होता था. संस्कृत भाषा में भाषाकोश लेखन की एक समृद्ध परम्परा चली आ रही है. but इन्हीं सब कारणों से डॉ. पालीवाल का विचार था कि सरल संस्कृत भाषानिष्ठ शब्दावली शासन व्यवस्था का काम चलाने के लिए बहुत उपयोगी है. सामाजिक एकता और आंचलिक भाषाई प्रतिनिधित्व को भी प्रोत्साहित करने के लिए वे संस्कृत भाषा के महत्त्व को स्वीकार करते थे. यह लेख संकीर्ण भाषाई सोच रखने वाले उन लोगों की आंखें खोलने वाला लेख है जो हिन्‍दी  प्रशासनिक शब्दावली की जटिलता का उपहास प्रायः इसलिए उड़ाया करते हैं कि यह भाषा संस्कृतनिष्ठ होने के कारण आम आदमी के लिए जटिल है.

पालीवाल

दिल्ली प्रशासन में राजभाषा सचिव के रूप में डॉ. पालीवाल जी का ही भगीरथ प्रयास था कि महानगर दिल्ली में न केवल पहली बार उनके द्वारा ‘हिन्‍दी अकादमी’ की स्थापना हो सकी बल्कि ‘संस्कृत अकादमी’ के गठन में भी उनकी भूमिका रही थी. डॉ. पालीवाल की पहल पर ही ‘हिन्‍दी अकादमी’ द्वारा 50 हजार की सहायता राशि से ही दिल्ली सरकार में ‘संस्कृत अकादमी’ का पहली बार गठन हो सका. ‘दिल्ली संस्कृत अकादमी’ का संस्थापक सदस्य होने के नाते मुझे संस्कृत भाषा को स्कूली पाठ्यक्रम because में स्थान देने और संस्कृत अकादमी की स्थापना हेतु दिल्ली के शिक्षा जगत् में श्रीकृष्ण सेमवाल जी उन दिनों सत्तरहवें दशक में जो संघर्ष कर रहे थे तो उस संघर्ष को सफल बनाने और कार्यान्वित करने में उत्तराखंड के तीन बुद्धिजीवियों-दिल्ली सरकार के तत्कालीन शिक्षामंत्री श्री कुलानन्द भारतीय, राजभाषा सचिव डॉ. नारायण दत्त पालीवाल और कविरत्न श्रीकृष्ण सेमवाल की प्रमुख भूमिका रही थी.

पालीवाल

संयोगवश ये तीनों ही विद्वान उत्तराखंडी थे, संस्कृत और हिन्‍दी  भाषा के राष्ट्रीय महत्त्व को भली भांति जानते समझते थे और इन्हें राष्ट्रीय धरातल पर प्रतिष्ठित करने का सद्विचार भी रखते थे. butबहुत प्रसन्नता होती है कि इन तीनों उत्तराखंडी विभूतियों के प्रयासों से स्थापित की गई ये दोनों अकादमियां राष्ट्रीय धरातल पर भी आज सफलता पूर्वक हिन्‍दी  और संस्कृत भाषा की सेवा के नए नए प्रतिमान स्थापित कर रही हैं.

प्रशासनिक शब्दावली और संस्कृत

वस्तुतः सरकारी कार्यालयों में संस्कृतनिष्ठ किन्तु सरल प्रशासनिक हिन्दी शब्दावली को जो विशेष प्रोत्साहन मिल पाया है तो उसके शिल्पकार डॉ.पालीवाल ही थे. पालीवाल जी का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह रहा था कि उन्होंने अपने जीवनकाल में संस्कृत शब्दों की सहायता से बनने वाली हिन्‍दी की एक ऐसी सुगठित प्रशासनिक शब्दावली का निर्माण किया जिससे हिन्‍दी सरकारी कार्यालयों में राजभाषा के रूप में विशेष लोकप्रिय ही नहीं हुई बल्कि भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में अधिकृत butरूप से प्रतिष्ठित भी होने लगी. डॉ. पालीवाल के अनुसार सरकारी कामकाज की शब्दावली में कुछ तो पदनाम होते हैं और कुछ पत्र व्यवहार के लिए प्रयोग में आने वाले विशिष्ट शब्द तथा वाक्यांश होते हैं. इसके अतिरिक्त नियमों, विनियमों, अधिसूचनाओं संहिताओं और विभिन्न विभागों से संबंधित नियमों की शब्दावली होती है. आरंभिक स्थिति में संस्कृत के उपसर्ग और प्रत्यय लगाकर अनेक शब्द बनाए जा सकते हैं.

उदाहरण के लिए, सचिव (सेक्रेटरी) शब्द को लें. इसके साथ आरंभ में आने वाले पर्याप्त शब्द आसानी के साथ बन जाते हैं, जैसे- उप सचिव, अवर सचिव, सह सचिव, because संयुक्त सचिव, निजी सचिव, वैयक्तिक सचिव, महासचिव, संसदीय सचिव, मंत्रि परिषद सचिव इत्यादि. इसी प्रकार सचिवालय (सेक्रेटेरियेट), सचिवालयीय  (सेक्रेटेरियल) आदि शब्द भी आसानी से बनाए जा सकते हैं. ऐसे प्रशासनिक शब्दों के निर्माण में संस्कृत का योगदान स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

पालीवाल

संस्कृतनिष्ठ इस प्रशासनिक शब्दावली की पद्धति को अपनाने पर विभिन्न प्रकार की संकल्पनाओं को व्यक्त करने को थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ हमारे पास एक विशाल शब्द सम्पदा उपलब्ध हो जाती है. जैसे प्रारूप (ड्राफ्ट) शब्द की सहायता से प्रारूपण, प्रारूपकार, प्रारूपित आदि शब्द बनाए जा सकते हैं. परंतु इसके butउर्दू समानार्थी ‘मसौदा’ शब्द को इस प्रकार के रूपों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता. यही नियम हिन्‍दी के पत्र, परिपत्र (सर्कुलर) प्रपत्र (फार्म), पत्रावली (फाइल), पत्राचार अथवा पत्रव्यवहार पर भी लागू होता है जो कदाचित चिट्ठी अथवा खत शब्द से पूरा नहीं हो सकता. विभिन्न प्रकार की संकलपनाओं को अभिव्यक्त करने के सिलसिले में अधिकार शब्द को भी लिया जा सकता है जिसको यदि अधिकृत बना दिया जाए तो अंग्रजी के ऑथराइज्ड शब्द का अर्थ बन जाता है. हमें औथेंटिक के लिए शब्द की आवश्यकता होती है तो इसी की सहायता से प्राधिकृत शब्द बना लिया जाता है.

पालीवाल

इसी संदर्भ में ऑफिसर के लिए अधिकारी शब्द का प्रयोग भी अफसर के स्थान पर अधिक उपयोगी लगता है. यही बात कानून के क्षेत्र मे प्रयोग की जाने वाली शब्दावली पर भी निर्भर है. उदाहरण के लिए, संस्कृत ‘विधि’ शब्द को लीजिए. but इसका प्रयोग कानून के बदले किया जाता है. हम इसकी सहायता से उपविधि (बाइ-लॉ), विधायक (लेजिस्लेटर), विधायिका (लेजिस्लेचर), विधिक (लीगल), विधिसम्मत (इन कंफर्मिटी विद लॉ), विधिवेत्ता (कानून का जानकार) विधि विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट इन लॉ) आदि शब्द बना सकते हैं यह स्पष्ट है कि केवल कानून शब्द से हम इतने अधिक शब्द नहीं बना सकेंगे. इसी प्रकार विधान,वैधानिक, संविधान, वैधानिकता और संवैधानिक आदि शब्दों का उदाहरण दिया जा सकता है, जिनके निर्माण में भी संस्कृत ‘विधि’ शब्द  की महत्त्वपूर्ण भूमिका है.

पालीवाल

डॉ.नारायण दत्त पालीवाल के मतानुसार हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान इसलिए प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि वह सभी भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ है, वरन् इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि इस भाषा का देश में सबसे अधिक प्रचार और प्रसार है तथा इसे अधिकांश जनता समझती तथा बोलती है. हिन्दी प्रारंभ से भारत के सभी प्रांतों में बोली व समझी जाती थी but और प्रायः सभी प्रांतों के अहिन्दी भाषी लेखकों ने इस भाषा में साहित्य सृजन भी किया है.इससे इस भाषा को संस्कृत की भांति अखिल भारतीय रूप मिला है. हिन्दी को उसका अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने में देश के कोने कोने में फैले हुए मज़दूर वर्ग, व्यापारी वर्ग, आजीविका व विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है.

कुमाउंनी साहित्य संस्कृति के अनुसन्धाता

डॉ.नारायण दत्त पालीवाल वास्तव में हिमालय पुत्र थे. उन्होंने कुमाउंनी साहित्य और संस्कृति को विशेष रूप से गौरवान्वित किया. उनका जन्म कुमाऊँ प्रदेश के ‘पाली’ नामक गांव के एक साधारण परिवार में हुआ था. but हजारों वर्षों की पराधीनता के कारण कुमाऊँ भले ही राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से एक पिछड़ा प्रदेश था, जीवन यापन के पुराने घिसे-पिटे साधनों से उस समय दो जून की रोटी भी बहुत मुश्किल से मिल पाती थी. मगर डॉ. पालीवाल ने अपनी इस जन्मभूमि में संघर्षो से जूझना सीखा और हिमालय की सांस्कृतिक विरासत से आत्मसात करते हुए अपने व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों को हिमालय के समान विराट् मूल्यों से जोड़ने में भी वे सफल रहे.

पालीवाल

डॉ. नारायण दत्त पालीवाल जी की अन्तिम रचना ‘कुमाउंनी संस्कृति भाषा एवं शब्द सम्पदा’ उनकी समस्त कृतियों में सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी. इस बहुचर्चित पुस्तक का मुझे समीक्षा करने का सौभाग्य मिला है. ‘कत्यूरी मानसरोवर’ त्रैमासिक पत्रिका के वर्ष 2002 के अंक में यह समीक्षा प्रकाशित हुई है. so आधुनिक परिप्रेक्ष्य में आंचलिक भाषाओं और बोलियों की घटती क्षमता के प्रति इस ग्रन्थ में चिन्ता प्रकट की गई है तथा हिन्दी और आंचलिक भाषाओं के साझे धरोहर की रक्षा करना इस ग्रन्थ लेखन का मुख्य उद्देश्य है. लेखक का कथन है ‘आधुनिक चकाचौंध में आंचलिक भाषाओं और बोलियों के शब्दकोष का आकार घट रहा है, दिन-प्रतिदिन शब्द मर रहे हैं, लोकोक्तियों और मुहावरों को लोग भूलते जा रहे हैं, विशिष्ट उक्तियों का लोप हो रहा है, भाषा की मूल अभिव्यक्ति क्षमता का ह्रास हो रहा है और हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं.

डॉ. पालीवाल के अनुसार भारत की सभ्यता और संस्कृति का संवाहक हिमालय है. इसी लोकमंगलकारी हिमालयीय संस्कृति के संस्कारों से उनकी साहित्य साधना भी विशेष रूप से प्रभावित है. so आज राष्ट्रीय धरातल पर हम कुमाउंनी भाषा-संस्कृति के जिस स्वरूप से परिचित हैं उसके मूल अनुसन्धाता और प्रतिष्ठापक के रूप में भी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है.

शिक्षा

हमारी अभिव्यक्ति में हमारी माटी की महक कम हो रही है. पलायन जैसे आज के ज्वलंत विषय पर डॉ. नारायणदत्त पालीवाल की मान्यता थी कि प्राचीन काल में पूरे देश से लोग धर्म और आस्था के चलते कभी गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों की तरफ़ पलायित होकर आये थे, कारण था देवभूमि के कण कण में बसे पौराणिक धार्मिक स्थल.but लेकिन आज चिंता की बात है कि पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों के लिये पलायन का जो दौर शुरू हुआ है उसमें लोगों के साथ-साथ हमारी संस्कृति का भी पलायन हो रहा है और लोकभाषा का क्षरण हो रहा है. उन्होने कहा कि राज्य के गठन के बाद संस्कृति और साहित्य से आंचलिकता गायब हो गई है. अब दोनों में ही महानगरीय संस्कृति झलकती है.

पालीवाल

डॉ. पालीवाल के अनुसार भारत की सभ्यता और संस्कृति का संवाहक हिमालय है. इसी लोकमंगलकारी हिमालयीय संस्कृति के संस्कारों से उनकी साहित्य साधना भी विशेष रूप से प्रभावित है. so आज राष्ट्रीय धरातल पर हम कुमाउंनी भाषा-संस्कृति के जिस स्वरूप से परिचित हैं उसके मूल अनुसन्धाता और प्रतिष्ठापक के रूप में भी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है.

हिन्दी

डॉ. पालीवाल हिन्दी की उपभाषा कुमाउंनी की butशब्द-सम्पदा के माध्यम से कुमाउंनी लोक संस्कृति के अनालोचित पक्षों को भी सामने लाने में सफल रहे जिसके कारण हिन्दी साहित्य का दायरा आंचलिक बोलियों और भाषाओं की सीमाओं तक विस्तृत होता गया. हिन्दी साहित्य जगत् में डॉ. पालीवाल की पहचान एक शब्द-स्रष्टा अथवा शब्द-शिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हुई.

नव

आज नव उपभोक्तावाद के इस युग में जब आंचलिक भाषाओं और जनपदीय संस्कृतियों पर पहचान खोने का भय मंडरा रहा हो तो ऐसे संकट काल में डॉ. नारायण दत्त पालीवाल की सारस्वत साधना but विशेष रूप से प्रासंगिक हो गई है. हिमालयीय संस्कृति के वेगों से प्रवाहित डॉ. पालीवाल का व्यक्तित्व और कृतित्व गंगा की धारा के समान निर्मल है जिसके ज्ञानाभिषेक से व्यक्ति और राष्ट्र दोनों ही गौरवान्वित होते है. डॉ. पालीवाल जी का योगदान चाहे वह राजभाषा हिन्‍दी की शब्दावली निर्माण का क्षेत्र हो या फिर कुमाऊनी साहित्य और संस्कृति के शोध, अनुसंधान और प्रचार प्रसार का क्षेत्र, उनका श्रेष्ठ और बहुमूल्य योगदान सदैव अविस्मरणीय ही रहेगा.

कुमाऊनी

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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