September 19, 2020
संस्मरण

‘हे दरी हिमाला दरी ताछुम’

  • डॉ. अमिता प्रकाश

“हे दरी हिमाला दरी ताछुम-ताछुमा-छुम.
दरी का ऐंगी सौदेर दरी ताछुम-ताछुमा-छुम”..

हाथों से एक दूसरे की बाँह पकड़कर घेरे में गोल-गोल घूमकर दो कदम आगे बढ़ाते हुए धम्म से कूदती हुई लड़कियों को देखकर छज्जे में बैठी मेरी नानी, मामी और दूसरी लड़कियों की दादी, बोडी (ताई), काकी (चाची) की टिप्पणियाँ हमें उस समय बहुत चिढ़ाती थीं, क्योंकि अक्सर वह अपने खेलों की तुलना हमारे खेलों से करती हुई हमें कमतर ही घोषित करतीं, हर पुरानी पीढ़ी की तरह यह कहते हुए कि “हमर जमाना म त इन्न नि होंदु छौ, या इन होंदु छौ” (हमारे जमाने में तो ऐसा होता था या ऐसा नही होता था.) और हम नयी पंख निकली चिड़ियाओं जैसे उत्साह में उनका मुँह चिढ़ातीं अक्सर कह उठतीं “अपड़ जमने र्छुइं तुम अफिम रैण द्यावा… हमल त इन्नी ख्यलण” (अपने जमाने की बातें तुम अपने ही पास ही रहने दो, हम तो ऐसी ही खेलेंगे). पीढ़ी के अंतर से उपजी यह मतभिन्नता हर समाज की थाती है. आज के वीडिओगेम, मोबाइल, लैपटॉप में गेम खेलती पीढ़ी के लिए हमारे खेल-खिलौने जैसे हास्यास्पद या दूसरी दुनिया के अजूबे  होते हैं, वैसी ही हमें भी उनके, खेल-खिलौने या उनकी बातें अजूबा सी लगतीं, और हम आश्चर्य से आज के बच्चों की भांति मुँह खुला छोड़कर पूछते “अच्छा!! इ न भी हुंदू छौ?” (अच्छा ऐसा भी होता था?) और फिर तो जैसे उन्हें अवसर मिल जाता अपने बचपन में लौटने का. लेकिन हम वहाँ कहाँ होती? हम फुर्र पुथै बनकर फुदकती रहती यहाँ-वहाँ. कभी इस चैक (आंगन) तो कभी उस चैक. वैसे गाँव का पंचैत चैक (पंचायत- चैक) ही ज्यादातर हमारे खेल का मैदान बनता, क्योंकि वह और चैकों से ज्यादा बड़ा और चैरस था.

पंचैत चैक आजकल बनने वाली सरकारी पंचायत घर का चैक नहीं था. वह तो बंसता मामा के घर का चैक था, चूंकि चैक बड़ा, खुला और चाहरदीवारी से घिरा नहीं था तो गाँव की पंचैत इसी चैक में हुआ करती थीं, इसलिए इसका नाम पंचैत चैक पड़ गया था, और पर्सनल चैक होते हुए भी यह सार्वजनिक चैक के रूप में ख्यात था तथा काम में लाया जाता था. वैसे हम लड़कियों के लिए सारे चैक सार्वजनिक थे. हमें तो सौभाग्य की पिटारी मानकर हर चैक स्वागत में पलक-पांवड़े बिछाये रखता था, हाँ हमारी कड़कड़ाहट (शोरगुल) और खितखिताहट (जोर से हँसना) से परेशान बड़े- बूढ़े जरूर हमें भागा देते थे, लेकिन ऐसा नहीं था कि केवल बड़े- बूढ़े ही हमें भगाते थे कभी-कभी जवान या हमउम्र साथी भी हम फुदकती घिंडण्यूं (गौरयाओं) के झुण्ड को अपनी डांट और गाली की कंकरिया मारने से पीछे नहीं हटते थे. यह बात अलग थी कि इसका कारण भी हमारी ही शरारतें होती थीं. ऐसी ही एक शरारत हम माला दीदी के साथ करते. गाते-नाचते हम “हिमाला दरी” को “हे माला ददी” (दादी) गाने लगते और ‘माला दीदी’ को यह बात कलेजे पर लग जाती. इसके बाद तो वह गाली के साथ-साथ सचमुच तब तक हमें बंदरों की तरह ढुंगाती (पत्थर फेंकती), रहती जब तक हम उसकी नजर से ओझल नही हो जाते. वैसे माला दीदी हमसे उम्र में बहुत बड़ी नही थी.

मैं और नीतू उस गिरोह की सबसे छोटी सदस्या थी, जिनके नाक से सींप (नाक बहना) अक्सर बहता रहता था तो इंदू और रजनी सबसे बड़ी सदस्या थी जो हमारे साथ खेलने के अतिरिक्त हमसे अपने छोटे-मोटे काम भी आदेश देकर या खड़ीक (घास का पेड़) के भूत से डराकर करवा लेतीं थी. काम भी बड़े मजेदार होते थे…

मैं और नीतू उस गिरोह की सबसे छोटी सदस्या थी, जिनके नाक से सींप (नाक बहना) अक्सर बहता रहता था तो इंदू और रजनी सबसे बड़ी सदस्या थी जो हमारे साथ खेलने के अतिरिक्त हमसे अपने छोटे-मोटे काम भी आदेश देकर या खड़ीक (घास का पेड़) के भूत से डराकर करवा लेतीं थी. काम भी बड़े मजेदार होते थे- गोर (जानवर) चराते समय उनके गोरों पर नजर रखना और जब लौटने का समय हो तो उनके गोरों को अपने गोरों के साथ रास्ते लगाना, या पानी की ढंड (ताल/पोखर) तक लाना, खेल के समय, विशेषकर घर-घर खेलते समय उनके सास या जवें (पति) बनने पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना या सास/जवें बनने पर उनकी खूब खिदमत (सेवा करना), हिंसालू-किल्मोड़े या बेड़ू के समय अपनी-अपनी पत्तल से उन्हें थोड़े-थोड़े खिलाना, यानी मुंबइया फिल्मी भाषा में  कहूँ तो दादाओं को रंगदारी  देने जैसा कुछ. और बदले में वे हमें अपनी छत्रछाया में रखती. इंदू और रजनी दोनों हमउम्र थीं और मुझसे चार साल बड़ी थीं. माला दीदी, उनसे दो-तीन साल बड़ी रहीं होंगी लेकिन वह गाँव की सब लड़कियों से बिलकुल अलग-थलग रहतीं. शांत गंभीर बस छज्जे के एक कोने पर बैठकर पता नहीं अपने कपड़ों में क्या खोजती रहती? विशेषकर एक हाथ उनका पजामें के अंदर ही रहता. उनके छज्जे का वह कोना हमारे घर की चैक के किनारे बने छवंणु (झूठे बर्तन रखने व धोने का स्थान) से दिखता था और इसी आधार पर मेरी नानी की नजरों में माला ढंग की लड़की नहीं थी. हमें उससे ज्यादा मेल-जोल नहीं रखना चाहिए था पर हम कहाँ मानने वाले थे? माला दी के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते कि कैसे भी वह हमारे गिरोह में शामिल हो जाय, पर….. और जब हमारे प्रयासों पर पानी फिर गया तो हमने अपनी खीज उतारने का यह तरीका अपना लिया. इधर-उधर तो नहीं लेकिन जिस भी शाम को हम उनकी चैक या रजनी लोगों के चैक में खेलते, तो अपने खेल के अंतिम पड़ाव में अपनी हार को, हार न मानने की जिद में हम माला दीदी को चिढ़ाने के लिए शुरू हो जाते

“हे ददी (दीदी) हे माला ददी ताछुम-ताछुमा छुम.
भैर तेरा ऐगी सौदेर ददी ताछुम-ताछुमा छुम॥
(बाहर तुम्हारे ग्राहक आ गये हैं.)

दे जाला द्वी कखणी मोल ददी ताछुम-ताछुमा छुम॥“
(दो खीरे में तुम्हे खरीद ले जायेंगें.)

और इतना सुनते ही माला दीदी, जो हमसे छुपकर घर के अंदर बैठी होती थी, अचानक से प्रकट होकर हमारे ’पितर-पूजने’ लगती (गाली देने लगतीं)-

हे रांडा छोरियूं, म्वारलू तुम्हारु मुर्दा, तुमथै लि जाला सौदेर ….(गालियां…) लेकिन उनकी गालियों में जो लयात्मकता होती, उसी से लय मिलाते हुए हम गीत के बोलों को मोड़ लेते-

“रांडा की छोरी माला ददी ताछुम-ताछुमा छुम..
म्वारा लू तुमरू म्वर्दा छोरी ताछुम-ताछुमा छुम..

फिर तो माला दीदी जो विकराल रूप धरती! उनके हाथ जो पड़ता उसी को फेंककर मारती. एक बार उन्होंने लोहे का बंस्तुल्या (फूकनी) फेंक दिया, जो सीधे नीतू के नाक पर लगा. हमारे कुछ समझ में आने से पूर्व ही नीतू की नाक से खून का फौव्वारा-सा फूट पड़ा और वह वहीं बेहोश हो गयी. पूरे ख्वाल (मोहल्ले) में हो हल्ला मच गया. माला दीदी को तो सिर्फ उनकी माँ ने डाँटा लेकिन हम पर तो सब टूट पड़े. कई  लोगोें ने बहती गंगा में हाथ धोने की गरज से कई-कई दिनों की शिकायतों का पिटारा खोल दिया, और हमारे बहुत बिगड़ने की सार्वजनिक घोषणा कर दी गई. इस घटना के बाद कई दिनों तक हम माला दीदी या उनके चैक के आस-पास फटकने की हिम्मत भी नहीं कर सके थे,  हा इंदू ने अपनी श्रारतें नहीं छोड़ी. वह हम सबमें से ज्यादा खिलदंड़ और शरारती थी. वह जब भी उस रास्ते आती-जाती जोर से चिल्लाती- ’’हे माला ददी’’ और सरपट दौड़ लगा देती.

हमारी धमाचैकड़ी ही नहीं उसकी शांति भी गुरुजी के जी का जंजाल थी. गुरुजी बहुत प्रयास करते थे कि वह भी अन्य लड़कियों की तरह खेले-कूदे, हेसे-बोले लेकिन उसने तो जैसे न बोलने की कसम ही खा ली हो. शुरू में वह चाय बनाती थीं गुरुजी के लिए, संभवतः इसके पीछे भी गुरूजी की यही मंशा थी कि वह इस बहाने ही सही उनसे बोले, किन्तु वह उससे “गुरजी च्याई” से अधिक कभी कुछ नहीं बुलवा पाए.

माला दीदी के लिए उनकी माँ ही उनका सारा संसार थीं. सांवली से भी गहरी रंगत लिए हुए दीदी सामान्य लड़कियों की तरह बिल्कुल नहीं थी. माँ, सुमित्रा मैं (मामी) भी शांत और गंभीर ही थीं किन्तु दुनियादारी ने उन्हें जरूरत, समय व परिस्थिति अनुसार बोलना-बतियाना, उठना-बैठना और हँसना-खेलना सिखा दिया था,किन्तु माला दीदी जो अभी दुनियादारी से कोसों दूर थीं, उन्हें मैंने कभी हंसते हुए मो बहुत दूर मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था. मुझे याद है कि जब मैंने प्राथमिक पाठशाला चैडूधार में प्रवेश लिया था उस समय वह कक्षा तीन में थी. सबसे लम्बी, सबसे बड़ी, सबसे शांत, सबसे बुद्धू और गुरुजी के शब्दों में ‘ढांट’. कक्षा में तो क्या हमने उन्हें रास्ते में आते-जाते समय या इंटरवल (रेसेस) में भी कभी किसी से बोलते नही सुना था. हमारी धमाचैकड़ी ही नहीं उसकी शांति भी गुरुजी के जी का जंजाल थी. गुरूजी बहुत प्रयास करते थे कि वह भी अन्य लड़कियों की तरह खेले-कूदे, हेसे-बोले लेकिन उसने तो जैसे न बोलने की कसम ही खा ली हो. शुरू में वह चाय बनाती थीं गुरुजी के लिए, संभवतः इसके पीछे भी गुरूजी की यही मंशा थी कि वह इस बहाने ही सही उनसे बोले, किन्तु वह उससे “गुरजी च्याई” से अधिक कभी कुछ नहीं बुलवा पाए. चाय बनाने की उस विशिष्टता के लिए माला दी प्रशंसित ही नहीं होती थी बल्कि हमसे दूरी बनाए रखने का ठोस कारण भी उनको मिल गया था. गुरूजी शायद इस बात को भांप चुके थे, इसलिए अगले साल गुरुजी ने उन्हें इस पद से भी च्युत कर दिया. और उनके चेहरे पर उस समय उभरने वाली गर्वित मुस्कान की क्षीण रेखा भी विलुप्त हो गई.

दो साल बाद उन्होंने स्कूल ही छोड़ दिया था, हाँ उनको फेल करने के लिए गुरुजी ने सुमित्रा मैं (मामी) की खूब गालियाँ खाईं थीं. चूंकि गुरुजी गाँव के ही थे, इसलिए इस तरह की घटनाएं अकसर होती रहती थीं. यहाँ तक कि एक बार तो एक ननी (नानी) ‘घात’ ड़ाल गई गुरुजी के लिए (घात डालना- दुश्मन के अनिष्ट हेतु ईष्ट देवताओं को पुकारना). उसी दिन मामी को कांपती आवाज से जब मैंने सुना कि “बिना बुबा की नौनी थै अर बिना गुसें का गोरू थै इन हकाणा वळा कु कभि भल्लु नी ह्वे सकदू” (बिना पिता की लड़की और बिना चरवाहे के जानवरों को दुत्कारने वाले का कभी भला नहीं हो सकता), तब मुझे पता चला कि माला दीदी की पिताजी नहीं हैं. घर पर जब नानी से पूछा तो पता चला कि वह असम राइफल्स में फौजी थे और वहाँ उनको एक “लाइलाज रोग” लगा था, जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई थी. नानी ने भेद भरे स्वर में मेरे कानों में फुसफुसाया- “ तबि त मि ब्वलदु कि वह ढंगै नौनी नी च वीं से दूर रै कारा तुम” (तभी तो मैं बोलती हूँ कि वह अच्छी लड़की नहीं है, उससे दूर रहा करो तुम). उस दिन से मेरे बालमन पर भी न जाने क्या असर पड़ा कि मैं माला दी को बड़ी अजीब तरह से देखने लगी. उस ‘अजीब’ में संभवतः ड़र भी था और करुणा भी. माला दीदी और सुमित्रा मैं (मामी) दो प्राणियों के इस परिवार की सीमित आवश्यकताएं गाँव वालों के सहयोग के बिना भी पूरी हो जाती थीं.

“लाइलाज बीमारी” के भय ने भी दोनों पक्षों को मजबूर कर दिया था दूर-दूर रहने के लिए. तब बीमारी चाहे टी० बी० हो, मलेरिया हो या कोई और सब लाइलाज और छूत की ही होती थीं. माला दीदी के उस शांत चेहरे के पीछे छिपे तूफान को मैं आज तो महसूस कर सकती हूँ, लेकिन तब इतनी अक्ल कहाँ थी? काश आज मुझे वह कहीं मिल जाती और मैं उनसे गले लगकर अपनी उदण्डताओं की क्षमा मांग पाती, लेकिन सोचा हुआ पूरा होता कब है?

“लाइलाज बीमारी” के भय ने भी दोनों पक्षों को मजबूर कर दिया था दूर-दूर रहने के लिए. तब बीमारी चाहे टी० बी० हो, मलेरिया हो या कोई और सब लाइलाज और छूत की ही होती थीं. माला दीदी के उस शांत चेहरे के पीछे छिपे तूफान को मैं आज तो महसूस कर सकती हूँ, लेकिन तब इतनी अक्ल कहाँ थी? काश आज मुझे वह कहीं मिल जाती और मैं उनसे गले लगकर अपनी उदण्डताओं की क्षमा मांग पाती, लेकिन सोचा हुआ पूरा होता कब है? न तब माला दी ने कभी मौका दिया, न अब कोई अवसर मेरे पास है, उन्हें बताने का कि ’’माला दी हम तो बस तुम्हारा साथ चाहते थे, तुम्हें परेशान या दुखी करना कभी भी हमारा उद्देश्य नहीं था. पर सच बताऊँ माला दी आप आज भी मेरे बहुत करीब हो. पता नहीं क्यों जब कभी उदास होती हूँ तो अपने में आपको ही पाती हूँ.

(लेखिका रा.बा.इं. कॉलेज द्वाराहाट, अल्मोड़ा में अंग्रेजी की अध्‍यापिका हैं)

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