समसामयिक

गधेरों से उठता सिर्फ धुआँ…

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ के गाँव महामारी के कई रूपों से लड़ रहे हैं. स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का आलम सरकार दर सरकार दर जर्ज़र होता गया. तहसील और जिले के अस्पतालों में डॉ. के नाम रेफर बाबू हैं और दवा के नाम पर कैल्शियम की गोलियां. अखबारों में अस्पताल के अभाव में दम तोड़ते लोग, प्रसव पीड़ा में रास्ते में ही बच्चे को जन्म देती because माताओं की तस्वीरें छपती रही हैं लेकिन हमारे हुक्मरानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. विधायक से लेकर सांसद तक दून और दिल्ली में मौज करते रहे . हमारे इलाके के सांसद महोदय को लोग पहचानते भी नहीं  है. वह भी इलाके को नहीं पहचानते हैं .

सूर्य देव

उत्तराखंड में कोरोना के कारण काल के गाल में समाए because लोगों का अंतिम संस्कार कुछ इस तहर हो रहा है. फोटो : विनोद कापड़ी

पिछले साल मेरी ईजा पर सुअर ने हमला कर दिया था. उनके इलाज के लिए मैं भिकियासैंण, चखुटिया और रानीखेत के सरकारी अस्पतालों में गया और वहाँ जो स्थिति देखी वह भयावह थी. उसके बाद कई तहसीलों में जाकर अस्पतालों पर लिखा भी लेकिन उससे किसको क्या फर्क पड़ना था. हमारी तहसील भिकियासैंण है और वहाँ because एक सरकारी अस्पताल है. गाँव से 4 किलोमीटर पैदल और फिर 15 किलोमीटर बस में जाने के बाद भिकियासैंण आता है. उस अस्पताल के जिम्मे लगभग 70 से 80 गांवों का भार है लेकिन वहाँ आपको डॉ. के नाम रजिस्टर पर इंट्री करने वाली एक नर्स, रेफर करने वाले एक डॉ. और बुखार देखने वाले एक बड़े डॉ. मिलेंगे जिनको भी घर से बुलाना पड़ता है.

हॉस्पिटल में  एक्स-रे खराब, कोई जांच नीचे प्राइवेट से करा लो, अल्ट्रासाउंड है नहीं, तो रेफर कर दो रानीखेत या दिल्ली के लिए. यही स्थिति कमोबेश सभी अस्पतालों की है because लेकिन राजनीति करने वालों के लिए कभी यह मुद्दा नहीं रहा. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारे सांसद और विधायक ने कभी उस अस्पताल को देखा तक नहीं होगा.

सूर्य देव

हॉस्पिटल में  एक्स-रे खराब, कोई जांच नीचे प्राइवेट से करा लो, अल्ट्रासाउंड है नहीं, तो रेफर कर दो रानीखेत या दिल्ली के लिए. यही स्थिति कमोबेश सभी अस्पतालों की है because लेकिन राजनीति करने वालों के लिए कभी यह मुद्दा नहीं रहा. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारे सांसद और विधायक ने कभी उस अस्पताल को देखा तक नहीं होगा.

सूर्य देव

आज स्थिति विकराल हो गई है. गाँव के गाँव बीमार हैं. उनको पूछने वाला कोई नहीं है. आपस में ही इसके उसके पास से जो दवा मिल रही है उसे खा रहे हैं और चल रहे हैं. जो नहीं चल पा रहे हैं वो ‘चल बस’ रहे हैं. न कोई टेस्ट है न दवा.

पहाड़ के जिन गधेरों और खेतों because से घसियारियों की नोक- झोंक और खिलखिलाहट सुनाई देती थी, बच्चों के खेलने की आवाज आती थी. आज उन गधेरों से सिर्फ धुआँ उठ रहा है.  सिर्फ धुआँ…

सूर्य देव

(लेखक हिमांतर के कार्यकारी because संपादक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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