October 30, 2020
संस्मरण

ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—38

  • प्रकाश उप्रेती

‘ओ…हरिये ईजा ..ओ.. हरिये ईज… त्यूमर कुड़ी मथपन आग ए गो रे’ (हरीश की माँ… तुम्हारे घर के ऊपर तक आग पहुँच गई है). आज बात उसी- “जंगलों में लगने वाली आग” की. मई-जून का महीना था. पत्ते सूख के झड़ चुके थे. पेड़ कहीं से भी खूबसूरत नहीं लग रहे थे. चीड़ के पेड़ों से ‘पिरूहु’ (चीड़ की घास) झड़ कर रास्तों और जंगलों में फैल गया था. रास्तों में इतनी फिसलन कि चलना मुश्किल हो रहा था. हर जगह पिरूहु ही पिरूहु था.

ईजा जब भी घास काटने जाती ‘दाथुल’ (दरांती) या लाठी से पिरुहु को रास्ते से हटातीं चलती थीं. यह उनका रोज का काम था. ईजा के साथ सूखी लकड़ी लेने हम भी जाते थे तो ईजा कहती थीं- “भलि अये हां, इनुपन पिरूहु है रो रडले” (ठीक से आना, इधर चीड़ की घास बिखरी पड़ी है, फिसलना मत). हम संभल-संभल कर चलते थे. कई बार तो ‘घस-घस’ फिसल भी जाते थे. ईजा पीछे से कहतीं-भलि..भलि (ठीक से). हम फिर उठते और चलने लगते थे. उन दिनों यह एक तरह से रोज का नियम सा हो गया था.

‘अरे दीदी पार देखो ढैय् ऊ बिनोलिक जंगोंपन बे इथेहें आग आगे’. पूरा जंगल भयंकर आग की लपटों की जद में था. 10-10 फीट ऊंची लपटें उठ रही थीं. कच्चे आम के पेड़ तो फड़… फड़.. कर कुछ देर में ही स्वाहा हो जा रहे थे. ईजा जंगल को देखती ही रह गई. तभी ईजा ने बिमला चाची से पूछा- “यो आगो काल लगानोल, देखि ढैय् कच्च आमो डव ले जल गई”

इन दिनों ईजा के पास बहुत काम होते थे. खेतों को साफ करना, ‘अड्या’ (खेत की सूखी कटी झाड़ियाँ) जलाना, हल के साथ खेत में बीज बोने जाना और सूखी लकड़ियां इकट्ठी करना. एक तरह से सुबह से शाम तक ईजा ‘टक-टक’ लगी रहती थीं. ईजा शाम को ‘ठुल पटोम’ (बड़े खेत में) में ‘अड्या’ जला रही थीं. तभी ऊपर खेत में काम कर रहीं ‘कमला’ की ईजा ने कहा-

ओ दी..(ओ दीदी), नीचे के खेत से ईजा ने उत्तर दिया-

‘होय बिमला’, क्या,

‘अरे दीदी पार देखो ढैय् ऊ बिनोलिक जंगोंपन बे इथेहें आग आगे’ ( दीदी सामने देखो वहाँ वो बिनोली के जंगल से इधर को आग आ रही है). पूरा जंगल भयंकर आग की लपटों की जद में था. 10-10 फीट ऊंची लपटें उठ रही थीं. कच्चे आम के पेड़ तो फड़… फड़.. कर कुछ देर में ही स्वाहा हो जा रहे थे. ईजा जंगल को देखती ही रह गई. तभी ईजा ने बिमला चाची से पूछा- “यो आगो काल लगानोल, देखि ढैय् कच्च आमो डव ले जल गई” ( ये आग किसने लगाई होगी, देख कच्चे आम के पेड़ भी जल गए हैं).

ईजा एक टक जंगल की तरफ देख ही रही थीं. कुछ देर की शांति के बाद बिमला चाची ने कहा- ” दीदी काले पटोपन अड्या जला बल, वति बति आग पकड़ ली, देखो ढैय् अब सबे जंगों में फैल गो” ( दीदी किसी ने खेतों की झाड़ियाँ जलाई वहीं से आग फैल गई, अब तो पूरा जंगल उसकी चपेट में आ गया है). ईजा ने खेत में अड्या जलाया और जब तक आग अच्छे से बुझ नहीं गई तब तक वहीं खड़ी रहीं. उसके बाद उसमें मिट्टी डाल कर आईं थी.

हर साल जंगलों में आग लगती थी. आसमान में कई दिनों तक धुँआ रहता था. जंगली जानवर भूख और प्यास के मारे घरों के आस-पास आ जाते थे. पालतू जानवरों के लिए घास की किल्लत हो जाती थी. हरी घास देखने को नसीब नहीं होती थी. ईजा सूखी घास दे- देकर ही काम चलाती थीं. जब भी ‘छन’ (गाय-भैंस बांधने की जगह)  जाती तो भैंस को कहतीं- “ले यई खा, जंगों में सारे आग लागि गो ,मैं कथां बे ल्यूँ तिहें हरी-परी” (ले यही खा, जंगल में सब जगह आग लग गई है, मैं कहाँ से तेरे लिए हरी घास लेकर आऊं). ऐसा कहते हुए ईजा की नज़र जंगलों की तरफ ही होती थी.

आग ऐसी लगती थी कि काबू में नहीं आती थी. जंगल में आग की लड़ी सी लगी रहती थी. हम रात में बाहर जाकर आग को देखते थे- “ईजा ऊ आगो रे हमर भ्योव हन” (मां वो आ गया हमारे जंगल में). ईजा भी आकर देखती थीं. जब-जब हवा तेज चलती, आग भी उसी गति से फैलती. कई बार ईजा कहतीं- “आज यो रात हैं घर तक आंछ हां” (रात तक ये घर ही पहुंच जाएगी). ऐसे में ईजा रात भर जगी रहती थीं. बार-बार जंगल और आग को देखती, फिर अंदर आ जाती, फिर थोड़ी देर में देखने बाहर जाती. कभी-कभी उनके पीछे हम भी चले जाते थे.

ईजा आवाज सुनते ही घबराकर बाहर गई तो देखा कि आग की लपटें ‘छन'(गाय-भैंस बांधने की जगह) तक आ चुकी थी. गाँव के सभी लोग भागे-भागे आए, कोई “तिमहुँ”  तो कोई मिट्टी से आग बुझाने लगे.. ईजा भी “तिमहुँ” (एक पेड़ के पत्ते) से आग बुझाने लगी. आग की तपन के बावजूद ईजा बीच-बीच में जाकर आग बुझा रही थीं. बड़ी मुश्किल से 1 घण्टे में आग शांत हुई थी.

परन्तु उस दिन तो भरी दुपहरी में आग बहुत तेजी से हवा के साथ नीचे को आ गई. सामने रहने वाली अम्मा ने आग को हमारे घर की तरफ आते हुए देखा तो जोर-जोर से आवाज लगाने लगीं-  “ओ हरियेक ईजा.. ओ हरिये ईज”(हरीश की माँ , हरीश की माँ ) . ईजा आवाज सुनते ही घबराकर बाहर गई तो देखा कि आग की लपटें ‘छन'(गाय-भैंस बांधने की जगह) तक आ चुकी थी. गाँव के सभी लोग भागे-भागे आए, कोई “तिमहुँ”  तो कोई मिट्टी से आग बुझाने लगे.. ईजा भी “तिमहुँ” (एक पेड़ के पत्ते) से आग बुझाने लगी. आग की तपन के बावजूद ईजा बीच-बीच में जाकर आग बुझा रही थीं. बड़ी मुश्किल से 1 घण्टे में आग शांत हुई थी. आग किसी आफ़त से कम नहीं होती.

इस बार पता चला की किसी ने बीड़ी पीकर माचिस की जली तिल्ली वैसे ही फेंक दी और उसने पिरूहु पर आग पकड़ ली. उस तिल्ली की आग ने कई गाँवों, जंगल और जानवरों को आग के हवाले कर दिया. हमारे घर तक भी उसी तिल्ली की आग आई थी.

हर साल पहाड़ों में आग लगती है. कभी कोई कारण तो कभी कोई कारण होता है. पिरूहु आग की जड़ है और लापरवाही आग का कारण. जंगलों में लगी आग जो देख ले उसे आग से ख़ौफ़ हो जाए..

जब से ईजा ने बताया तब से मेरी आँखों में आग ही आग है. ईजा के लिए फिर मुसीबत. अब कई रातों की नींद उनकी गायब हो जाएगी. कई जानवर, पक्षी और पेड़ इस आग की भेंट चढ़ जाएँगे. ईजा के दुखों में एक और पहाड़ जुड़ जाएगा. उनके लिए आग अविष्कार थोड़ा न है…

इस बार अभी तक जंगलों में आग नहीं लगी थी. ईजा बता रही थीं कि- “च्यला यो बार आग नि लागि रहो”(बेटा इस बार आग नहीं लगी है). यह बात बीते अभी कुछ ही दिन हुए थे लेकिन आज ईजा कह रही थीं- “च्यला यो साल ले लगा हे रे काले जंगोंपन आग” (बेटा इस साल भी किसी ने जंगल में आग लगा दी है). जब से ईजा ने बताया तब से मेरी आँखों में आग ही आग है. ईजा के लिए फिर मुसीबत. अब कई रातों की नींद उनकी गायब हो जाएगी. कई जानवर, पक्षी और पेड़ इस आग की भेंट चढ़ जाएँगे. ईजा के दुखों में एक और पहाड़ जुड़ जाएगा. उनके लिए आग अविष्कार थोड़ा न है…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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