चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

Chandani Dhar Pooja

 

तुंगनाथ घाटी : लोकज्ञान, पर्यावरण और विज्ञान का अद्भुत संगम

आशिता डोभाल

उत्तराखंड का पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के सहअस्तित्व का जीवंत दर्शन है। यहां की जीवनशैली में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन—इन ‘5 ज’ का गहरा रिश्ता है। यही कारण है कि पर्वतीय समाज ने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि संबंध माना है। इस संबंध की एक अनूठी मिसाल रुद्रप्रयाग जिले की तुंगनाथ घाटी में आज भी जीवित है—चांदणी धार पूजन।
विरासत में मिली पर्यावरण चेतना

तुंगनाथ बाबा का शीतकालीन प्रवास स्थल मक्कूमठ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। यह क्षेत्र वन आंदोलनों की भूमि रहा है। यहाँ की लोकमानस में गूंजने वाला नारा—

“मौण द्यौला पर बौण ना” (गर्दन कटवा देंगे, पर जंगल नहीं कटने देंगे) यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति समर्पण की घोषणा है।

यहां की लोकपरंपराओं के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका विशेष रही है। उन्होंने संस्कृति को केवल निभाया ही नहीं, बल्कि उसे जीवित रखा है। इन्हीं परंपराओं में एक है—चैत्र माह में आयोजित होने वाला चांदणी धार पूजन।

प्रकृति से संवाद की परंपरा

चैत्र के अंतिम सप्ताह में गांव के ऊपर स्थित एक ऊंची धार—जो गांव की सीमा भी मानी जाती है—पर यह पूजन होता है। वहाँ मौजूद ओखलनुमा पत्थर पर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। वन देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है और पक्षियों के लिए अन्न दान रखा जाता है। यह मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति से संवाद की एक सामूहिक प्रक्रिया है। महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पक्षियों से प्रार्थना करती हैं— “हे पक्षियों, तुम आओ। तुम्हारे बिना हमारा संसार अधूरा है, हमारे रीति-गीत अधूरे हैं। हम तुम्हें अन्न देंगे, तुम हमारी फसलों की रक्षा करना।”

लोकगीतों में बसे पक्षी

पर्वतीय लोकजीवन में पक्षियों का विशेष स्थान है। घुघुति को विरह और संवेदना का प्रतीक माना गया है। चैत्र का महीना, जिसे ‘खुदेड़ महीना’ भी कहा जाता है, घुघुति के बिना अधूरा समझा जाता है। कोयल की कूक ऋतु परिवर्तन का संकेत देती है, जबकि पहाड़ी मैना—‘सेन्टुला’—भी लोकगीतों में अपनी अलग पहचान रखती है। इन पक्षियों को लोकसंस्कृति में केवल जीव नहीं, बल्कि भावनाओं के वाहक के रूप में देखा गया है।

लोकज्ञान और विज्ञान का संगम

यदि इस परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो चैत्र माह में कई पक्षियों का देशांतरण (माइग्रेशन) होता है। वे ऊंचे और खुले स्थानों पर बैठना पसंद करते हैं। यदि उन्हें पर्याप्त अन्न उपलब्ध हो जाए, तो वे खेतों की फसलों को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुँचाते हैं। इस प्रकार चांदणी धार पूजन लोकज्ञान और पारिस्थितिकी समझ का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह परंपरा दर्शाती है कि पर्वतीय समाज ने सदियों पहले ही पारिस्थितिक संतुलन का सूत्र समझ लिया था—संरक्षण और सहअस्तित्व का।

जलवायु परिवर्तन के दौर में एक संदेश

आज जब पूरा हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, वन क्षरण और जैव विविधता संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में तुंगनाथ घाटी का यह छोटा-सा गांव एक बड़ा संदेश देता है। आधुनिक विकास की दौड़ में जहाँ प्रकृति का दोहन बढ़ा है, वहीं यहां की सामूहिक चेतना आज भी संतुलन बनाए हुए है। चांदणी धार पूजन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि यह स्मरण है कि मनुष्य अकेला नहीं है। प्रकृति, पक्षी और पर्यावरण के बिना जीवन अधूरा है।

यह विरासत बताती है कि यदि आस्था में पर्यावरण जुड़ जाए, तो संरक्षण आंदोलन बन जाता है—और जब लोकज्ञान में विज्ञान का समावेश हो जाए, तो परंपरा भविष्य का मार्गदर्शन करती है।

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