March 8, 2021
समाज/संस्कृति

आधुनिक ‘बुफे पद्धति’ और ‘कुक-शेफ़ों’ के बीच गायब होते ‘सरोला’

घरवात् (सहभोज)

  • विजय कुमार डोभाल

आज की युवा पीढ़ी होटल, पार्टी या पिकनिक पर जा कर सहभोज का आनन्द ले रही है क्योंकि यह पीढ़ी शहर में ही जन्मी, पली-बढ़ी, शिक्षित-दीक्षित हुई तथा शहरीकरण में ही रच-बस गई है. यह पीढ़ी अपने पहाड़ी जनमानस के सामाजिक कार्यों, उत्सवों और विवाहादि अवसरों पर दी जाने वाली दावतों (घरवात्) के विषय में अनभिज्ञ है. इस पीढ़ी के युवाओं को घरवात् की जानकारी दिए जाने का प्रयास किया गया है.

पहाड़ी समाज के जटिल जाति-भेद, ऊंच-नीच के कारण वर्ण-व्यवस्था का कठोरता से पालन किया जाता था. कच्ची रसोई (दाल-चावल) पकाने और परोसने के लिए कुछ उच्च कुलीन ब्राह्मणों को नियत किया गया जिन्हें “सरोला” कहा जाता है.

घरवातों (सहभोज) के पकाने, परोसने और खाने के कठोर नियम होते हैं. “रुसड़ा” (पाकशाला जो प्रायः अस्थाई छप्पर होता है) में सरोलाओं के अतिरिक्त कोई अन्य प्रवेश नहीं कर सकता है. इस समय (पकाने-परोसने) सरोलाओं को स्पर्श करना वर्जित होता है.

सामाजिक कार्यों (अवसरों) के अनुरूप भोज्य-सामग्री अलग-अलग प्रकार की होती है, विवाह और मुण्डन में मीठा (गुड़) भात, सफेद भात, उरद-राजमा की दाल तथा धात्री माताओं के लिए अरहर (बाजार की) दाल परोसी जाती है जबकि वार्षिक श्राद्ध, तेरहवीं या पित्रोड़ा में इनके साथ पुलाव (ब्रिंजी), कढ़ी (झोली), कद्दू का रायता और सब्जियाँ परोसी जाती हैं.

इन भोज्य-सामग्रियों को पकाने के लिए तांबे या पीतल की तौली, डेग और लोहे की बड़ी कढ़ाई प्रयोग में लाई जाती है. भोजन उपलब्ध बांज, खड़ीक या अन्य ईंधन की सहायता से तैयार होता है.

इन घरवातों (सहभोज) के पकाने, परोसने और खाने के कठोर नियम होते हैं. “रुसड़ा” (पाकशाला जो प्रायः अस्थाई छप्पर होता है) में सरोलाओं के अतिरिक्त कोई अन्य प्रवेश नहीं कर सकता है. इस समय (पकाने-परोसने) सरोलाओं को स्पर्श करना वर्जित होता है.

भोजन तैयार होने के बाद सहभोजियों को किसी आंगन या खेत में पंक्ति बद्ध पालथी मारकर बिठाया जाता है. ताजे मालू के पत्तों की पत्तल पर जब गरम दाल-भात परोसा जाता है तो उसे एक अद्भुत सुगंध उत्पन्न होती है.

पहली पंगत के भोजन कर चुकने के बाद पूरी पंगत एक साथ उठती है. दूसरी पंगत बिठाने से पहले उस स्थान को झाड़ू मार कर और गोबर-मिट्टी के घोल से छिड़काव करके शुद्ध किया जाता है. भोज के उपरांत सरोलाओं को “वृत्ति” देकर सम्मान विदा किया जाता है.

सरोला-पद्धति का कारण संभवतया यह रहा होगा कि एक बड़ी संख्या के लोगों के लिए भोजन पकाने-परोसने जैसा महत्वपूर्ण कार्य कुछ ही लोगों तक ही रहे ताकि भोजन की स्वच्छता व शुद्धता बनी रह सके.

वह सामाजिक समरसता, एकता, सहयोग और स्वाद आज हमारा अतीत बन गया है. यदि हम आज भी अपनी परंपरागत सह भोजन पद्धति अपनाएं तो यह नई पीढ़ी भी उसका आनंद लेकर लाभान्वित हो सकती है.

आधुनिक समय में घरवात् का स्थान “बुफे पद्धति” और सरोलाओं का स्थान कुक-शेफ़ों ने ले लिया है. पत्तल प्लेट में बदल गई, और पंगत का स्थान काक भोजों ने ले लिया है. क्या क्या बना था? क्या क्या खाया? खड़े-खड़े खाने से स्वाद का पता ही नहीं चलता है और अपने या दूसरों के कपड़ों पर दाल आदि गिरने का भय अलग से बना रहता है.

वह सामाजिक समरसता, एकता, सहयोग और स्वाद आज हमारा अतीत बन गया है. यदि हम आज भी अपनी परंपरागत सह भोजन पद्धति अपनाएं तो यह नई पीढ़ी भी उसका आनंद लेकर लाभान्वित हो सकती है.

(लेखक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं)

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