समाज

हाईस्कूल की पंच वर्षीय योजना

नीलम पांडेय नील, देहरादून

नब्बू, नाम था उसका, उसकी मां उसके नॉवेल के चित्रों से समझ जाती थी, बेटा किताब नहीं, नॉवेल पढ़ता है इसलिए नब्बू, अपनी नॉवेल पर अखबार की जिल्द चढ़ाने लगा था, तबसे मां समझने लगी, बेटा किताब पढ़ने लगा है. मां अकसर कहती थी, because मेरा नबुवा तो दिन रात, गुटके जैसी मोटी-मोटी किताब पढ़ कर इम्तहान देता है, लेकिन खप्तिये मास्टर इसको नंबर ही नही देते हैं. कई सालों से नबूवा हाईस्कूल में आगे ही नहीं बढ़ रहा था. फेल होने के बाद भी वो मुस्कराया करता था, उसकी मां उसे पूरा दिन गाली देती थी, पिता बात करना बन्द कर देते थे, लेकिन वो सब कुछ आराम से सुनते हुए उनके काम में हाथ बटाया करता था.

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कुछ दिनों बाद, जब स्थिति सामान्य हो जाती थी, बच्चे पास होकर अपनी नई किताबों में जिल्द लगा रहे होते थे, वो अपनी पुरानी फटी हुई किताबों को उसी जोश से सजाने लगता था. पुराने बैग को धोकर चमकाने लगता था. उन दिनों नई यूनिफॉर्म, because किताब  और बैग आने पर जो खुशी मिलती थी उसको बयां करना मुश्किल है, हालांकि किताबें बाजार से कम ही खरीदी जाती थी, सीनियर बच्चों से ही उनकी किताब मांग ली जाती थी, लेकिन वे किताबें भी हमारे लिए नयी ही होती थी. नए कपड़े के नाम पर यूनिफॉर्म ही समझ आती थी बाकि के नए कपड़े तो किसी विशेष काम पर या फट जाने पर ही बनते थे. नबुआ पनिशमेंट के तौर पर पुराने कपड़े,किताबें और बैग को खुशी से स्वीकार कर लेता था.

मैं रोते हुए हंसने लगी थी, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, शायद उन दिनों हमको किसी की उदासी को उदासी की तरह परिभाषित करना नहीं आता था. अंत में नब्बू, अपने भरे हुए गले से हसंते हुए चिल्लाया, दगड़ियों, मेरी हाईस्कूल की पंचवर्षीय योजना पूर्ण हुई अब अपुन मुंबई जाएगा. लोग उस पर जितना हंस सकते थे, खूब हंसे, वो खुद भी और मैं भी.

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अब उसकी उस सहजता और धैर्य पर मुझे ताज्जुब होता है, आजकल जब बच्चे एवम् युवा जरा सी असफलता अथवा कम नंबर आने के बाद बुरी तरह से टूट जाते हैं और खुद को असफल मानने लगते हैं. नबुआ किस मिट्टी का माधो था?  because जो हर बार रिजल्ट आने के बाद आखों में हल्की आंसुओं की परत को आसानी से छुपा कर मुस्कराया करता था. जब मैं छठी में थी, वो दसवीं में गया. मैं सातवीं में आई वो दसवीं में फेल हो गया, मैं आठवीं में आई, वो दसवीं में फेल हो गया, इसके बाद उसका स्कूल छूट गया लेकिन उसने प्राइवेट फॉर्म भरा फिर मैं नवीं में आई, वो दसवीं में फेल हो गया. अब मैं दसवीं में थी वो भी दसवीं में था .

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जिस दिन रिजल्ट आना था. नबुवा ही हाथ में अखबार लेकर घर के सामने ऊंचे खेत में खड़ा हो गया था. आसपास के लोग उसके ठीक नीचे वाले खेत में खड़े थे. उसने एक – एक कर रोल नंबर बोलने शुरू किए, मेरा नंबर because आते ही बोला तू भी फेल है, सुनते ही मैं जोर- जोर से रोने लगी, लेकिन मैं फर्स्ट आई थी. उन दिनों हाईस्कूल में फर्स्ट आना बहुत बड़ी बात होती थी. मैं रोते हुए हंसने लगी थी, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, शायद उन दिनों हमको किसी की उदासी को उदासी की तरह परिभाषित करना नहीं आता था. अंत में नब्बू, अपने भरे हुए गले से हसंते हुए चिल्लाया, दगड़ियों, मेरी हाईस्कूल की पंचवर्षीय योजना पूर्ण हुई अब अपुन मुंबई जाएगा. लोग उस पर जितना हंस सकते थे, खूब हंसे, वो खुद भी और मैं भी.

(लेखिका कविसाहित्यकार एवं पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहती हैं)

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