Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
यमुना घाटी के लाल CA अरविंद सिंह रावत बने आईसीएआई देहरादून के सचिव, CA अंकित गुप्ता अध्यक्ष निर्वाचित

यमुना घाटी के लाल CA अरविंद सिंह रावत बने आईसीएआई देहरादून के सचिव, CA अंकित गुप्ता अध्यक्ष निर्वाचित

देहरादून
 हिमांतर ब्यूरो, देहरादूनThe Institute of Chartered Accountants of India (आईसीएआई) की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल (सीआईआरसी) की देहरादून शाखा की नई कार्यकारिणी घोषित कर दी गई है। इसमें अंकित गुप्ता को अध्यक्ष तथा अरविंद सिंह रावत को सचिव निर्वाचित किया गया है। इसके अतिरिक्त, जस्मीत सिंह चौधरी को उपाध्यक्ष और प्रणय सेठ को कोषाध्यक्ष चुना गया है। वहीं, साहेब आनंद को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स स्टूडेंट्स एसोसिएशन (सीआईसीएएसए) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जबकि परिमल पटेट को कार्यकारिणी समिति का सदस्य मनोनीत किया गया है। नव-निर्वाचित अध्यक्ष अंकित गुप्ता ने सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नई कार्यकारिणी पेशेवर उत्कृष्टता को बढ़ावा देने, सतत शिक्षण कार्यक्रमों के संचालन और सदस्यों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता, सामूहिक नेतृत्व और ...
ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

देहरादून, साहित्‍य-संस्कृति, हिमालयन अरोमा
 फकीरा सिंह चौहान स्नेही वरिष्ठ कवि, गायक कलाकार तथा गीतकार ग्राम गोरछा, जौनसार जौनसारी विवाहित महिलाओं के सिर पर धारण किया जाने वाला ढांटु मात्र एक रंगीन कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि गौरव और गरिमा की पहचान है। जौनसार-बावर, रवांई-जौनपुर, बंगाण, बिनार तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सिर पर ढांटु बांधना केवल एक परिधान या आवरण नहीं, बल्कि मान-सम्मान, स्वाभिमान, मर्यादा और जिम्मेदारी का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ढांटु धारण करने की परंपरा विरासत, संस्कृति और नारीत्व की गरिमा को दर्शाती है। इसे नारी स्वाभिमान का मुकुट और सिर की शोभा माना जाता है। किसी के सामने सम्मानपूर्वक ढांटु उतारना विश्वास, जिम्मेदारी तथा क्षमा-याचना का अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। जौनसार-बावर क्षेत्र में विवाहित महिलाओं के लिए ढांटु धारण करना सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान और गौरव का प्रतीक है...
सौड़-सांकरी का देवगोत मेला: देव आस्था, मैती-धियाणी मिलन और लोक संस्कृति का भव्य संगम

सौड़-सांकरी का देवगोत मेला: देव आस्था, मैती-धियाणी मिलन और लोक संस्कृति का भव्य संगम

उत्तरकाशी
  देव आस्था, रिश्तों की गरमाहट और लोक संस्कृति का संगम नीरज उत्तराखंडीसौड़-सांकरी (मोरी),  उत्तरकाशी   हिमालय की शांत वादियों में जब ढोल-दमाऊ की थाप गूंजती है और रणसिंघा की ध्वनि देवदार के जंगलों से टकराकर लौटती है, तब समझ लीजिए कि पहाड़ में कोई बड़ा लोक उत्सव आकार ले चुका है. सीमांत विकासखंड मोरी के सौड़-सांकरी गांव में आयोजित देवगोत मेला और मैती-धियाणी मिलन कार्यक्रम ने इस बार भी आस्था, परंपरा और भावनाओं को एक सूत्र में पिरो दिया.लोक देवता सोमेश्वर महादेव के सानिध्य में सजे इस मेले की शुरुआत विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना और देवडोली के स्वागत के साथ हुई. मंदिर परिसर में उमड़े श्रद्धालुओं की भीड़, जयकारों की अनुगूंज और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर थाप ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. श्रद्धालुओं ने भगवान सोमेश्वर महादेव के श्रीचरणों में नमन कर क्षेत्र की सुख-सम...
उत्तराखंड के गांवों, कस्बों व शहरों में गूंज रही होली गायन की धूम

उत्तराखंड के गांवों, कस्बों व शहरों में गूंज रही होली गायन की धूम

नैनीताल
 सी.एम. पपनैं, भतरौंजखान (नैनीताल)रंगों का पर्व होली सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है. इसे होली, होलिका या होलाका के नाम से बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व उत्तर भारत में लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जबकि Manipur में यह उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है.बैठकी होली से होती है शुरुआत उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पौष माह से बैठकी होली की शुरुआत हो जाती है. बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक होली, पंचमी से महाशिवरात्रि तक अर्ध-श्रृंगारिक और उसके बाद पूर्ण श्रृंगार रस में डूबी होली गाई जाती है. बसंत पंचमी के साथ ही होल्यारों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है. महाशिवरात्रि से खड़ी होली प्रारंभ होती है और रंग एकादशी को चीर बांधी जाती है. इसके बाद होली का पर्व पूरे शबाब पर होता है. महिला और पुरुष समूह कदमताल...
 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

उत्तरकाशी
पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका की रीढ़ बना भेड़-बकरी पालन, हजारों परिवारों को मिल रहा सहारानीरज उत्तराखंडी, पुरोलापर्वतीय क्षेत्रों में खेती की सीमित जमीन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच भेड़-बकरी पालन पहाड़ की आर्थिकी और आजीविका की मजबूत रीढ़ बनकर उभरा है. सर बड़ियार क्षेत्र के दुर्गम गांवों में हजारों परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से सीधे जुड़े हुए हैं.आय और आत्मनिर्भरता का आधार विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ में छोटे और सीमांत किसानों के लिए भेड़-बकरी पालन कम लागत और शीघ्र आमदनी देने वाला व्यवसाय है.बकरी का दूध, मांस और खाद स्थानीय बाजार में आसानी से बिक जाते हैं. भेड़ों से ऊन का उत्पादन होता है, जो हस्तशिल्प और वस्त्र उद्योग में उपयोगी है. प्राकृतिक चरागाहों की उपलब्धता से चारे की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है.महिलाओं की बढ़ती भागीदारी...
उत्तराखंड में विलुप्त होती काष्ठ तकली और कंघी: पारंपरिक शिल्पकार देख रहे संरक्षण की राह

उत्तराखंड में विलुप्त होती काष्ठ तकली और कंघी: पारंपरिक शिल्पकार देख रहे संरक्षण की राह

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, पुरोलापारंपरिक काष्ठ शिल्प की एक अनमोल धरोहर आज गुमनामी की कगार पर है। बाज़ार में काष्ठ निर्मित तकली और कंघी बेचते हुए श्रीकोट (पुरोला) निवासी केशवानंद, पुत्र जीतराम, मिले—जो वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं।जिज्ञासावश जब उनसे पूछा गया कि ये तकली किस लकड़ी की बनी है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि तकली चुल्लू के पेड़ की लकड़ी से तैयार की जाती है, जबकि कंघी मोल यानी कैंथ की लकड़ी से बनाई जाती है। उनके अनुसार इन दोनों वस्तुओं को तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है। लकड़ी का चयन करना, उसे सुखाना, तराशना और फिर महीन घिसाई कर उपयोगी आकार देना—पूरी प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य होती है।केशवानंद बताते हैं कि पहले गांव-गांव में काष्ठ से बनी तकली और कंघियों की अच्छी मांग रहती थी, लेकिन अब प्लास्टिक और मशीन निर्मित वस्तुओं ने इन पारंपरिक ...
पुरोला में बीमार महिला को डंडी-कंडी से सड़क तक पहुंचाया, 108 से दून अस्पताल रेफर

पुरोला में बीमार महिला को डंडी-कंडी से सड़क तक पहुंचाया, 108 से दून अस्पताल रेफर

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, पुरोला  उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी के पुरोला विकासखंड स्थित सुदूरवर्ती ग्राम पंचायत सांखाल में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव की एक मार्मिक घटना सामने आई है. गांव की निवासी इन्द्री देवी का अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने पर ग्रामीणों को उन्हें डंडी-कंडी के सहारे कई किलोमीटर पैदल सड़क तक पहुंचाना पड़ा. सड़क सुविधा के अभाव में पैदल ले जानी पड़ी मरीज सांखाल गांव में मोटर मार्ग न होने के कारण परिजन और ग्रामीण इन्द्री देवी को डंडी-कंडी के सहारे घेडिया बैंड तक लेकर पहुंचे. ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों और संकरी पगडंडियों के बीच यह सफर जोखिम भरा रहा. ग्रामीणों ने बारी-बारी से डंडी संभालते हुए मरीज को सुरक्षित सड़क मार्ग तक पहुंचाया.स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय पर यह प्रयास नहीं किया जाता तो मरीज की स्थिति और गंभीर हो सकती थी. निजी वाहन से बर्निगाड़, फिर 108 एम्बुले...
होली हमारी समृद्ध लोक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक : मुख्यमंत्री

होली हमारी समृद्ध लोक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक : मुख्यमंत्री

चम्‍पावत
  खटीमा होली मिलन समारोह में उमड़ा जनसैलाब, मुख्यमंत्री ने जनसमुदाय संग साझा की उत्सव की खुशियांहिमांतर ब्यूरो, खटीमासनातन धर्मशाला रामलीला मैदान, खटीमा में आयोजित भव्य होली मिलन समारोह में पुष्कर सिंह धामी ने सहभागिता कर उपस्थित जनसमूह को होली की हार्दिक शुभकामनाएं दीं. इस अवसर पर उन्होंने पारंपरिक कुमाऊंनी होली, शास्त्रीय होली एवं थारू होली गायन में भाग लेकर जनसमुदाय के साथ उत्सव की खुशियां साझा कीं. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, परंपराएं और पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान के सशक्त आधार हैं. उन्होंने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सद्भाव, समरसता और आपसी भाईचारे का प्रतीक है. भावुक स्वर में उन्होंने कहा, “खटीमा मेरा घर है और खटीमावासी मेरा परिवार है. अपने परिवारजनों के बीच आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता ...
62 की उम्र में भी जोश बरकरार: पुरोला के वृजमोहन ने बर्फ से रचा रोजगार

62 की उम्र में भी जोश बरकरार: पुरोला के वृजमोहन ने बर्फ से रचा रोजगार

उत्तरकाशी
  20 रुपये की कटोरी, हजारों की आमदनी: पुरोला के बुजुर्ग की मिसालनीरज उत्तराखंडी, पुरोला उत्तरकाशीपुरोला के महरगांव निवासी 62 वर्षीय वृजमोहन सिंह रावत ने यह साबित कर दिया है कि यदि व्यक्ति में कुछ करने की लगन और स्वावलंबन के संस्कार हों, तो उम्र कभी भी बाधा नहीं बनती. जब एक ओर पुरोला में विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन चल रहा था, वहीं दूसरी ओर बाजार में सड़क किनारे परात में प्राकृतिक बर्फ को जायकेदार बनाकर बेचते वृजमोहन सिंह रावत लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे. वे न केवल स्वाद परोस रहे हैं, बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भरता का संदेश भी दे रहे हैं.जिज्ञासा वश पूछने पर उन्होंने बताया कि वे पुरोला में लगने वाले मेला-जातर में बर्फ बेचकर अच्छा खासा मुनाफा कमा चुके हैं. बर्फ लाना भले ही कठिन होता है, लेकिन मेहनत रंग लाती है. “शाम तक एक हजार से दो से ढाई हजार रुपये की बिक्री हो जात...
पगडंडी के सहरे विकास का सफर तय करने को मजबूर पोखरी गांववासी

पगडंडी के सहरे विकास का सफर तय करने को मजबूर पोखरी गांववासी

उत्तरकाशी
  पोखरी गांव नहीं पहुंचे सड़क सुविधा के पांवनीरज उत्तराखंडी, मोरी उत्तरकाशीजनपद उत्तरकाशी के सीमांत विकास खंड मोरी के पोखरी गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित है. ग्रामीण दुर्गम पंगड़ी के सहारे सफर करने को मजबूर हैं. यही वजह है कि बीते वीरवार को गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने की मांग को ग्रामीणों ने उपजिलाधिकारी मुकेश रमोला माध्यम से मुखमंत्री को ज्ञापन भेजा है, जिसमें ग्रामीणों ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सड़क स्वीकृत नहीं किए जाने पर आआंदोलन की चेतावनी दी है. ज्ञापन में कहा गया है कि मोरी क्षेत्र के दूरदराज क्षेत्र के अधिकांश गांव सड़क मार्च से जुड़ गए है. लेकिन तहसील मुख्यालय मोरी से महज 16 किमी दूरी पर स्थित 470 आबादी वाला पोखरी गांव आज तक सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से बंचित है. जिससे ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ज्ञापन में कहा गया है कि पड़ो...