आदि शंकराचार्य की नेपाल और बदरीनाथ यात्रा

  • ललित फुलारा

अद्वैत-वेदांत के प्रतिष्ठाता और संन्यासी संप्रदाय के गुरु आदि शंकराचार्य की जयंती पर उनकी नेपाल यात्रा और पशुपतिनाथ महादेव में पुन: पूजा अर्चना की व्यवस्था के बारे में जानना बेहद जरूरी है. but यह वह वक्त था जब नेपाल में पशुपतिनाथ महादेव की पूजा-अर्चना समाप्त हो गई थी. बौद्धों के असाधारण प्रभाव की वजह से हिंदू देवी-देवताओं का तिरस्कार किया जा रहा था. मंदिर की पवित्रता भ्रष्ट की जा रही थी.

बौद्धों

नेपाल के राजा वेद विरोधियों के सामने शक्तिहीन और निष्क्रिय हो चुके थे. यह समाचार जब आदि शंकराचार्य के शिष्यों को मिला तो चिंतित होते हुए उन्होंने भगवान शंकर के साक्षात अवतार but आचार्य शंकर से नेपाल चलने की प्रार्थना की और आर्चाय श्री नेपाल की तरफ चल पड़े. हिमालय की तराई की प्राकृतिक सौंदर्य और हिंसक जानवरों वाले भयंकर उतार-चढ़ाई वाले मार्ग एवं घनघोर जंगलों को पार करते हुए शंकराचार्य नेपाल पहुंचें.

नेपाल

शंकराचार्य ने खुद ही पशुपतिनाथ महादेव की भावपूर्ण स्तुति की. इसके बाद ध्यानमग्न होकर आत्मरूप में स्थित हो गए. दूसरी तरफ आचार्य के आगमन से बौद्धों में खलबली but मच गई. उनका साहस नहीं हुआ कि वो आचार्य के सामने आकर शास्त्रार्थ कर सकें. परिणामस्वरूप वे छिप-छिपकर नेपाल राज्य से बाहर भाग गए.

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सूर्यवंशी राजा शिवदेव ने आचार्य शंकर का भव्य स्वागत किया. यहां यह बात याद रखनी जरूरी है कि शंकर के नाम पर ही राजा शिवदेव ने अपने पुत्र का नाम शंकर देव रखा था. but शंकराचार्य के आशीर्वाद से ही राजा शिवदेव को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ था, तभी उसका नामकरण आदि शंकराचार्य के नाम पर हुआ. शंकर के नेपाल यात्रा के बारे में सुनकर सनातन धर्मियों में उत्साह की लहर दौड़ पड़ी. बौद्धों के प्रभाव से निष्क्रिय हुआ उनका धार्मिक उत्साह परिपूर्ण हो गया. आचार्य शंकर ने अपने शिष्यों को पशुपतिनाथ में पूजा-अर्चना में तत्पर होने का आदेश दिया. विधिवत पूजा-अर्चना शुरू हुई.

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शंकराचार्य ने खुद ही पशुपतिनाथ महादेव की भावपूर्ण स्तुति की. इसके बाद ध्यानमग्न होकर आत्मरूप में स्थित हो गए. दूसरी तरफ आचार्य के आगमन से बौद्धों में खलबली मच गई. उनका साहस but नहीं हुआ कि वो आचार्य के सामने आकर शास्त्रार्थ कर सकें. परिणामस्वरूप वे छिप-छिपकर नेपाल राज्य से बाहर भाग गए.

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देखते-देखते नेपाल वैदिक धर्म का सुदृढ़ गढ़ बन गया. शंकराचार्य की ही वजह से वैदिक सनातक हिंदू धर्म विघटित होने से बचा. शंकर ने चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना की जिनका लक्ष्य वेदांत का प्रचार-प्रसार रहा. इससे भारत में आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक सामंजस्य का महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हुआ. यह बात सही है कि शंकर के but समसामयिकों द्वारा रचित उनकी कोई भी जीवनी आज उपलब्ध नहीं है. किसी शिष्य द्वारा लिखी कोई जीवनी भी नहीं मिलती. उनके परवर्ती काल के पंडितों ने ही शंकराचार्य की जीवनी लिखी. शंकराचार्य के केवल दो ही प्राचीन जीवन चरित्र ‘वृहत् शंकर विजय’ और ‘शंकरदिग्विजय’ आज प्राप्त हैं. इनके आधार पर ही बाद में शंकर के जीवन पर बीसों ग्रंथ लिखे गए. जिस युग में शंकर अवतरित हुए वह आठवीं शताब्दी थी.

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शंकर विग्रह के स्थान पर शिला देखकर क्षुब्ध हुए. दुखी होकर मंदिर से बाहर निकले और ध्यान लीन हो गए. इसके बाद नारद कुंड की ओर अग्रसर हुए और कुंड के जल में but उतर गए. जब जल से बाहर निकले तो हाथ में नारायण की चतुर्भुज मूर्ति थी. देखा कि मूर्ति तो खंडित है. दाहिने हाथ की कुछ अंगुलियां टूटी हुई हैं. उस मूर्ति को शंकर ने अलकनंदा में विसर्जित कर दिया.

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जैन धर्म और बौद्ध धर्म के साथ ही but अनेक मतांतरों एवं संप्रदायों का बोलबाला था. जैन धर्म के मुकाबले बौद्ध धर्म ज्यादा शक्तिशाली सिद्ध हो रहा था. वैदिक धर्म को चारों तरफ से चुनौती मिल रही थी. तांत्रिक साधना चरम पर थी. तांत्रिकों में कपालिक मत सबसे प्रबल था जो कि उग्र शैव तांत्रिक संप्रदाय था.

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ये आदमी की खोपड़ी में खाते थे और मनुष्य की हड्डियों की माला पहनते थे. श्मशान ही कपालिकों का निवास स्थान हुआ करता था. कपालिकों का सरदार क्रकच था. ऐसे घनघोर वक्त में कालटी गांव में विद्याधर ब्राह्मण के यहां शंकर ने जन्म लिया. पुनवर्सु नक्षत्र, सूर्य, मंगल और शनि उच्च स्थान एवं गुरु केंद्रस्थ, वैशाख शुक्ल पंचमी, but रविवार को मध्याह विशिष्टा देवी ने तेजोपुंज बालक शंकर को जन्म दिया. शिवगुरु ने बालक का नामकरण कर शंकर नाम रखा. तीसरे साल में बालक का चूड़ाकर संस्कार संपन्न हुआ. बालक ने भू: भुव: स्व: का उच्चारण कर समस्त वेदों और वेदागों को पढ़ लिया.

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शंकर सात वर्ष में समस्त शास्त्रों में पारंगत हो गए. आचार्य गोविंदपाद से संन्यास ग्रहण किया. व्यास के पुत्र शुकदेव हुए और शुकदेव के शिष्य गौड़पादाचार्य हुए जिन्होंने आचार्य शंकर को दीक्षित किया. चाण्डाल वेश में भगवान विश्वनाथ ने शंकर को साक्षात दर्शन दिया. दक्षिण से शिष्यों के साथ उत्तर की तरफ यात्रा की और बदरीनाथ आए. but आचार्य ने शिष्यों सहित तप्तकुंड में स्नान किया और इसके बाद बदरीविशाल के मंदिर में नारायण का दर्शन करने गए. पर मंदिर में चतुर्भुज नारायण का विग्रह था ही नहीं. इस विग्रह को सत्ययुग में ऋषियों ने प्रतिष्ठित किया था. शालग्राम-शिला थी जिसकी पूजा-अर्चना होती थी.

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शंकर विग्रह के स्थान पर शिला देखकर क्षुब्ध हुए. दुखी होकर मंदिर से बाहर निकले और ध्यान लीन हो गए. इसके बाद नारद कुंड की ओर अग्रसर हुए और कुंड के जल में उतर गए. जब जल से बाहर निकले तो हाथ में नारायण की चतुर्भुज मूर्ति थी. देखा कि मूर्ति तो खंडित है. दाहिने हाथ की कुछ अंगुलियां टूटी हुई हैं. but उस मूर्ति को शंकर ने अलकनंदा में विसर्जित कर दिया. फिर से गोता लगाया और इस बार भी वे ही नारायण की मूर्ति हाथ में आई. ये भी टूटी हुई थी और अलकनंदा में बहा दी गई. तीसरी बार फिर डुबकी लगाई और ध्यान से देखा तो वो ही मूर्ति हाथ में थी. शंकर चिंता में पड़ गए हे नारायण ये कैसी आपकी माया है. उसी क्षण आकाशवाणी हुई कि कलयुग में इसी भग्न-विग्रह की पूजा-अचर्ना होगी.

संदर्भ ग्रंथ- आदि शंकराचार्य जीवन और दर्शन

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