यमुना की लहरों पर 2100 दीपों की रोशनी: हरिपुर-कालसी में आस्था से विकास तक नई शुरुआत

Yamuna staute in Haripur kalasi

 

माँ यमुना की प्रतिमा, हरिघाट और यमुना-कृष्ण मंदिर से मजबूत होगी कालसी की आध्यात्मिक पहचान; हनोल मास्टर प्लान के लिए ₹150 करोड़ की स्वीकृति ने जौनसार-बावर में धार्मिक पर्यटन और स्थानीय रोजगार की संभावनाओं को दिया नया आधार

  • हिमांतर वेब डेस्क, देहरादून

सांझ उतर रही थी। पहाड़ों के बीच बहती माँ यमुना की धारा पर आखिरी धूप ठहरने लगी थी। घाट पर साधु-संतों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा बढ़ रहा था। हाथों में छोटे-छोटे दीप लिए लोग यमुना तट की ओर बढ़ रहे थे। फिर एक-एक कर दीप जलने शुरू हुए और कुछ ही देर में हरिपुर-कालसी का यमुना तट 2100 दीपों की रोशनी से जगमगा उठा।

दीपों की लौ नदी की लहरों पर प्रतिबिंबित हुई तो पूरा तट मानो प्रकाश की चादर में लिपट गया। आरती के स्वर, माँ यमुना का जयघोष और दीपों की कतारों के बीच हरिपुर की वह शाम केवल एक धार्मिक आयोजन की साक्षी नहीं थी। यह जौनसार-बावर में आस्था, सांस्कृतिक विरासत और विकास को एक साथ जोड़ने की कोशिश की तस्वीर भी प्रस्तुत कर रही थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी यमुना तट पर दीप प्रज्ज्वलित किया। साधु-संतों, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के साथ उन्होंने माँ यमुना की आरती में भाग लिया और प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति एवं जनकल्याण की कामना की।

लेकिन इस आयोजन की कहानी केवल 2100 दीपों तक सीमित नहीं थी।

इसी दिन हरिपुर-कालसी को माँ यमुना की प्रतिमा, हरिघाट और प्रस्तावित माँ यमुना-कृष्ण मंदिर के रूप में ऐसी सौगातें मिलीं, जिन्हें आने वाले समय में इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जाएगा।

Maa Yamuna

यमुना के तट पर आकार लेता नया आध्यात्मिक केंद्र

मुख्यमंत्री धामी ने हरिपुर पहुंचकर माँ यमुना की प्रतिमा का अनावरण किया और नवनिर्मित हरिघाट का लोकार्पण किया। इसके साथ माँ यमुना-कृष्ण मंदिर का शिलान्यास भी किया गया।

कालसी की पहचान केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं है। जौनसार-बावर की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा यह इलाका अपने भीतर इतिहास, लोकजीवन, आस्था और प्रकृति की कई परतें समेटे हुए है। ऐसे में यमुना तट पर विकसित हो रही नई धार्मिक संरचनाओं को क्षेत्र की इसी पहचान को आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

माँ यमुना की प्रतिमा और हरिघाट श्रद्धालुओं के लिए एक व्यवस्थित धार्मिक स्थल उपलब्ध कराएंगे, वहीं प्रस्तावित माँ यमुना-कृष्ण मंदिर इस क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।

मुख्यमंत्री धामी ने भी कालसी को इतिहास, आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की भूमि बताते हुए इन परियोजनाओं को क्षेत्र की आध्यात्मिक पहचान मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

2100 दीप और एक सांस्कृतिक संदेश

उस शाम हरिघाट पर सबसे आकर्षक दृश्य 2100 दीपों का था।

एक साथ इतनी बड़ी संख्या में दीप प्रज्ज्वलित होने के बाद घाट का दृश्य बदल गया। आरती के स्वर और माँ यमुना के जयघोष के बीच दीपों की रोशनी दूर तक फैली दिखाई दी। मुख्यमंत्री के साथ साधु-संतों और स्थानीय जनसमूह ने भी दीप जलाए।

यह आयोजन उस परंपरा की ओर भी संकेत करता दिखाई दिया, जिसमें नदियां भारतीय जीवन में केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति की संवाहक रही हैं।

‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम को भी इसी भाव से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रम में दीप प्रज्ज्वलन को प्रदेश की सुख-समृद्धि और जनकल्याण की कामना से जोड़ा गया।

मुख्यमंत्री के अनुसार, ऐसे आयोजन सनातन परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने और प्रदेश की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने में भूमिका निभा सकते हैं।

हरिपुर का आयोजन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण था कि यहां धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ क्षेत्र के भविष्य के विकास की तस्वीर भी सामने रखी गई।

हरिपुर से हनोल तक धार्मिक पर्यटन का नया गलियारा

कालसी से आगे बढ़ने पर जौनसार-बावर की पहाड़ियों में कई ऐसे स्थल मिलते हैं जिनकी पहचान धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से जुड़ी हुई है। इनमें हनोल और लाखामंडल विशेष स्थान रखते हैं।

अब सरकार इन स्थलों को बेहतर पर्यटन सुविधाओं के साथ विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

इसी क्रम में हनोल मास्टर प्लान के लिए ₹150 करोड़ की स्वीकृति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस राशि के माध्यम से धार्मिक पर्यटन से जुड़ी अवस्थापना सुविधाओं का विकास किया जाना है, ताकि हनोल पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

इसके साथ लाखामंडल और जौनसार-बावर के दूसरे ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों के सौंदर्यीकरण तथा आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने पर भी काम करने की बात कही गई है।

इन योजनाओं का व्यापक अर्थ केवल नए निर्माण तक सीमित नहीं है। यदि कालसी, हनोल और लाखामंडल जैसे स्थलों को एक सुव्यवस्थित धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित किया जाता है, तो इसका प्रभाव उन गांवों और कस्बों तक भी पहुंच सकता है जो इन स्थलों के आसपास बसे हैं।

जब तीर्थयात्री आएंगे तो स्थानीय बाजार भी बढ़ेगा

धार्मिक पर्यटन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी स्थानीय समुदाय है।

किसी धार्मिक स्थल पर आने वाला यात्री केवल मंदिर या घाट तक नहीं जाता। उसे ठहरने की जगह चाहिए, स्थानीय परिवहन चाहिए, भोजन चाहिए और अक्सर वह उस क्षेत्र से जुड़ी कोई स्मृति या स्थानीय उत्पाद भी अपने साथ ले जाना चाहता है।

यहीं से पर्यटन और स्थानीय आर्थिकी का संबंध शुरू होता है।

जौनसार-बावर जैसे पर्वतीय क्षेत्र में धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का विस्तार होमस्टे के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। स्थानीय व्यंजन, हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पाद, परिवहन सेवाएं और छोटे व्यवसाय भी इससे जुड़ सकते हैं।

सरकार भी विकास की योजनाओं को इसी दृष्टि से देख रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पर्यटन स्थलों के विकास का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचाना प्राथमिकता है। पर्यटन गतिविधियां बढ़ने से स्थानीय युवाओं और उद्यमियों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस दृष्टि से हरिपुर-कालसी में हो रहा विकास केवल एक घाट या मंदिर की कहानी नहीं रह जाता। इसका दूसरा पहलू पहाड़ में रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ जाता है।

विकास के बीच विरासत बचाने की चुनौती

जौनसार-बावर की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विशिष्टता है।

यहां की लोक संस्कृति, रीति-रिवाज, पारंपरिक वास्तुकला, पर्व-त्योहार और प्राकृतिक सौंदर्य इसे उत्तराखंड के दूसरे क्षेत्रों से अलग पहचान देते हैं। पर्यटन के विस्तार के साथ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी रहेगा कि आधुनिक सुविधाओं का विकास इस स्थानीय पहचान को सुरक्षित रखते हुए किस तरह किया जाए।

राज्य सरकार ने विकास के साथ इस सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी प्राथमिकता देने की बात कही है।

यह संतुलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धार्मिक पर्यटन तभी किसी क्षेत्र की दीर्घकालिक ताकत बन सकता है, जब उसकी मूल सांस्कृतिक पहचान आकर्षण का केंद्र बनी रहे।

हनोल, लाखामंडल और कालसी जैसे स्थलों के लिए आधुनिक सुविधाओं और पारंपरिक स्वरूप के बीच यही संतुलन आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण होगा।

चारधाम से आगे उत्तराखंड के आध्यात्मिक भूगोल की तलाश

उत्तराखंड का नाम आते ही चारधाम यात्रा की तस्वीर सबसे पहले सामने आती है। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री राज्य की धार्मिक पहचान के सबसे बड़े केंद्र हैं।

लेकिन उत्तराखंड का आध्यात्मिक भूगोल इससे कहीं व्यापक है।

पहाड़ों और घाटियों में अनेक प्राचीन मंदिर, लोकदेवताओं से जुड़े स्थल और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक केंद्र मौजूद हैं। जौनसार-बावर का क्षेत्र भी इसी विरासत का हिस्सा है।

राज्य सरकार की कोशिश चारधाम के साथ ऐसे पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को भी बेहतर सुविधाओं से जोड़ने की है। कालसी, हनोल और लाखामंडल को विकसित करने की योजनाएं इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में उत्तराखंड के धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों के विकास को नई गति मिली है। सरकार का लक्ष्य राज्य की आस्था और आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ते हुए उसे स्थानीय विकास और रोजगार का आधार बनाना है।

और यमुना की लहरों पर झिलमिलाते रहे दीप…

रात गहराने लगी थी, लेकिन हरिपुर के यमुना तट पर रोशनी कम नहीं हुई थी।

घाट पर जल रहे 2100 दीपों की लौ यमुना की बहती धारा में लगातार झिलमिला रही थी। आरती समाप्त हो चुकी थी, लेकिन उसकी आध्यात्मिक अनुभूति वातावरण में बनी हुई थी।

माँ यमुना की प्रतिमा, नया हरिघाट और भविष्य में आकार लेने वाला माँ यमुना-कृष्ण मंदिर—इन सबके बीच हरिपुर-कालसी अपने पुराने सांस्कृतिक स्वरूप को सहेजते हुए एक नई पहचान की ओर बढ़ता दिखाई दिया।

हनोल के लिए ₹150 करोड़ का मास्टर प्लान और लाखामंडल सहित जौनसार-बावर के अन्य धार्मिक स्थलों के विकास की योजनाएं इस कहानी को हरिपुर के घाट से आगे ले जाती हैं।

उस शाम यमुना की लहरों पर पड़ती 2100 दीपों की रोशनी शायद इसी संगम का सबसे प्रभावी दृश्य थी—एक ओर सदियों पुरानी आस्था और विरासत, दूसरी ओर पर्यटन, रोजगार और विकास की नई संभावनाएं।

कार्यक्रम में विधायक मुन्ना सिंह चौहान, सचिव रणवीर सिंह चौहान, अपर सचिव बंशीधर तिवारी, परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि, अन्य जनप्रतिनिधि, विभिन्न साधु-संत और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

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