

डॉ देवी लाल
असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
देवभूमि उत्तराखंड की मनोरम वादियां, जहाँ हवाएं परिवर्तन और आकांक्षाओं की सुधबुधाहाट लिए बहती है, वहां एक नाम देवभूमि की राजनीती में बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है – भगत सिंह कोश्यारी एक अनुभवी राजनीतिज्ञ, शिक्षक, पत्रकार, और संघ विचारक, कोशियारी जी का बागेश्वर जिले के एक छोटे से गांव से लेकर राजभवन तक का सफर सेवा के प्रति समर्पित जीवन का प्रतिक है।
17 जून 1942 में बागेश्वर जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कोश्यारी जी के प्रारंभिक वर्ष पहाड़ी क्षेत्र की सादगी, ढृढ़ता, और समृद्ध सांस्कृतिक परिवेश से प्रभावित थे। उन्होंने अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नाकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और छात्र संघ के महासचिव भी रहे, जिससे राजनीतिक चेतना की नींव पड़ी। सक्रिय राजनीती में पूर्णकालिक रूप से पहले उन्होंने एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दी। शिक्षा की साथ जुड़ाव ने उनकी सामाजिक मुद्दों की समझ को और गहरा किया। कोशियारी जी की राजनीतिक विचारधारा पर संघ का गहरा प्रभाव रहा। छात्र राजनीती में उनकी सक्रियता जल्द ही सार्वजनिक जीवन के प्रति आजीवन प्रतिबद्धत्ता में बदल गयी। अपनी ईमानदारी, संघटाकमक क्षमता और राष्ट्र प्रेम के कारण वे निरंतर राजनीतिक सफर में आगे बढ़ते रहे।
उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी द्वारा लागू आपातकाल का ढृढ़ता से विरोध किया जिससे उनको कारागार में भी रहना पड़ा। इन अनुभवों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को और गहरा किया। सन 1975 में कोशियारी जी ने साप्ताहिक पर्वत पियूष की स्थापना सुर संपादन किया, एक ऐसा प्रकाशन जिसने न केवल सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक सामंजस्य, और क्षेत्रीय स्वायत्ता की आवाज़ को बुलंद किया, बल्कि एक बौद्धिक मंच के रूप में पहाड़ों के ज़मीनी मुद्दे और संघ संरेखित दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। कोशियारी जी ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, शिक्षा, और सामाजिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करने वाली कई पुस्तके लिखी जिसमें “उत्तरांचल प्रदेश क्यों ?” शामिल हैं, जिन्होंने उत्तराखंड राज्य के दर्जे के आंदोलन के पीछे तर्क और समाधान को स्पष्ट किया और राज्य के अस्तित्व में आने से बहुत पहले सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित किया।

सन 2000 में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तरांचल) का निर्माण न केवल क्षेत्र के लिए बल्कि कोश्यारी जी के राजनैतिक सफर के लिए भी ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण रहा। नए राज्य के गठन के बाद उन्होंने उत्तराखंड विधानसभा में अपनी सेवाएं दी। पहाड़ के एक वरिष्ट नेता के रूप में उन्हें नवनिर्मित राज्य के मंत्रिमंडल में जगह मिली। उनका नेतृत्व ऐसे समय में महत्वपूर्ण था जब नाता राज्य प्रशासनिक पुनर्गठन की चुनौतियों से जूझ रहा था। अक्टूबर 2001 में कोशियारी जी उत्तराखंड की दूसरे मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका कार्यकाल मात्र एक वर्ष ही चला, उनका नेतृत्व शासन संरचनाओं को स्थिर करने, प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने और राज्य में राजनीतिक सहमति का मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण था। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता (2002 से 2008) के रूप में सेवा देने के पश्चात कोशियारी जी 2008 में राज्यसभा के लिए चुने गए और राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ का प्रतिनिधित्व किया। संसद सदस्य के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा, और बुनियादी ढांचे से सम्बंधित मुद्दे उठाये , विशेष रूप से पहाड़ी राज्य की जरूरतों पर ध्यान केंद्रित किया। उनके व्यवहार और लाकतांत्रिक संस्थानों के प्रति सम्मान से उन्हें सहयोगियों और राजनीतिक विरोधियों, दोनों का सम्मान दिलाया। 2014 में उन्होंने नैनीताल- ऊधमसिंह नगर से लोकसभा सीट जीती और निचले सदन में उत्तराखंड की आवाज़ को मजबूत किया।
उनके अनुभव और वरिष्टता ने उन्हें भाजपा के प्रमुख पदों पे नियुक्ति दिलाई जिनमें भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद शामिल है। इन भूमिकाओं में उन्होंने अपनी रणनीति और संघताकमक लोहा मनवाया, साथ ही देश में राजनैतिक परिवर्तन के दौरान पार्टी संगठन को और मज़बूत किया। सितम्बर 2019 में उनको महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति मिली। राज्यपाल के रूप में कोशियारी जी को गहन राजनैतिक अनिश्चितता के दौर से गुजरना पड़ा। उन्होंने लगातार संवैधानिक प्रावधानों और संस्थागत प्रक्रियाओं के पालन पर ज़ोर दिया। उनके इस कार्यकाल ने भारत के संघीय ढांचे के भीतर संवैधानिक संतुलन बनाये रखने में राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया।

भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण मिलना उनके सार्वजनिक जीवन में निस्वार्थ सेवा भाव को दर्शाता है और कई आयामों में उनके जीवन भर दिए गए योगदान को स्वीकारता है। यह पुरस्कार केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं बल्कि विनम्रता और ढृढ़ता में निहित सिद्धांतवादी सार्वजनिक सेवा का परिचायक है। यह सम्मान उत्तराखंडवासियों के लिए अत्यंत हर्ष और सम्मान का विषय है।
संवैधानिक भूमिकाओं से सेवानिवृत्ति के बाद में कोश्यारी जी उत्तराखंड के प्रगति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। अक्सर स्नेह से ‘भगत दा’ कहे जाने वाले कोशियारी जी के बौद्धिक कठोरता और ज़मीनी सक्रियता उन्हें उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्वों में से एक के रूप में स्थापित करती है। राजनीतिक ध्रुवीकरण और अल्पकालिक महत्वाकांक्षाओं से परे उनका जीवन अपनी निरंतरता, वैचारिक स्पष्ठता, और संवैधानिक संस्थाओ के प्रति सम्मान के लिए उल्लेखनीय है। शिक्षण, पत्रकारिता, राजनीती, और संवैधानिक सेवा में उनकी यात्रा केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि को नहीं बल्कि उनकी पहचान, अखंडता, और विकास के प्रति कार्यरत एक युवा राज्य की विकसित कथा को दर्शाती है।
